Ethanol Blending Policy 2026: देश में चीनी संकट से निपटने के लिए बड़ा फैसला, गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से एथनॉल बनाने पर लगी रोक; अब मक्का और चावल से होगी आपूर्ति

त्योहारी सीजन के बीच आम उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत देने और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। सरकार ने आगामी एथनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए गन्ने के रस (Sugarcane Juice), शुगर सिरप (Sugar Syrup) और बी-हैवी मोलासेस (B-Heavy Molasses) से एथनॉल बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। चीनी मिलों और डिस्टिलरीज को अब केवल सी-हैवी मोलासेस (C-Heavy Molasses) का उपयोग करने की अनुमति होगी, ताकि गन्ने की अधिकतम मिठास का उपयोग केवल चीनी उत्पादन के लिए किया जा सके। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल ब्लेंडिंग (EBP Programme) के राष्ट्रीय लक्ष्य को बाधित नहीं होने दिया जाएगा और इसके लिए मक्का (Maize), एफसीआई के अतिरिक्त सरप्लस चावल और खराब खाद्यान्न (Damaged Food Grains) पर आधारित डिस्टिलरीज से आपूर्ति को पूरी रफ्तार से बढ़ाया जाएगा। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित गन्ना आयुक्त कार्यालय से लेकर लखीमपुर, सीतापुर, मुजफ्फरनगर, शामली और महाराष्ट्र के प्रमुख चीनी बेल्ट्स तक इस बड़े फैसले से चीनी उद्योग के समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।
चीनी उत्पादन में गिरावट की आशंका और खुदरा कीमतों पर लगाम लगाने का प्रयास
खाद्य मंत्रालय के अनुसार, चालू पेराई सत्र और आगामी 2025-26 के सीजन में देश का सकल चीनी उत्पादन लगभग 310 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। मानसूनी बारिश के असंतुलन के चलते महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रमुख गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में उपज पर असर पड़ा है। यदि पहले की तरह गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से बड़े पैमाने पर एथनॉल बनाया जाता रहा, तो लगभग 35 से 40 लाख टन चीनी एथनॉल में डायवर्ट हो जाती, जिससे घरेलू बाजार में चीनी की भारी किल्लत पैदा हो सकती थी और खुदरा कीमतें ₹45 से ₹50 प्रति किलो के पार निकल सकती थीं। सरकार ने आगामी त्योहारी मांग (दीपावली, छठ और आगामी शादी-ब्याह के सीजन) को देखते हुए फूड सिक्योरिटी (Food Security) को एनर्जी सिक्योरिटी से ऊपर प्राथमिकता देने का निर्णय लिया है।
एथनॉल उत्पादन के लिए चीनी का डायवर्जन घटाकर शून्य किया गया
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और खाद्य मंत्रालय द्वारा आगामी एथनॉल सप्लाई ईयर (ESY 2026-27) के लिए जारी किए गए नए टेंडर में चीनी और गन्ने के रस का डायवर्जन कोटा शून्य (Zero Sugar Diversion) निर्धारित कर दिया गया है।
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गन्ने का रस / सिरप: इस पर पूरी तरह रोक रहेगी।
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बी-हैवी मोलासेस: चूंकि बी-हैवी शीरे में चीनी की मात्रा काफी अधिक होती है और इसे प्रोसेस करके चीनी बनाई जा सकती है, इसलिए इसके उपयोग पर भी बंदिश लगा दी गई है।
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सी-हैवी मोलासेस को हरी झंडी: चीनी बनने के बाद जो अंतिम अवशेष (By-product) बचता है, जिसे सी-हैवी शीरा कहा जाता है, उससे चीनी मिलें एथनॉल बना सकेंगी। इससे चीनी उत्पादन पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ेगा।
मक्का और एफसीआई चावल बनेंगे एथनॉल सप्लाई की मुख्य रीढ़
गन्ना आधारित कच्चे माल पर पाबंदी लगने के बाद देश में एथनॉल आपूर्ति को बनाए रखने के लिए ग्रेन-बेस्ड (Grain-Based) डिस्टिलरीज को पूरी क्षमता से संचालित किया जाएगा। वर्तमान में देश के लगभग 70 से 75 प्रतिशत एथनॉल की आपूर्ति पहले से ही अनाज आधारित डिस्टिलरीज के जरिए हो रही है।
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मक्का (Maize) को बड़ा बढ़ावा: केंद्र सरकार ने मक्के से बनने वाले एथनॉल के लिए तेल कंपनियों की खरीद दर ₹71.86 प्रति लीटर तय कर रखी है, जो सबसे अधिक प्रोत्साहन दर है। इससे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के मक्का उत्पादक किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल रहा है।
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एफसीआई का सरप्लस चावल: भारतीय खाद्य निगम (FCI) के गोदामों में बफर स्टॉक से अधिक मौजूद चावल को एथनॉल निर्माण के लिए ₹58.50 प्रति लीटर की दर पर आवंटित किया जा रहा है।
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टूटे और खराब अनाज (DFG): डिस्टिलरीज को खराब गेहूं, टूटे हुए चावल और ज्वार-बाजरा जैसे मोटे अनाजों के उपयोग की पूरी छूट दी गई है।
20 प्रतिशत एथनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य पर क्या पड़ेगा प्रभाव?
