सपा छोड़ बीजेपी का दामन थामते ही बागी विधायक राकेश प्रताप सिंह ने कह दी बड़ी बात

उत्तर प्रदेश की राजनीति के गलियारों में इस समय उथल-पुथल मची हुई है और चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। राज्य के सियासी मैदान से एक बहुत बड़ी और सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जिसने समाजवादी पार्टी (SP) को अंदर से झकझोर कर रख दिया है। कभी अखिलेश यादव के बेहद करीबी और उनकी युवा ब्रिगेड के मजबूत स्तंभ माने जाने वाले अमेठी की गौरीगंज सीट से कद्दावर विधायक राकेश प्रताप सिंह ने आखिरकार 'साइकिल' का साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया है और आधिकारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। पार्टी बदलते ही राकेश प्रताप सिंह का एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया है। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर और भविष्य को लेकर एक बहुत बड़ा दावा किया है, जिसके बाद उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में बहसों का दौर शुरू हो गया है। आइए एक राजनीतिक रिपोर्टर की नजर से जानते हैं कि राकेश प्रताप सिंह ने बीजेपी में शामिल होते ही आखिर ऐसा क्या बड़ा बयान दिया और उनके इस दल-बदल के पीछे की असल इनसाइड स्टोरी क्या है।

समाजवादी पार्टी से लंबी बगावत और राज्यसभा चुनाव के बाद से बढ़ती दूरियां

इस सियासी ड्रामे की पटकथा आज नहीं बल्कि कुछ समय पहले ही लिख दी गई थी। पिछले कुछ वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने पारंपरिक गठबंधनों और वफादारियों की परिभाषा बदलकर रख दी। समाजवादी पार्टी के टिकट पर लगातार तीन बार (2012, 2017 और 2022) विधानसभा चुनाव जीतकर गौरीगंज की सीट पर अपना कब्जा जमाने वाले राकेश प्रताप सिंह पिछले दिनों तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने पार्टी लाइन से बगावत कर दी थी। विधानमंडल और राज्यसभा चुनावों के दौरान उनकी क्रॉस वोटिंग की चर्चाओं ने तूल पकड़ा था, जिसके बाद से समाजवादी पार्टी के नेतृत्व के साथ उनकी दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं। हालांकि वे तकनीकी रूप से पार्टी से अलग हो चुके थे, लेकिन उनके इस विधिवत और औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होने के कदम ने यह साफ कर दिया है कि अब वे पूरी तरह से भगवा रंग में रंग चुके हैं।

'चौथी बार भी आसानी से जीत जाता, लेकिन सनातन और सम्मान से समझौता मंजूर नहीं'

भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद जब राकेश प्रताप सिंह से यह सवाल किया गया कि वे अपनी पारंपरिक सीट और मजबूत जनाधार को छोड़कर सत्ताधारी दल में क्यों आए हैं, तो उन्होंने बहुत ही बेबाक और कड़े शब्दों में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यदि वे चाहते तो समाजवादी पार्टी में रहकर भी आगामी विधानसभा चुनाव में चौथी बार आसानी से जीत हासिल कर लेते, क्योंकि उनके क्षेत्र की जनता और उनका 'गौरीगंज परिवार' उनके साथ हमेशा चट्टान की तरह खड़ा रहा है। लेकिन उनके लिए चुनाव जीतना या केवल विधायक बने रहना ही सब कुछ नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जहां धर्म और सनातन के खिलाफ बातें हों, आस्था पर कुठाराघात किया जाए और समाज को बांटने वाली ताकतों को बढ़ावा दिया जाए, वहां राजनीति करना उनके उसूलों के खिलाफ है। उन्होंने अपने इस कदम को वैचारिक शुद्धता और सनातन संस्कृति की रक्षा से जोड़ते हुए समाजवादी नेतृत्व पर तीखा प्रहार किया है।

अमेठी के गांधी परिवार के गढ़ में बीजेपी का बड़ा और रणनीतिक सियासी दांव

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राकेश प्रताप सिंह का यह फैसला केवल व्यक्तिगत नाराजगी का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे बहुत बड़ा चुनावी गणित छिपा हुआ है। अमेठी जो कि कभी गांधी परिवार का पारंपरिक और सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता था, वहां सेंध लगाने के लिए बीजेपी लगातार रणनीति पर काम कर रही है। गौरीगंज जैसी महत्वपूर्ण विधानसभा सीट पर जहां समाजवादी पार्टी का लंबे समय से दबदबा रहा है, वहां के सबसे मजबूत और जमीनी नेता को अपने पाले में लाकर भाजपा ने आगामी चुनावों से पहले एक बहुत बड़ा मास्टरस्ट्रोक चल दिया है। इस मेगा इवेंट के दौरान केंद्रीय नेताओं और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया है कि पार्टी अवध क्षेत्र में अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत करने के लिए पूरी तरह से आक्रामक मूड में आ चुकी है।

स्थानीय स्तर पर विरोध के सुर और बीजेपी के सामने समन्वय की बड़ी चुनौती

हर बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के अपने नफा-नुकसान होते हैं। राकेश प्रताप सिंह के बीजेपी में शामिल होने से जहां एक तरफ पार्टी को अमेठी और आसपास के जिलों में एक मजबूत और आक्रामक ठाकुर चेहरा मिल गया है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच इसको लेकर सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है। गौरीगंज क्षेत्र में पहले से सक्रिय कुछ स्थानीय भाजपा नेताओं और पदाधिकारियों ने इसjoin पर अपने अंदरूनी विरोध के संकेत भी दिए हैं। ऐसे में बीजेपी संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे चुनाव से ठीक पहले सभी स्थानीय क्षत्रपों और कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर तालमेल बिठाएं, ताकि पार्टी का मूल वोटर और नया आया हुआ जनाधार एक मंच पर आकर पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ सके।

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी की सियासत में और कितने बड़े फेरबदल बाकी हैं?

राकेश प्रताप सिंह के साथ-साथ अन्य बागी विधायकों के भी पाला बदलकर बीजेपी में आने से यह साफ हो गया है कि उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव बेहद रोमांचक, दिलचस्प और कांटे की टक्कर वाला होने वाला है। दल-बदल की इस राजनीति ने यह दिखा दिया है कि आज के दौर में विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक भविष्य और समीकरण मायने रखते हैं। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें नजदीक आएंगी, राज्य के अन्य हिस्सों से भी ऐसे कई और बड़े राजनीतिक झटके देखने को मिल सकते हैं, जो उत्तर प्रदेश की सियासत की पूरी दिशा और दशा तय करेंगे।

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