हैवान’ मूवी रिव्यू: ‘खिलाड़ी’ अक्षय पर भारी पड़े ‘अनाड़ी’ सैफ, जानिए क्यों उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी यह बड़ी फिल्मी जुगलबंदी

भारतीय सिनेमा के गलियारों में जब भी दो मेगास्टार्स एक साथ पर्दे पर उतरते हैं, तो बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचने की उम्मीद हर किसी की जुबान पर होती है, और इस बार का मामला है बहुप्रतीक्षित एक्शन-ड्रामा फिल्म ‘हैवान’ का। हिंदी सिनेमा के दो दिग्गज और मंजे हुए कलाकार अक्षय कुमार और सैफ अली खान लम्बे अरसे बाद एक बार फिर बड़े पर्दे पर आमने-सामने नजर आए हैं, जिसे लेकर दर्शकों के बीच भारी क्रेज देखा जा रहा था। फिल्म रिलीज होने के बाद से ही क्रिटिक्स और सिनेमाप्रेमियों के बीच इसकी कहानी, निर्देशन और अभिनय को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि एक तरफ जहाँ अपने सदाबहार अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले सैफ अली खान ने अपने गंभीर और इंटेंस किरदार से सबको चौंका दिया है, वहीं पारंपरिक ‘खिलाड़ी’ छवि वाले अक्षय कुमार इस बार अपनी पुरानी चमक बिखेरने में कुछ हद तक कमजोर नजर आए हैं। इस बहुचर्चित जुगलबंदी के पर्दे के पीछे की सच्चाई और फिल्म की खूबियों-कमियों का पूरा कच्चा-चिट्ठा आइए गहराई से टटोलते हैं।

फिल्म की स्टारकास्ट और उम्मीदों का भारी बोझ

जब भी अक्षय कुमार और सैफ अली खान जैसी जोड़ियों को सिल्वर स्क्रीन पर कास्ट किया जाता है, तो दर्शकों की उम्मीदों का ग्राफ अपने आप आसमान छूने लगता है। नब्बे के दशक के इन दोनों कलाकारों ने अपने करियर में कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दी हैं, और उनकी ऑन-स्क्रीन केमेस्ट्री हमेशा से ही दर्शकों की चहेती रही है। ‘हैवान’ फिल्म से भी ट्रेड एनालिस्ट्स और फैंस को यही उम्मीद थी कि यह बॉक्स ऑफिस पर एक नया रिकॉर्ड कायम करेगी और मसाला फिल्मों के पुराने दौर को ताजा कर देगी। लेकिन सिनेमाघरों में उतरने के बाद फिल्म की पटकथा और ट्रीटमेंट को लेकर जिस तरह की बातें सामने आ रही हैं, उससे यह साफ हो गया है कि केवल बड़े नामों के सहारे किसी भी कमजोर कहानी को लंबे समय तक खींचना आज के समझदार दर्शकों के बीच अब मुमकिन नहीं रह गया है।

कहानी का ताना-बाना और पटकथा में बिखराव

फिल्म ‘हैवान’ की कहानी मुख्य रूप से दो ऐसे दोस्तों या प्रतिद्वंदियों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनकी जिंदगियां एक मोड़ पर आकर खतरनाक रूप से टकरा जाती हैं। निर्देशक ने फिल्म में ड्रामा, थ्रिलर और एक्शन का तड़का लगाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन स्क्रीनप्ले (Screenplay) के स्तर पर कई ऐसी खामियां रह गई हैं जो दर्शकों को कहानी के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ने नहीं देतीं। फिल्म का पहला हिस्सा रफ्तार पकड़ने में काफी समय लेता है, और कई सींस ऐसे प्रतीत होते हैं जिन्हें जबरन खींचा गया हो। इंटरवल के बाद कहानी थोड़ी गति पकड़ती है, लेकिन तब तक दर्शक मुख्य प्लॉट से अपनी दिलचस्पी खोने लगते हैं। संवादों (Dialogues) में वह धार और कसावट गायब है जो इस स्तर की एक्शन थ्रिलर फिल्मों की सबसे बड़ी यूएसपी हुआ करती थी।

अभिनय के मोर्चे पर कौन किस पर भारी पड़ा?