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि चीनी आधारित फीडस्टॉक पर अस्थायी रोक लगने के बावजूद पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल मिलाने (E20 Fuel) के महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। देश भर में पिछले तीन वर्षों के दौरान अनाज आधारित कई नई मल्टी-फीडस्टॉक डिस्टिलरीज स्थापित की गई हैं, जिनकी उत्पादन क्षमता गन्ने पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर चुकी है। ऑयल मार्केटिंग कंपनियों ने आगामी वर्ष के लिए रिकॉर्ड 1,050 करोड़ लीटर एथनॉल की आवश्यकता का आकलन किया है, जिसमें से बड़ा हिस्सा अनाज से पूरा किया जाएगा।
चीनी मिलों और डिस्टिलरी उद्योग की मिली-जुली प्रतिक्रिया
सरकार के इस फैसले पर भारतीय चीनी मिल संघ (ISMA) और निजी डिस्टिलरी ऑपरेटरों ने मिश्रित प्रतिक्रिया दी है:
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वित्तीय तरलता और भुगतान पर असर: मिल मालिकों का कहना है कि जिन्होंने केवल गन्ने के रस से एथनॉल बनाने के लिए समर्पित (Dedicated) डिस्टिलरी यूनिट्स स्थापित की थीं, उनके संयंत्रों की उपयोगिता प्रभावित होगी। साथ ही, एथनॉल से मिलने वाले त्वरित कैश फ्लो से किसानों के गन्ना मूल्य भुगतान (Cane Dues) में आसानी होती थी।
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गन्ना किसानों के हितों की रक्षा: हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि चीनी की खुदरा कीमतें स्थिर रहने और मिलों द्वारा पूरी पेराई चीनी बनाने में केंद्रित करने से किसानों के भुगतान में रुकावट नहीं आने दी जाएगी। केंद्र ने हाल ही में पेराई सीजन के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (FRP) ₹355 प्रति क्विंटल तय किया है, जिसकी सीधी अदायगी सुनिश्चित की जाएगी।
आम उपभोक्ता के लिए क्या हैं इस फैसले के मायने?
इस नीतिगत बदलाव का सीधा फायदा देश के आम परिवारों और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को मिलेगा:
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चीनी के दामों में स्थिरता: खुले बाजार में चीनी की सप्लाई भरपूर बनी रहेगी, जिससे त्योहारी सीजन में जमाखोरी और कालाबाजारी पर रोक लगेगी।
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मिठाइयों और बेकरी उत्पादों पर नियंत्रण: चीनी के दाम स्थिर रहने से त्योहारी सीजन में बेकरी, पैकेज्ड बेवरेजेस, शीतल पेय और पारंपरिक मिठाइयों की लागत में अचानक उछाल नहीं आएगा।
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पर्यावरण और ईंधन सुरक्षा का संतुलन: भारत अपनी घरेलू खाद्य सुरक्षा को दांव पर लगाए बिना हरित ऊर्जा के लक्ष्यों की ओर आगे बढ़ता रहेगा।




