घाटों पर खूब बजता है Maithili Thakur का ये छठ गीत: सुनते ही भक्ति में डूब जाएगा मन

लोक आस्था, पवित्रता और सूर्य उपासना के महापर्व छठ पूजा की शुरुआत के साथ ही पूरे देश में भक्ति और उल्लास का अद्भुत माहौल बन गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड सहित देश-विदेश के कोने-कोने में बसे पूर्वांचली समुदाय के घरों में पारंपरिक ठेकुआ और प्रसाद बनाने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। नदियों, तालाबों और सरोवरों के किनारे बने पावन छठ घाट रोशनी और फूलों से सजने लगे हैं। ऐसे भक्तिमय वातावरण में जब तक पारंपरिक और मन को छू लेने वाले छठ गीत न गूंजें, तब तक इस महापर्व का उत्सव अधूरा सा लगता है। युवा लोक गायिका मैथिली ठाकुर की मधुर और रूहानी आवाज में गाया गया एक ऐसा ही छठ गीत हर साल घाटों की रौनक को कई गुना बढ़ा देता है। चार साल पहले रिलीज हुआ उनका गीत ‘सोना सुरुज देव’ आज एक कल्ट क्लासिक बन चुका है, जिसे सुनते ही हर श्रद्धालु और व्रतधारी का मन अनायास ही छठी मइया और भगवान भास्कर की पावन भक्ति में लीन हो जाता है।
मधुबनी से निकलकर देश-दुनिया में अपनी पारंपरिक लोक गायकी का परचम लहराने वाली मैथिली ठाकुर ने यूं तो मैथिली, मगही, अवधी और भोजपुरी में कई भक्ति रचनाओं को स्वर दिया है, लेकिन वर्ष 2022 में रिलीज हुआ उनका छठ गीत ‘सोना सुरुज देव’ आस्था के शिखर पर स्थापित हो चुका है। हालांकि यह पारंपरिक लोकगीत बिहार की कई अन्य वरिष्ठ और विख्यात लोक गायिकाओं द्वारा भी अलग-अलग रूपों में गाया जाता रहा है, लेकिन मैथिली ठाकुर ने जब अपने शास्त्रीय अंदाज और सहज मिठास के साथ इसे 2022 में रिकॉर्ड किया, तो इस गीत ने सीधे लोगों के दिलों को छू लिया। इस गीत में उगते और डूबते भगवान सूर्य यानी ‘सुरुज देव’ की अलौकिक महिमा, कठिन 36 घंटे के निर्जला अनुष्ठान की सात्विकता और छठी मइया से संतानों के कल्याण की मार्मिक प्रार्थना को बड़े ही श्रद्धाभाव के साथ पिरोया गया है। यही कारण है कि चार वर्ष बीत जाने के बाद भी यह गीत यूट्यूब और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर हर साल टॉप ट्रेंडिंग लिस्ट में अपनी जगह बना लेता है।
‘सोना सुरुज देव’ गीत की सबसे बड़ी ताकत इसका विशुद्ध और पारंपरिक संगीत संयोजन है, जो आज के शोर-शराबे और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स से भरे गानों से बिल्कुल अलग हटकर सीधे मिट्टी की सौंधी खुशबू का अहसास कराता है। इस लोकप्रिय छठ गीत के बोल जाने-माने गीतकार राकेश निराला ने अत्यंत सहज और पारंपरिक लोक भाषा में लिखे हैं, जो लोक संस्कृति की गहराई को बयां करते हैं। वहीं इसका कर्णप्रिय और हृदयस्पर्शी संगीत निर्देशक विनय दयाल द्वारा तैयार किया गया है। गीत की रिकॉर्डिंग में सिंथेटिक साउंड्स के बजाय पूरी तरह से भारतीय पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग किया गया है। शहनाई की मंगलकारी ध्वनि, बांसुरी की मनमोहक तान, तबले और ढोलक की पारंपरिक थाप तथा मंजीरे की झंकार मिलकर एक ऐसा आध्यात्मिक वातावरण तैयार करती हैं, जो सुनते ही श्रोताओं को गांव के पोखर और गंगा घाटों की यादों में ले जाती है।
इस गीत के आधिकारिक वीडियो में छठ पूजा के चारों दिनों—नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य—के पूरे विधान को बहुत ही खूबसूरती और मर्यादा के साथ फिल्माया गया है। सूप, दउरा, गन्ना, लाल-पीली साड़ियों में सजी व्रती महिलाएं, माथे पर सिंदूर का लंबा टीका और गंगा के पवित्र जल में खड़े होकर सूर्य देव की प्रतीक्षा करते श्रद्धालुओं के दृश्य गीत की भावनात्मक अपील को कई गुना बढ़ा देते हैं। यही वजह है कि सुबह के अर्घ्य के समय जब कोहरे की चादर के बीच घाटों पर लाउडस्पीकरों पर मैथिली ठाकुर की खनकदार आवाज में ‘सोना सुरुज देव’ गूंजता है, तो वहां मौजूद हर व्रती और श्रद्धालु भाव-विभोर होकर हाथ जोड़े सूर्य देव को प्रणाम करने लगता है। यूट्यूब पर लाखों व्यूज और हजारों भावुक कमेंट्स इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि नई पीढ़ी के श्रोता भी अपनी प्राचीन लोक परंपराओं से इस गीत के माध्यम से गहराई से जुड़ रहे हैं।
जैसे-जैसे छठ पर्व नजदीक आता है, सोशल मीडिया रील्स, यूट्यूब और रेडियो चैनलों पर मैथिली ठाकुर के इस गाने की मांग कई गुना बढ़ जाती है। पटना के दीघा घाट से लेकर वाराणसी के अस्सी घाट, दिल्ली के यमुना घाट और मुंबई के जुहू चौपाटी तक, हर जगह इस गीत की गूंज सुनाई देने लगती है। विदेशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) भी छठ पर्व के दौरान इस गीत के जरिए अपनी जड़ों और मातृभूमि की स्मृतियों से जुड़े रहते हैं। लोक संगीत के जानकारों का कहना है कि मैथिली ठाकुर ने अपनी युवावस्था में लोक संस्कृति की समृद्ध परंपरा को जिस आत्मीयता से आत्मसात किया है, उसी का परिणाम है कि उनका यह छठ गीत आज कालजयी बन चुका है। आस्था, संगीत और समर्पण का यह अनूठा संगम आगामी छठ महापर्व पर भी घाट-घाट की शोभा बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है।




