‘कुली’ के सेट पर अमिताभ बच्चन संग वो खौफनाक हादसा: 6 साल तक नहीं मिला काम

भारतीय टेलीविजन इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित और कालजयी धारावाहिक ‘महाभारत’ में दुर्योधन के अपने जीवंत और शक्तिशाली अभिनय से घर-घर में अमर हो चुके दिग्गज अभिनेता पुनीत इस्सर आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। लेकिन इस ऐतिहासिक शो के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचने से पहले पुनीत इस्सर का फिल्मी सफर बेहद संघर्षपूर्ण और दर्दनाक दौर से गुजरा था। हिंदी सिनेमा में एक होनहार एक्शन स्टार और अभिनेता के रूप में अपनी पहचान बना रहे पुनीत के करियर की दिशा 1982 में अचानक ऐसी बदली कि उनका पूरा जीवन संकट में घिर गया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘कुली’ के सेट पर सदी के महानायक अमिताभ बच्चन के साथ हुआ एक अप्रत्याशित हादसा पुनीत इस्सर के लिए एक बुरे सपने जैसा साबित हुआ, जिसने न केवल उनके करियर पर पूर्णविराम लगाने की कोशिश की बल्कि उन्हें सामाजिक स्तर पर भी भारी उपेक्षा और नफरत का सामना करने पर मजबूर कर दिया।

हाल ही में अपने पुराने दिनों और जीवन के उतार-चढ़ावों को याद करते हुए पुनीत इस्सर ने एक विस्तृत बातचीत में अपने दिल का दर्द बयां किया है। उन्होंने खुलकर बताया कि कैसे बेंगलुरु में ‘कुली’ के सेट पर हुई उस अनहोनी के बाद हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने उनसे पूरी तरह मुंह मोड़ लिया था। उस दौर में लोग उन्हें उस इंसान के रूप में देखने लगे थे जिसकी वजह से देश के सबसे बड़े सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की जान पर बन आई थी। पुनीत बताते हैं कि वह कोई जानबूझकर किया गया कृत्य नहीं बल्कि महज एक अनपेक्षित तकनीकी और एक्शन हादसा था, लेकिन उस घटना के बाद उन्हें कई वर्षों तक बिना किसी काम के खाली बैठना पड़ा। इस कठिन परीक्षा की घड़ी ने उन्हें मानसिक, पेशेवर और व्यक्तिगत तीनों स्तरों पर पूरी तरह झकझोर कर रख दिया था।

उस दौर के कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए पुनीत इस्सर ने बताया कि हादसे के तुरंत बाद उन्हें लगभग 6 साल तक किसी भी मुख्यधारा की फिल्म में काम नहीं मिला। फिल्म निर्माता और निर्देशक उनके साथ काम करने से कतराने लगे थे क्योंकि उन्हें डर था कि जनता का गुस्सा उनकी फिल्म पर फूट सकता है। पुनीत ने कहा कि मेरा हमेशा से यह पक्का मानना रहा है कि जिंदगी में जो कुछ भी होता है, वह किसी न किसी अच्छे मकसद के लिए ही होता है। बदकिस्मती से उस दिन वह भयानक हादसा हो गया। उस घटना के बाद भले ही मुझे छह साल तक कोई काम नहीं मिला, लेकिन एक कड़वी हकीकत यह भी थी कि मैं रातों-रात दुनिया भर में मशहूर हो गया था। लोग मुझे उस व्यक्ति के रूप में पहचानने लगे थे जिसने अमिताभ बच्चन को लगभग मौत के मुंह में धकेल दिया था। यह एक शुद्ध दुर्घटना थी और मैंने कभी सपने में भी जानबूझकर ऐसा करने की बात नहीं सोची थी।

पुनीत ने आगे भावुक होते हुए कहा कि अमित जी एक संपूर्ण मेगास्टार हैं और मैं हमेशा से उनका बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूं। उस हादसे के बाद के छह साल मेरे और मेरे परिवार के लिए बेहद कठिन और चुनौती भरे थे। मुझे अपनी पसंद के रोल मिलना तो दूर, जिन फिल्मों के लिए मुझे साइन किया जा चुका था, उनसे भी रातों-रात बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। कई बार तो मुझे बिना कोई कारण बताए प्रोजेक्ट से हटा दिया जाता था। इसके बावजूद मैंने कभी किसी निर्माता, निर्देशक या अपनी तकदीर को दोष नहीं दिया। मैंने इसे अपनी किस्मत का लिखा माना और उस घोर एकांत और संघर्ष के समय ने मुझे भीतर से और अधिक मजबूत, धैर्यवान और परिपक्व इंसान बना दिया।

