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बुवाई से पूर्व सभी फसलों में शत-प्रतिशत बीजशोधन का कार्य कराया जाना नितान्त आवश्यक: कृषि निदेशक

लखनऊ: प्रदेश में प्रतिवर्ष फसलों की कुल क्षति का लगभग 26 प्रतिशत क्षति रोगों द्वारा होती है। रोगों से होने वाली क्षति कभी-कभी महामारी का रूप ले लेती है और इसके प्रकोप से लगभग सम्पूर्ण फसल नष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है। अतः बुवाई से पूर्व सभी फसलों में शत-प्रतिशत बीजशोधन का कार्य कराया जाना नितान्त आवश्यक है। बीजशोधन का मुख्य उद्देश्य रसायनों एवं बायोपेस्टीसाइड्स से शोधित कर बीज जनित अथवा भूमि जनित रोगों के कारकों को नष्ट करना होता है।

     यह जानकारी कृषि निदेशक, श्री सोराज सिंह ने आज यहां दी। उन्होंने कहा कि बीजशोधन हेतु प्रयोग किये जाने वाले रसायनों या बायोपेस्टिसाईड्स को बुवाई के पूर्व सूखा या स्लरी के रूप में अथवा निर्देशानुसार घोल बनाकर मिलाया जाता है। इससे रक्षा रसायनों की एक परत बीजों की बाहरी सतह पर बन जाती है, जो बीज पर पाये जाने वाले जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा बीजशोधन कार्य को अभियान के रूप में क्रियान्वित कर समस्त ग्राम पंचायतों में किसानों को प्रेरित किया जा रहा है।

     श्री सिंह ने बताया कि रबी की प्रमुख फसलों गेहूँ, जौ, चना, मटर, मसूर, राई या सरसों, आलू और गन्ना के बीजशोधन हेतु संस्तुतियों के अनुसार कृषि विभाग द्वारा प्रमुख कृषि रक्षा रसायनों-थिरम 75 प्रतिशत डब्ल्यू0एस0, कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू0पी0, ट्राइकोडर्मा हारजिएनम 2.0 प्रतिशत डब्ल्यू0पी0, ट्राइकोडर्मा विरिडी 1.0 प्रतिशत डब्ल्यू0पी0 एवं स्यूडोमोनास फ्लोरीसेन्स 0.5 प्रतिशत डब्ल्यू0पी0 की व्यवस्था सुनिश्चित की जा चुकी है।

     कृषि निदेशक ने कहा कि खाद्यान्न उत्पादन के राष्ट्रीय कार्यक्रम तथा बीजशोधन अभियान को सफल बनाने के लिये व्यापक जनसहभागिता आवश्यक है। इसके लिये उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, स्वयं सेवी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, महिला संगठनों, कृषि तकनीकी प्रबंध अभिकरण (आत्मा), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, कृषि रक्षा अनुभाग की कीट व रोग नियंत्रण योजना एवं प्रगतिशील किसानों के साथ-साथ कीटनाशी उत्पादक संगठन, थोक और फुटकर विक्रेताओं से सहयोग की अपेक्षा की।

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