DDLJ से लेकर ‘बागबान’ तक, जब बॉलीवुड की इन 5 कल्ट फिल्मों में छलनी से दिखा करवाचौथ का सबसे ग्रैंड रोमांस

भारतीय समाज और संस्कृति में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों और उत्सवों से बॉलीवुड कभी भी अछूता नहीं रहा है। जब भी हिंदू रीति-रिवाजों और लोक आस्था के महापर्वों की बात आती है, हिंदी सिनेमा के फिल्मकारों ने उन्हें बड़े परदे पर असाधारण भव्यता, संगीत और भावनाओं की चाशनी में पिरोकर पेश किया है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवाचौथ का पावन पर्व हर शादीशुदा और सुहागिन महिला के जीवन में असीम श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पूरे दिन अन्न और जल का एक घूंट पिए बिना निर्जला उपवास रखना, सोलह श्रृंगार कर छलनी से चांद का दीदार करना और फिर अपने पति के हाथों जल ग्रहण कर व्रत का पारण करना केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि समर्पण का सर्वोच्च अहसास है। भारतीय सिनेमा ने दशकों से करवाचौथ के इस आध्यात्मिक और रूमानी रिश्ते को बहुत संजीदगी से कैमरे में कैद किया है। 29 अक्टूबर को आने वाले करवाचौथ के इस माहौल में आइए जानते हैं उन पांच ऐतिहासिक और कल्ट बॉलीवुड फिल्मों के बारे में, जहां इस पर्व के इर्द-गिर्द बुने गए सीन्स आज भी दर्शकों के दिलों में हमेशा के लिए अमर हैं।
करवाचौथ की जब भी चर्चा होती है, तो सिनेप्रेमियों की आंखों के सामने सबसे पहले पारंपरिक परिधानों में सजी अभिनेत्रियां, छलनी से चमकता दीया, बजती शहनाई और बैकग्राउंड में बजते कर्णप्रिय संगीत की धुनें तैरने लगती हैं। कई निर्देशकों ने इस त्योहार को सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे प्रेमियों के मिलन, सामाजिक वर्जनाओं को तोड़ने और पति-पत्नी के बीच त्याग की पराकाष्ठा को दर्शाने वाले सबसे बड़े टर्निंग पॉइंट के रूप में इस्तेमाल किया है। सिनेमा के इस उत्सव ने करवाचौथ को केवल भारत के पारंपरिक घरों तक सीमित न रखकर विदेशों में रहने वाले एनआरआई परिवारों और युवा पीढ़ी के बीच भी एक फैशन, स्टाइल और गहरे रोमांस का जरिया बना दिया।
आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में बनी और शाह रुख खान व काजोल की जोड़ी को हमेशा के लिए अमर कर देने वाली ब्लॉकबस्टर कल्ट फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ (DDLJ) का करवाचौथ सीन हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे जादुई पल माना जाता है। फिल्म में सिमरन यानी काजोल की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ किसी और से तय हो चुकी होती है, लेकिन उसका दिल पूरी तरह लंदन में मिले अपने प्यार राज यानी शाह रुख खान पर आ चुका होता है। सिमरन चोरी-छिपे पूरे दिन बिना खाए-पिए राज के लिए निर्जला व्रत रखती है। जब छत पर राज को यह बात पता चलती है, तो वह सिमरन की सेहत को लेकर चिंतित हो जाता है और उसे प्यार से डांटता भी है, लेकिन सिमरन जिद पर अड़ जाती है कि वह अगर यह व्रत खोलेगी तो सिर्फ और सिर्फ राज के हाथों से ही खोलेगी।
पारिवारिक परंपरा के अनुसार जब नीचे आंगन में सभी महिलाएं चांद देखकर अपने पतियों के हाथों से पानी पीने लगती हैं, तब सिमरन के सामने मंगेतर कुलजीत पानी का लोटा लेकर खड़ा होता है। यहीं पर सिमरन अपनी बुद्धि और प्यार का परिचय देते हुए अचानक बेहोश होने का जबरदस्त नाटक करती है। घर के सभी लोग घबरा जाते हैं और भीड़ में मौजूद राज तेजी से आगे बढ़कर सिमरन को संभालता है और अपने हाथों से उसके मुंह में पानी डालकर उसका व्रत संपन्न करा देता है। दोनों की आंखों की वह मूक बातचीत और चोरी-छिपे एक-दूसरे को निहारने का वह अंदाज आज भी करोड़ों युवाओं के लिए करवाचौथ के रोमांस की सबसे बड़ी परिभाषा बना हुआ है।
