अब मुजफ्फरनगर परिवार न्यायालय के अपर प्रधान न्यायाधीश बने चर्चित जज रवि कुमार दिवाकर

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में कड़े और ऐतिहासिक फैसलों के लिए अलग पहचान रखने वाले अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक बड़ा प्रशासनिक आदेश जारी किया है। मुजफ्फरनगर के न्यायालय परिसर में अब तक अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या तीन और विशेष एनडीपीएस न्यायालय के पीठासीन अधिकारी का दायित्व संभाल रहे रवि कुमार दिवाकर को अब जिले के परिवार न्यायालय का अपर प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल मंजीत सिंह श्योरण की ओर से शुक्रवार को यह आधिकारिक स्थानांतरण और पदस्थापना आदेश जारी किया गया। मुजफ्फरनगर में 29 नवंबर 2025 से पदस्थ रहे न्यायाधीश दिवाकर का फास्ट ट्रैक कोर्ट में लगभग 11 महीने का कार्यकाल न्याय जगत के साथ-साथ आम जनता के बीच भी सबसे अधिक सुर्खियों में रहा है। उन्होंने दशकों पुरानी आपराधिक पत्रावलियों का त्वरित निस्तारण कर न्याय प्रणाली में एक मिसाल कायम की है।
मुजफ्फरनगर में हत्या के 10 मामलों में 23 को मृत्युदंड: अब तक कुल 35 अपराधियों को दे चुके हैं फांसी की सजा
न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर के न्यायिक फैसलों की फेहरिस्त बेहद सख्त और ऐतिहासिक मानी जाती है। मुजफ्फरनगर में अपने महज 11 महीने के कार्यकाल के दौरान उन्होंने फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई करते हुए हत्या के 10 अलग-अलग जघन्य मुकदमों में कुल 23 दोषियों को मृत्युदंड यानी फांसी की सजा मुकर्रर की। यदि उनके पूरे न्यायिक सफर पर नजर डाली जाए, तो वे अब तक अलग-अलग जिलों में तैनाती के दौरान कुल 35 दुर्दांत अपराधियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का न्यायिक आदेश दे चुके हैं। फास्ट ट्रैक कोर्ट-तीन की कमान संभालने के बाद उन्होंने 10 से 15 वर्ष पुरानी धूल फांक रही पत्रावलियों को प्राथमिकता के आधार पर खोला और निरंतर साक्ष्य दर्ज कर त्वरित सुनवाई पूरी की। लंबे समय से न्याय की आस में बैठे पीड़ित परिवारों के मामलों में बिना किसी विलंब के कड़े फैसले सुनाने की उनकी कार्यप्रणाली ने अपराधियों के भीतर कड़ा खौफ पैदा किया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कानून हलकों में उनके फैसलों की गूंज लगातार बनी रही।
ज्ञानवापी परिसर सर्वे आदेश से चर्चा में आए थे जज दिवाकर: लगातार मिली थीं जान से मारने की धमकियां
मुजफ्फरनगर में तैनाती से पहले न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर वाराणसी में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के पद पर कार्यरत थे, जहां उन्होंने बहुचर्चित ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वीडियोग्राफी सर्वे का ऐतिहासिक आदेश दिया था। उस फैसले के बाद वह राष्ट्रीय पटल पर चर्चा के केंद्र में आ गए थे। हालांकि, ज्ञानवापी मामले में दिए गए आदेश के उपरांत उन्हें असामाजिक और चरमपंथी तत्वों की ओर से लगातार जान से मारने की धमकियां भी मिली थीं। अपनी और परिवार की सुरक्षा को लेकर उन्होंने कई बार चिंताएं जाहिर कीं। मुजफ्फरनगर में पदस्थापना के दौरान भी उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हुए तत्कालीन एसएसपी संजय कुमार वर्मा और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को पत्र लिखकर पर्याप्त सुरक्षा मुहैया कराने की मांग उठाई थी। इसके अलावा 18 अगस्त 2026 को तत्कालीन जिला जज बिरेंद्र कुमार सिंह द्वारा उनके न्यायालय से हत्या के मामलों से जुड़ी 100 पत्रावलियों को अचानक रिकॉल किए जाने की घटना भी न्यायिक गलियारों में खासी चर्चा का विषय बनी थी।
एनडीपीएस केस में लचर कार्रवाई पर पुलिस अफसरों पर कसा था शिकंजा: डीजीपी और डीओपीटी को लिखा था पत्र
न्यायाधीश दिवाकर न केवल अपराधियों के प्रति कड़े रुख के लिए जाने जाते हैं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन में लापरवाही बरतने वाले शीर्ष पुलिस अफसरों पर भी कानूनी चाबुक चलाने से कभी पीछे नहीं हटे। हाल ही में मुजफ्फरनगर में मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े एक गंभीर एनडीपीएस मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने जांच में घोर लापरवाही और शिथिलता पाए जाने पर तीखी नाराजगी जताई थी। उन्होंने पुलिस की लचर कार्यशैली पर कड़ा संज्ञान लेते हुए मुजफ्फरनगर के तत्कालीन एसएसपी और वर्तमान में सहारनपुर परिक्षेत्र के डीआईजी अभिषेक सिंह, तत्कालीन एसपी सिटी और वर्तमान में कौशांबी के एसपी सत्यनारायण प्रजापत समेत कई विवेचकों और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसके लिए उन्होंने राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) और केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी), नई दिल्ली को सीधे पत्र भेजकर अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की संस्तुति की थी।
अब परिवार न्यायालय में सुलझाएंगे पारिवारिक विवाद: नए पदभार से न्याय व्यवस्था में नई उम्मीदें
फास्ट ट्रैक कोर्ट और एनडीपीएस की सख्त अदालतों के बाद अब रवि कुमार दिवाकर मुजफ्फरनगर के परिवार न्यायालय में अपर प्रधान न्यायाधीश के रूप में वैवाहिक विवादों, भरण-पोषण और पारिवारिक विघटन से जुड़े मामलों का निस्तारण करेंगे। आपराधिक मामलों में त्वरित न्याय और सख्त मिजाज के लिए विख्यात न्यायाधीश के इस नए पदभार को लेकर स्थानीय वकीलों और वादकारियों के बीच काफी उत्सुकता देखी जा रही है। जानकारों का मानना है कि जिस तरह उन्होंने वर्षों से लंबित हत्या और आपराधिक मामलों की पत्रावलियों को तेजी से निपटाया, उसी प्रकार परिवार न्यायालय में भी वर्षों से अटके पारिवारिक मुकदमों में समझौते और त्वरित फैसलों की प्रक्रिया को नई गति मिलेगी।




