सपा-कांग्रेस गठबंधन में पड़ी दरार? इमरान मसूद के तीखे तेवर और सपाइयों के हंगामे ने बढ़ाई सियासी सरगर्मी

उत्तर प्रदेश की सियासत में 'इंडिया गठबंधन' के तहत साथ आए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। लोकसभा चुनावों के बाद अब राज्य की राजनीति में गठबंधन की डोर कमजोर होती दिख रही है। ताज़ा मामला इमरान मसूद के एक बयान के बाद गर्माया है, जिसने सपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच खुली तकरार को सतह पर ला दिया है। एक तरफ इमरान मसूद ने गठबंधन के नियमों पर सवाल उठाए, तो वहीं दूसरी तरफ सपाइयों ने मोर्चा खोलते हुए मसूद को घेरना शुरू कर दिया है। यह आपसी खींचतान भविष्य में गठबंधन के बने रहने पर भी बड़े सवाल खड़े कर रही है।

इमरान मसूद का हमला और बढ़ा सियासी पारा

कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने गठबंधन की कार्यशैली को लेकर सीधा निशाना साधा है। उनका आरोप है कि गठबंधन में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की अनदेखी की जा रही है और समाजवादी पार्टी का दबदबा हावी है। मसूद के इस बयान ने कांग्रेस की स्थानीय इकाई के साथ-साथ सपा नेताओं को भी भड़का दिया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अगर यह तकरार ऐसे ही जारी रही, तो आने वाले उपचुनावों या भविष्य के चुनावों में यह गठबंधन महज कागजों तक सीमित रह जाएगा। मसूद की बेबाकी ने सपा खेमे को असहज कर दिया है, जिससे गठबंधन की एकता पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

सपाइयों का पलटवार: 'गठबंधन धर्म' का हवाला

सपा कार्यकर्ताओं ने भी इमरान मसूद के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। स्थानीय सपा नेताओं का कहना है कि गठबंधन का मतलब एक-दूसरे का सहयोग करना है, न कि अपनी ही पार्टी की छवि चमकाने के लिए दूसरे सहयोगियों पर निशाना साधना। सपाइयों ने कई स्थानों पर प्रदर्शन कर मसूद के बयानों को अनुशासनहीनता बताया है। सपा समर्थकों का तर्क है कि अगर कांग्रेस नेता इसी तरह सार्वजनिक मंचों पर गठबंधन के खिलाफ बोलेंगे, तो इससे जनता के बीच गलत संदेश जाएगा। यह आपसी बयानबाजी अब कार्यकर्ताओं के बीच झड़प में भी तब्दील होने लगी है।

क्या टूट जाएगी सपा-कांग्रेस की दोस्ती?

सियासी जानकारों का मानना है कि यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन फिलहाल अपनी परीक्षा की घड़ी से गुजर रहा है। वोट बैंक को साधने की कोशिश और अपनी पार्टी के वजूद को बचाने की जंग में दोनों दल आमने-सामने आ गए हैं। सपा मुखिया और कांग्रेस आलाकमान के बीच भले ही मधुर संबंध दिखते हों, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और नेताओं की यह तकरार गठबंधन के लिए घातक साबित हो सकती है। फिलहाल, दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को मामले को सुलझाने के लिए दखल देना होगा, वरना यह छोटी सी तकरार बड़े सियासी अलगाव का कारण बन सकती है।

 

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