यह दिल दहला देने वाला वाकया साल 1982 का है, जब बेंगलुरु विश्वविद्यालय के परिसर में फिल्म ‘कुली’ के क्लाइमेक्स के एक बेहद अहम एक्शन और फाइट सीक्वेंस की शूटिंग चल रही थी। उस दृश्य में पुनीत इस्सर को अमिताभ बच्चन पर एक घूंसा मारना था और स्क्रिप्ट के अनुसार अमिताभ को पीछे हटते हुए एक टेबल पर गिरना था। फाइट मास्टर के निर्देश पर शॉट शुरू हुआ, लेकिन टाइमिंग में कुछ सेकंड के हेरफेर के कारण पुनीत का पंच थोड़ा गलत दिशा में लगा और अमिताभ बच्चन का पेट टेबल के नुकीले किनारे से बेहद जोर से टकरा गया। शुरुआत में चोट साधारण लग रही थी, लेकिन कुछ ही घंटों में अमिताभ की तबीयत तेजी से बिगड़ने लगी और आंतरिक रक्तस्राव शुरू हो गया।

जांच में पता चला कि टेबल का कोना सीधे उनकी आंतों (इंटेस्टाइन) में जा लगा था, जिससे आंतरिक अंग गंभीर रूप से फट गए थे। अमिताभ बच्चन को तुरंत बेंगलुरु से एयरलिफ्ट करके मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाया गया। पूरे देश में सन्नाटा पसर गया था और करोड़ों प्रशंसक मंदिरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में महानायक की जिंदगी के लिए दुआएं मांग रहे थे। अस्पताल में डॉक्टरों की विशेष टीम ने कई जटिल और आपातकालीन सर्जरी कीं। अमिताभ बच्चन कई हफ्तों तक आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूलते रहे। उस नाजुक दौर में पुनीत इस्सर के खिलाफ जनता का आक्रोश चरम पर था और उन्हें चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा था।

छह साल के लंबे वनवास और संघर्ष के बाद आखिरकार पुनीत इस्सर के जीवन में आशा की एक नई किरण चमकी, जब मशहूर फिल्ममेकर बी.आर. चोपड़ा ने दूरदर्शन के लिए महाकाव्य ‘महाभारत’ के निर्माण की घोषणा की। इस मेगा प्रोजेक्ट ने पुनीत के पूरे करियर की दिशा को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। दिलचस्प बात यह है कि पुनीत इस्सर की भारी-भरकम कद-काठी, चौड़ा सीना और मस्कुलर बॉडी को देखकर बी.आर. चोपड़ा और कास्टिंग डायरेक्टर पंडित नरेंद्र शर्मा ने शुरू में उन्हें गदाधारी पांडव पुत्र ‘भीम’ के किरदार के लिए चुना था।

हालांकि पुनीत इस्सर के मन में कुछ और ही चल रहा था। पुनीत का मानना था कि भीम का किरदार सीधा और सरल है, जबकि दुर्योधन के चरित्र में जटिलता, ईर्ष्या, अहंकार, क्षत्रिय पराक्रम और बहुआयामी भावनाएं मौजूद हैं जो एक अभिनेता के रूप में उनकी प्रतिभा को साबित कर सकती हैं। जब पुनीत ने बी.आर. चोपड़ा साहब से कहा कि वे भीम के बजाय खलनायक दुर्योधन के रोल के लिए ऑडिशन देना चाहते हैं, तो चोपड़ा साहब और उनकी पूरी टीम हैरान रह गई। लेकिन पुनीत ने अपनी जिद पर अड़े रहकर दुर्योधन के संवादों का ऐसा ओजस्वी और दमदार ऑडिशन दिया कि मेकर्स मंत्रमुग्ध हो गए। जब टीवी पर ‘महाभारत’ का प्रसारण शुरू हुआ, तो पुनीत इस्सर के बोले गए संवाद और उनकी अट्टहास भरी हंसी ने उन्हें भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे यादगार खलनायक बना दिया और लोग उस पुराने हादसे को भूलकर उनके अभिनय के कायल हो गए।

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