बिना सेंसर सर्टिफिकेट फिल्म रिलीज करना पड़ेगा भारी! CBFC मेंबर राज मिश्रा का बड़ा बयान, बताया ‘A’ और ‘UA’ कैटेगरी का असली खेल

भारतीय सिनेमा जगत में किसी भी फिल्म को बड़े पर्दे पर रिलीज होने से पहले केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड (CBFC) के कड़े नियमों, जांच और रेगुलेशन के दौर से गुजरना अनिवार्य होता है. इसके बिना किसी भी फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने की अनुमति कानूनी रूप से नहीं मिलती. सेंसर बोर्ड (CBFC) के आधिकारिक सदस्य राज मिश्रा ने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में साफ किया कि बिना उचित सर्टिफिकेशन के फिल्म को पब्लिक डोमेन में रिलीज करना एक बेहद गंभीर और दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि बोर्ड फिल्मों की स्क्रीनिंग और नियमों को लेकर पूरी तरह सख्त है और उल्लंघन करने वालों पर भारी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है.

प्रसून जोशी संभाल रहे हैं कमान, MIB तय करता है सेंसर बोर्ड का स्ट्रक्चर

राज मिश्रा ने सेंसर बोर्ड की आंतरिक कार्यप्रणाली और इसके संगठनात्मक ढांचे (Organizational Structure) पर विस्तार से बात की. उन्होंने बताया कि:

  • अध्यक्ष की नियुक्ति: सेंसर बोर्ड के पूरे कामकाज की देखरेख के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय (MIB) द्वारा बोर्ड के अध्यक्ष (Chairman) की नियुक्ति की जाती है. वर्तमान में इस गरिमामयी पद की जिम्मेदारी मशहूर गीतकार और लेखक प्रसून जोशी संभाल रहे हैं.

  • कमेटी का आकार: बोर्ड की मुख्य जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि समाज में दिखाई जाने वाली फिल्में देश की संप्रभुता और तय गाइडलाइंस के अनुकूल हों. इस बोर्ड में अध्यक्ष के अलावा 25 अन्य गैर-सरकारी सदस्य शामिल होते हैं, जो फिल्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हैं.

क्या है ‘A’ और ‘UA’ सर्टिफिकेट का असली मतलब?

फिल्मों को मिलने वाली श्रेणियों को लेकर दर्शकों और मेकर्स के बीच अक्सर भ्रम रहता है, जिसे राज मिश्रा ने स्पष्ट किया:

  1. ‘A’ (Adult) सर्टिफिकेशन: यह श्रेणी केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वयस्कों के लिए होती है. जिन फिल्मों में अत्यधिक बोल्ड, इंटीमेट सीन्स या जरूरत से ज्यादा खून-खराबा और वीभत्स हिंसा (Crime & Violence) दिखाई जाती है, उन्हें दर्शकों की मानसिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस कैटेगरी में डाला जाता है.

  2. ‘UA’ (Unrestricted Public Exhibition Under Parental Guidance) सर्टिफिकेशन: इसका सीधा मतलब है कि फिल्म में बहुत कम या हल्की-फुल्की हिंसा/संवाद हैं, जिसे बच्चे अपने माता-पिता या परिवार के किसी बड़े सदस्य की देखरेख और मार्गदर्शन में आसानी से देख सकते हैं. यह बच्चों के मानसिक विकास की सुरक्षा के लिए एक तरह का ‘सेफ्टी क्लॉज’ है.

फिल्म रिजेक्ट होने पर क्या करें मेकर्स? 11 सदस्यों की कमेटी और ट्रिब्यूनल का रास्ता

इंटरव्यू के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल यह उठा कि यदि शुरुआत में पांच सदस्यों की प्राथमिक जांच कमेटी (Examining Committee) किसी फिल्म को पास करने से मना कर दे, तो फिल्ममेकर्स के पास क्या कानूनी विकल्प बचते हैं?

  • री-एग्जामिनेशन प्रोसेस: मेकर्स के पास अपनी फिल्म को दोबारा जांच के लिए भेजने का पूरा वैधानिक अधिकार होता है. इस प्रक्रिया के तहत फिल्म को 11 सदस्यों की एक बड़ी ‘री-एग्जामिनिंग कमेटी’ के सामने दोबारा स्क्रीन किया जाता है.

  • ट्रिब्यूनल का आखिरी रास्ता: यदि यह बड़ी कमेटी भी फिल्म में सुधारों से संतुष्ट नहीं होती और इसे पास करने से इनकार कर देती है, तो निर्माताओं के पास देश की राजधानी दिल्ली में मौजूद अपीलीय ट्रिब्यूनल (Tribunal) का दरवाजा खटखटाने का अंतिम विकल्प होता है. हालांकि, राज मिश्रा ने साफ किया कि व्यावहारिक रूप से ऐसे मामले बहुत ही दुर्लभ होते हैं जहां किसी फिल्म को हर स्तर पर पूरी तरह खारिज कर दिया जाए.

क्रिएटिव आजादी का सम्मान, लेकिन राष्ट्र विरोधी कंटेंट पर नो-टॉलरेंस

राज मिश्रा ने स्पष्ट किया कि आधुनिक दौर और समकालीन परिस्थितियों के हिसाब से सेंसर बोर्ड के नियमों में भी लचीलापन आया है. आज के समय में कहानी की मांग के अनुसार हल्की-फुल्की हिंसा या यथार्थवाद को स्वीकार कर लिया जाता है. लेकिन अगर फिल्म में बहुत ज्यादा घिनौने, समाज में नफरत फैलाने वाले या खौफनाक दृश्य हैं, तो बोर्ड को जनहित में दखल देना ही पड़ता है.

अंत में, उन्होंने रचनात्मक स्वतंत्रता (Creative Freedom) पर बोलते हुए कहा कि फिल्ममेकर्स को पूरी आजादी मिलती है, लेकिन उसकी भी संवैधानिक सीमाएं तय हैं. कोई भी फिल्म देश विरोधी विचारों को बढ़ावा देने वाली, राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाली या देश की नीतियों को नीचा दिखाने वाली नहीं होनी चाहिए. उन्होंने बोर्ड पर किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव की खबरों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि CBFC पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ अपना काम करता है.

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