फिल्ममेकर करण जौहर की भव्य पारिवारिक ड्रामा फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ (K3G) ने करवाचौथ के त्योहार को अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया था। इस फिल्म में करण जौहर ने यह खूबसूरती से साबित किया कि भारतीय संस्कृति और त्योहारों की जड़ें किसी भौगोलिक सीमा में नहीं बंधी हैं। सात समंदर पार लंदन की आधुनिक धरती पर रहने के बावजूद भारतीय महिलाएं अपनी जड़ों, सिंदूर, सरगी और करवाचौथ की पवित्रता को उसी निष्ठा और धूमधाम से जीती हैं, जैसे वे भारत के किसी शहर या गांव में जी रही हों।
फिल्म के लोकप्रिय गीत ‘बोले चूड़ियां बोले कंगना’ के दौरान पूरा कपूर परिवार पारंपरिक परिधानों, खूबसूरत लहंगों और गहनों में सज-धजकर करवाचौथ की पूजा करता नजर आता है। फिल्म में जया बच्चन और अमिताभ बच्चन के बीच का पारंपरिक सम्मान, तो दूसरी ओर काजोल और शाह रुख खान के बीच का चुलबुला दांपत्य प्रेम इस दृश्य को भावनात्मक रूप से बेहद समृद्ध बनाता है। वहीं करीना कपूर और ऋतिक रोशन की युवा केमिस्ट्री ने आधुनिक पीढ़ी को यह संदेश दिया कि आधुनिकता के रंग में रंगने के बाद भी अपनी विरासत और संस्कृति को जिंदा रखना कितना खूबसूरत अहसास हो सकता है।
रवि चोपड़ा द्वारा निर्देशित और बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित फिल्म ‘बागबान’ का करवाचौथ सीक्वेंस ऐसा है, जिसे देखकर सिनेमाघर में बैठा हर दर्शक अपनी आंखों के आंसुओं को रोक नहीं पाया था। अमिताभ बच्चन (राज मल्होत्रा) और हेमा मालिनी (पूजा) के किरदारों के जरिए यह दिखाया गया कि सच्चा प्यार उम्र, जिस्म और दूरियों का मोहताज नहीं होता। फिल्म की कहानी के अनुसार, जब उनके अपने स्वार्थी बच्चे अपने बूढ़े माता-पिता को अलग-अलग शहरों में बांट देते हैं और एक-दूसरे से मिलने तक नहीं देते, तब भी करवाचौथ का दिन आने पर दोनों का प्रेम उसी शिद्दत से धड़कता है।
दोनों एक-दूसरे से मीलों दूर हैं, लेकिन दोनों ही निर्जला उपवास रखते हैं। रात को जब आकाश में चांद निकलता है, तो राज और पूजा लैंडलाइन फोन पर एक-दूसरे से बात करते हैं। फोन के उस पार से एक-दूसरे की सिसकियों और सांसों को महसूस करते हुए दोनों पानी का घूंट पीते हैं और अपना उपवास पूरा करते हैं। यह दृश्य बताता है कि करवाचौथ केवल साथ बैठकर भोजन करने की रस्म नहीं है, बल्कि यह दो आत्माओं के बीच का वह अटूट संकल्प है जिसे दुनिया की कोई भी भौतिक दूरी या विपत्ति कभी तोड़ नहीं सकती। अमिताभ और हेमा की परिपक्व अदाकारी ने इस सीन को भारतीय सिनेमा का सबसे भावुक पारिवारिक दृश्य बना दिया।
डेविड धवन की कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘बीवी नं. वन’ में करवाचौथ का एक बिल्कुल अलग और यथार्थवादी पहलू देखने को मिला। फिल्म में करिश्मा कपूर एक समर्पित और पारंपरिक भारतीय पत्नी के रूप में सलमान खान के लिए पूरे भक्ति भाव से करवाचौथ का व्रत रखती हैं। वहीं दूसरी तरफ सलमान खान का किरदार अपनी पत्नी को धोखा देकर अपनी मॉडल गर्लफ्रेंड (सुष्मिता सेन) का व्रत खुलवाने उसके घर पहुंच जाता है। जब करिश्मा को इस दोहरेपन की सच्चाई पता चलती है, तो करवाचौथ का वह पावन मंच एक महिला के स्वाभिमान और उसके आहत प्रेम की शक्ति का प्रतीक बन जाता है। यह सीन दिखाता है कि जहां एक औरत के लिए यह व्रत पवित्रता है, वहीं विश्वासघात की सजा भी उतनी ही कठोर होती है।
वहीं दूसरी ओर, साल 2003 में रिलीज हुई केन घोष की सुपरहिट यूथ-ओरिएंटेड फिल्म ‘इश्क-विश्क’ ने करवाचौथ को पहली बार कॉलेज लाइफ और टीनेज रोमांस के केंद्र में ला खड़ा किया। शाहिद कपूर और अमृता राव की मासूम जोड़ी ने युवा दर्शकों को खूब आकर्षित किया था। फिल्म में अमृता राव का किरदार पायल, राजीव यानी शाहिद कपूर के लिए छुपते-छुपाते अपनी हॉस्टल की छत पर करवाचौथ का व्रत रखती है। शाहिद भी दुनिया की परवाह किए बिना अपनी प्रेमिका का मान रखने और उसका व्रत खुलवाने समय पर पहुंचते हैं। इस सीन ने दिखाया कि प्यार जब निस्वार्थ और सच्चा हो, तो उम्र के किसी भी पड़ाव पर करवाचौथ की भावना दिल को छू लेने वाली होती है।