फिल्म के सबसे दिलचस्प पहलुओं की अगर बात की जाए, तो वह है इसका अभिनय पक्ष, जहाँ सैफ अली खान ने अपने मंजे हुए और परिपक्व अभिनय से पूरी महफिल लूट ली है। सैफ ने अपने किरदार की परतों को जिस संवेदनशीलता और गहराई के साथ पर्दे पर उतारा है, वह वाकई काबिल-ए-तारीफ है, और उन्होंने यह साबित कर दिया है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी वे एक बेहतरीन अभिनेता हैं। इसके विपरीत, हमेशा अपनी चुस्त एक्शन शैली के लिए जाने जाने वाले अक्षय कुमार इस फिल्म में कुछ थके हुए और अनमने से नजर आते हैं। उनके हिस्से में आए एक्शन सींस और ड्रामैटिक सीक्वेंस में वह पुराना जादुई असर देखने को नहीं मिलता, जिसकी वजह से समीक्षक यह कहने से नहीं चूक रहे कि इस बार ‘अनाड़ी’ कहे जाने वाले सैफ ने ‘खिलाड़ी’ अक्षय पर अभिनय के मामले में बढ़त बना ली है।

तकनीकी पक्ष, संगीत और निर्देशन का कमजोर पहलू

किसी भी फिल्म की सफलता में उसके संगीत, सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर का बहुत बड़ा योगदान होता है, लेकिन ‘हैवान’ इस मामले में भी थोड़ा निराश करती है। फिल्म के गाने कहानी की रफ्तार को आगे बढ़ाने के बजाय कई जगहों पर गतिरोध पैदा करते हुए नजर आते हैं, जो दर्शकों की उत्सुकता को कम कर देते हैं। सिनेमैटोग्राफी और विजुअल इफेक्ट्स (VFX) को और अधिक बेहतर बनाया जा सकता था, क्योंकि आज के आधुनिक सिनेमाई दौर में दर्शक उच्च गुणवत्ता वाले विजुअल्स की उम्मीद करते हैं। निर्देशन के स्तर पर भी विजन की थोड़ी कमी साफ झलकती है, क्योंकि दो बड़े सितारों की मौजूदगी के बावजूद निर्देशक उनके स्टारडम का सही इस्तेमाल करने में सफल नहीं हो पाए हैं।

बॉक्स ऑफिस पर भविष्य और दर्शकों का अंतिम फैसला

इन तमाम कमियों और मिक्स्ड रिव्यूज के बावजूद ‘हैवान’ अपने पहले वीकेंड में बॉक्स ऑफिस पर ठीकठाक आंकड़े जुटाने में कामयाब रही है, जिसका मुख्य श्रेय दोनों लीड एक्टर्स की स्टार पावर और उनकी पुरानी फैन फॉलोइंग को जाता है। हालांकि, वर्ड ऑफ माउथ (Word of Mouth) कमजोर होने के कारण आने वाले हफ्तों में फिल्म के लिए सिनेमाघरों में टिके रहना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। यह फिल्म इस बात का एक और बड़ा उदाहरण है कि केवल बड़े सितारों और भारी-भरकम बजट के दम पर फिल्म को हिट नहीं कराया जा सकता, बल्कि इसके लिए एक मजबूत और कसी हुई कहानी का होना सबसे पहली शर्त है। यदि आप सैफ अली खान के अभिनय के दीवाने हैं और वीकेंड पर एक बार सिनेमाघरों का रुख करना चाहते हैं, तो आप इसे देख सकते हैं, लेकिन बहुत ज्यादा उम्मीदें बांधकर जाने से बचना समझदारी होगी।

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