अखिलेश यादव का तीखा हमला: बोले- बीजेपी ने अपना ‘जेपी’ भी बेच दिया, सरकार के इस फैसले से समाजवादी खेमे में मचा सियासी हड़कंप

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित प्रतिष्ठित जय प्रकाश नारायण सर्वोदय संस्थान (JPNIC) को लेकर सूबे की राजनीति में एक बार फिर सेवानियों और जुबानी जंग का एक नया दौर शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) और राज्य सरकार के उस कदम पर बेहद तीखा और आक्रामक हमला बोला है, जिसमें जेपीएनआईसी को निजी हाथों में सौंपने या लीज पर देने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। अखिलेश यादव ने सरकार की इस नीति पर सीधा तंज कसते हुए कहा है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने केवल सरकारी संपत्तियों को ही नहीं, बल्कि समाजवादी आंदोलन के महान नायक लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम और उनके सम्मान को भी बाजार में बेच दिया है। जेपीएनआईसी का यह पूरा प्रोजेक्ट हमेशा से समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच राजनीतिक खींचतान का केंद्र रहा है, क्योंकि सपा सरकार के कार्यकाल में बने इस भव्य भवन को लेकर दोनों दलों के अपने-अपने दावे और आरोप-प्रत्यारोप रहे हैं। हालिया घटनाक्रम के बाद से एक बार फिर यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया है और विपक्षी दल सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह से आक्रामक हो चुके हैं।

जेपीएनआईसी परियोजना का इतिहास और राजनीतिक महत्व

लखनऊ के गोमती नगर विस्तार क्षेत्र में स्थित जय प्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर (JPNIC) की परिकल्पना जब साल 2013-14 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए की गई थी, तो इसका उद्देश्य इसे देश और दुनिया का एक अत्याधुनिक सांस्कृतिक और कन्वेंशन सेंटर बनाना था। इस विशाल परिसर में आधुनिक ऑडिटोरियम, स्विमिंग पूल, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और लोकनायक जेपी को समर्पित एक भव्य संग्रहालय (Museum) का निर्माण किया जाना था, ताकि देश की युवा पीढ़ी उनके आदर्शों और आपातकाल के खिलाफ उनके संघर्ष से प्रेरणा ले सके। लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और साल 2017 में बीजेपी की सरकार आई, इस महत्वाकांक्षी परियोजना का काम लगभग ठप सा पड़ गया। सत्ता पक्ष का हमेशा से यह तर्क रहा है कि इस प्रोजेक्ट में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं और भ्रष्टाचार हुआ है, जबकि समाजवादी पार्टी का यह स्पष्ट आरोप है कि बीजेपी सरकार ने केवल राजनीतिक द्वेष और पूर्वाग्रह के चलते इस ऐतिहासिक धरोहर को खंडहर में तब्दील होने के लिए छोड़ दिया है।

लीज पर देने के प्रस्ताव पर क्यों भड़के अखिलेश यादव

हाल ही में जब शासन स्तर पर यह चर्चा तेज हुई कि जेपीएनआईसी के रखरखाव और संचालन के लिए इसे किसी निजी कंपनी या पीपीपी (Public-Private Partnership) मॉडल के तहत लीज पर दिया जा सकता है, तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया और प्रेस के माध्यम से सरकार पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि जो सरकार अपने दम पर एक भव्य और ऐतिहासिक स्मारक को संभाल नहीं सकती, उसे सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। अखिलेश ने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण वह शख्सियत थे जिन्होंने देश में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था, और आज उन्हीं के नाम पर बने संस्थान को व्यावसायिक लाभ के लिए बेचा जा रहा है। समाजवादी पार्टी का मानना है कि जेपीएनआईसी कोई आम कमर्शियल प्रॉपर्टी नहीं है, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के वैचारिक इतिहास का एक अहम हिस्सा है, जिसे किसी भी कीमत पर निजी हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा।

बीजेपी सरकार का पक्ष और प्रशासनिक तर्क

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और प्रशासनिक अधिकारियों का इस पूरे मामले पर अपना एक अलग और तकनीकी दृष्टिकोण है। सरकार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जेपीएनआईसी का निर्माण कार्य लंबे समय से अधूरा पड़ा है और यदि इसे ऐसे ही छोड़ दिया गया, तो वहां लगी करोड़ों रुपए की मशीनरी और ढांचा पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। सरकार का तर्क है कि इसे पीपीपी मॉडल या लीज पर देने से न केवल इस परिसर का बेहतर रखरखाव और आधुनिकीकरण संभव हो पाएगा, बल्कि राज्य सरकार के खजाने पर पड़ने वाला वित्तीय बोझ भी कम होगा। प्रशासनिक अमले का यह भी दावा है कि निजी क्षेत्र के आने से इस कन्वेंशन सेंटर का व्यावसायिक उपयोग बेहतर तरीके से हो सकेगा, जिससे लखनऊ के पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, राजनीतिक दबाव और समाजवादी पार्टी के विरोध के चलते सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है और इस पर अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी पहलुओं की समीक्षा की जा रही है।

लखनऊ की राजनीति पर इस विवाद का दूरगामी असर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित जेपीएनआईसी को लेकर छिड़ा यह ताजा विवाद आने वाले दिनों में और अधिक तूल पकड़ सकता है, क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर राजनीतिक अस्मिता और वैचारिक प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है और उनका कहना है कि वे सरकार के इस जनविरोधी और विरासत बेचने वाले फैसले का सड़क से लेकर सदन तक पुरजोर विरोध करेंगे। दूसरी तरफ, बीजेपी सरकार विकास और पारदर्शी संचालन के अपने दावों के साथ आगे बढ़ रही है। इस खींचतान के बीच एक बात तो बिल्कुल साफ है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नाम एक बार फिर से उत्तर प्रदेश की चुनावी और वैचारिक चर्चाओं के केंद्र में आ गया है, और जनता इस बात पर पैनी नजर रखे हुए है कि इतिहास की इन महान धरोहरों का भविष्य आखिरकार किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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