क्या है ‘दो सौ खोली’ का इतिहास, जहां बंद है गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई

गुजरात के अहमदाबाद में स्थित साबरमती सेंट्रल जेल का नाम जब भी आता है, तो इतिहास और अपराध जगत के कई पन्ने एक साथ खुल जाते हैं। इसी जेल परिसर के भीतर एक ऐसी अति-सुरक्षित (High-Security) और रहस्यमयी जगह है, जिसे अपराध की दुनिया और पुलिस महकमे में 'दो सौ खोली' (Dosow Kholi) के नाम से जाना जाता है। फिलहाल भारत का सबसे चर्चित और खतरनाक गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई इसी 'दो सौ खोली' के कड़े पहरे में बंद है। बाबा सिद्दीकी हत्याकांड, सलमान खान के घर पर फायरिंग और कई हाई-प्रोफाइल वारदातों में नाम आने के बाद से इस विशेष सेल की सुरक्षा को अभेद्य किला बना दिया गया है। लेकिन 'दो सौ खोली' सिर्फ लॉरेंस बिश्नोई की वजह से चर्चा में नहीं है, बल्कि इसका इतिहास देश के सबसे कुख्यात अपराधियों, अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और स्वयंभू बाबा आसाराम बापू से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
'दो सौ खोली' का ऐतिहासिक ताना-बाना और क्यों बनाई गई थी यह अति-सुरक्षित बैरक?
साबरमती जेल के भीतर स्थित 'दो सौ खोली' दरअसल 200 छोटी-छोटी कालकोठरियों (High-Security Isolation Cells) का एक विशेष परिसर है, जिसे अंग्रेजों के जमाने में बेहद खतरनाक कैदियों को मुख्य जेल आबादी से अलग और बिल्कुल एकांत में रखने के लिए डिजाइन किया गया था। इस ब्लॉक की बनावट ऐसी है कि यहां बंद कैदी न तो किसी दूसरे कैदी से बात कर सकता है और न ही उसे बाहर की दुनिया का कोई अंदाजा होता है। प्रत्येक खोली (सेल) में भारी-भरकम लोहे के दरवाजे, दोहरी सलाखें और सीसीटीवी कैमरों की चौबीसों घंटे निगरानी रहती है। आजादी के आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को यातनाएं देने और मुख्यधारा से अलग रखने के लिए इस बैरक का इस्तेमाल किया था, लेकिन आजादी के बाद इसे राज्य के सबसे खूंखार और उच्च-जोखिम वाले (High-Risk) अपराधियों को रखने के लिए समर्पित कर दिया गया।
दाऊद इब्राहिम से लेकर आसाराम बापू तक: जब 'दो सौ खोली' बनी दिग्गजों का ठिकाना
'दो सौ खोली' का आपराधिक इतिहास बेहद सनसनीखेज रहा है। 1980 के दशक में जब मुंबई का अंडरवर्ल्ड सरगना दाऊद इब्राहिम गुजरात के रास्ते अपने अवैध धंधे फैला रहा था और गिरफ्तार हुआ था, तब उसे भी इसी साबरमती जेल की 'दो सौ खोली' में बेहद सख्त पहरे के बीच रखा गया था। दाऊद के अलावा गुजरात के स्थानीय डॉन अब्दुल लतीफ को भी इसी ब्लॉक की सलाखों के पीछे दिन काटने पड़े थे। वहीं यौन उत्पीड़न के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम बापू को भी सुरक्षा और संवेदनशील स्थिति को देखते हुए लंबे समय तक इसी 'दो सौ खोली' के एकांत जेल परिसर में रखा गया था। 2008 के अहमदाबाद सीरियल बम धमाकों के मुख्य आरोपियों को भी इसी बैरक में कड़ी सुरक्षा के बीच बंद किया गया था, जिसके बाद यह सेल राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आई थी।
गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के लिए त्रि-स्तरीय सुरक्षा घेरा और 24 घंटे की निगरानी
वर्तमान समय में इस 'दो सौ खोली' की पहचान लॉरेंस बिश्नोई का मुख्य ठिकाना बन चुकी है। गृह मंत्रालय के विशेष आदेश (Section 268 of CrPC / BNSS) के तहत लॉरेंस बिश्नोई के स्थानांतरण पर रोक लगी हुई है, जिसके कारण उसे किसी अन्य राज्य की जेल में नहीं भेजा जा रहा है। 'दो सौ खोली' में लॉरेंस बिश्नोई को रखने के लिए गुजरात पुलिस, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CRPF) का त्रि-स्तरीय अभेद्य सुरक्षा घेरा तैयार किया गया है। बिश्नोई की सेल के बाहर 24 घंटे मुस्तैद कमांडो, नाइट-विज़न कैमरों से लैस सर्विलांस रूम और बॉडी वार्म कैमरों का इस्तेमाल किया जाता है। यहां तक कि उसे खाना परोसने से पहले भोजन की सुरक्षा जांच की जाती है, ताकि जेल के भीतर या बाहर से उस पर किसी प्रकार का हमला या गुप्त संदेशों का आदान-प्रदान न हो सके।
आधुनिक तकनीक और एआई निगरानी से लैस 'दो सौ खोली' की नई अभेद्य दीवारें
साबरमती जेल प्रशासन ने समय के साथ 'दो सौ खोली' को पूरी तरह से हाई-टेक और डिजिटल सिक्योरिटी जोन में बदल दिया है। अब इस परिसर में जैमर तकनीक को इतना अपग्रेड कर दिया गया है कि कोई भी अवैध मोबाइल नेटवर्क या 5G सिग्नल काम नहीं कर सकता। एआई (AI) आधारित फेशियल रिकग्निशन और मोशन सेंसर कैमरों की मदद से सेल के आसपास की हर गतिविधि पर कमांड सेंटर से सीधी नजर रखी जाती है। 'दो सौ खोली' का यह इतिहास और इसकी अभेद्य सुरक्षा यह साबित करती है कि भारतीय जेल प्रशासन के पास सबसे कुख्यात अपराधियों को पूरी तरह अलग-थलग और नियंत्रित रखने के लिए साबरमती का यह विशेष ब्लॉक सबसे मजबूत और सुरक्षित गढ़ माना जाता है।




