मुसलमान होकर तिलक लगाते हो’, ममूटी का वीडियो देख भड़के धर्म के ठेकेदार

भारतीय सिनेमा और विशेषकर दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग के महानायक ममूटी (Mammootty) अक्सर अपनी बेहतरीन अदाकारी और सादगी के लिए जाने जाते हैं। लेकिन हाल ही में उनका एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर इस तरह वायरल हुआ कि वह कट्टरपंथियों और धर्म के तथाकथित ठेकेदारों के निशाने पर आ गए। वीडियो में ममूटी के माथे पर तिलक लगा हुआ देखकर कुछ संकीर्ण सोच वाले लोगों ने उन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। हालांकि, इस पूरे विवाद के बीच मशहूर मलयालम अभिनेता और निर्देशक हरिश्री यूसुफ (Harisree Asokan / Harisree Yusuf) खुलकर ममूटी के समर्थन में उतर आए हैं। उन्होंने धर्म के इन तथाकथित ठेकेदारों को करारा जवाब देते हुए कला, संस्कृति और भारतीय परंपरा का ऐसा पाठ पढ़ाया है, जिसकी हर तरफ सराहना हो रही है। इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कला और कलाकारों को भी धर्म के दायरे में बांधने की कोशिश की जानी चाहिए।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ममूटी का एक सार्वजनिक कार्यक्रम का वीडियो तेजी से फैलने लगा। इस वीडियो में अभिनेता के माथे पर पारंपरिक भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार तिलक सजा हुआ दिखाई दे रहा था। इसे देखते ही सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने इसे धार्मिक पहचान से जोड़ते हुए आलोचना करना शुरू कर दिया और ट्रोलिंग का दौर चल पड़ा। इन लोगों कातर्क था कि एक मुस्लिम होने के नाते उन्हें इस तरह की परंपराओं का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इस तरह की नकारात्मक और संकीर्ण टिप्पणियों ने इंटरनेट पर एक अनावश्यक विवाद को जन्म दे दिया, जिससे यह साबित होता है कि आज के दौर में कुछ लोग हर छोटी बात को नफरत और कट्टरता के चश्मे से देखने से बाज नहीं आते हैं।

जब बात हद से बढ़ने लगी और सोशल मीडिया पर ममूटी को लेकर अनावश्यक बयानबाजी तेज हुई, तो जाने-माने कलाकार हरिश्री यूसुफ ने सामने आकर इन धर्म के ठेकेदारों की बोलती बंद कर दी। हरिश्री यूसुफ ने बेहद कड़े शब्दों में उन लोगों की आलोचना की जो कला और कलाकारों को धर्म के खांचे में फिट करने की कोशिश करते हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कला का कोई धर्म नहीं होता और कलाकार केवल मानवता और संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है। यूसुफ ने भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और बहुसांस्कृतिक विरासत का हवाला देते हुए कहा कि हमारे देश में विभिन्न धर्मों के लोग एक-दूसरे के पर्वों, परंपराओं और रीति-रिवाजों का सम्मान करते आए हैं। माथे पर तिलक लगाना या किसी सांस्कृतिक समारोह का हिस्सा बनना सम्मान का प्रतीक है, न कि किसी की धार्मिक आस्था से खिलवाड़।

भारतीय सिनेमा हमेशा से विविधता में एकता का सबसे बड़ा और मजबूत स्तंभ रहा है। चाहे बॉलीवुड हो या दक्षिण का सिनेमा, यहां काम करने वाले कलाकारों ने कभी भी अपने धर्म को कला के आड़े नहीं आने दिया। ममूटी जैसे दिग्गज अभिनेता ने अपने दशकों लंबे करियर में हर तरह के किरदार निभाए हैं और हमेशा से भारतीय समाज की सेक्युलर ताने-बाने को मजबूत किया है। जब कोई अभिनेता किसी फिल्म के सेट पर या किसी सांस्कृतिक मंच पर होता है, तो उसकी पहली पहचान एक कलाकार की होती है। कट्टरपंथियों द्वारा इस तरह के मुद्दों पर विवाद खड़ा करना न केवल उस कलाकार का अपमान है, बल्कि यह देश की उस महान सांस्कृतिक परंपरा पर भी सवाल उठाता है जो सदियों से आपसी भाईचारे और सद्भाव पर टिकी हुई है।

हरिश्री यूसुफ द्वारा दिए गए करारे जवाब के बाद से सोशल मीडिया पर आम जनता और अन्य फिल्मी हस्तियों ने भी ममूटी का खुलकर समर्थन करना शुरू कर दिया है। लोगों का कहना है कि भारत की असली खूबसूरती इसकी विविधता और एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति आदर भाव में निहित है। कुछ लोग अपनी छोटी सोच के चलते इस ताने-बाने को तोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन समझदार और प्रगतिशील समाज ऐसे तत्वों को कभी सफल नहीं होने देता। ममूटी के समर्थन में उठी यह आवाज इस बात का प्रमाण है कि देश में नफरत फैलाने वालों से ज्यादा ऐसे लोग मौजूद हैं जो कला, प्रेम और राष्ट्रीय एकता को सर्वोपरि मानते हैं। यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर यह सिखाता है कि हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए और धर्म के नाम पर समाज को बांटने वाली ताकतों को हमेशा खारिज करना चाहिए।

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