श्रीनगर में आतंकी धमकियों को दरकिनार कर निकली भव्य जन्माष्टमी शोभायात्रा: एक तरफ गूंजी अजान, दूसरी ओर हरे रामा-हरे कृष्णा के भजन, कश्मीरियत और अटूट आस्था की ऐतिहासिक मिसाल

जम्मू-कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर के दिल कहे जाने वाले लाल चौक और उसके आसपास के ऐतिहासिक इलाकों में आस्था, उत्साह और निडरता का ऐसा दुर्लभ दृश्य देखने को मिला जिसने घाटी के बदलते मिजाज पर मुहर लगा दी है। सीमा पार बैठे आतंकी आकाओं और घाटी में सक्रिय छद्म आतंकी संगठनों की तमाम धमकियों, अफवाहों और बहिष्कार के फरमानों को पूरी तरह रौंदते हुए कश्मीरी पंडितों, स्थानीय नागरिकों और पर्यटकों ने मिलकर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव पर भव्य शोभायात्रा यानी 'झांकी' निकाली। पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे नन्हे बच्चे भगवान श्रीकृष्ण और राधा के स्वरूप में सजी पालकी के आगे चल रहे थे, जबकि पीछे चल रहे सैकड़ों श्रद्धालु हाथ में ध्वज और पूजा की थाली लेकर 'हरे रामा-हरे कृष्णा' और 'जय कन्हैया लाल की' के जयकारे लगा रहे थे। वर्षों तक आतंक और अलगाववाद के साए में खामोश रहे श्रीनगर के इन रास्तों पर शंख, घंटियों और मृदंग की ध्वनि ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। यह आयोजन केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं थी, बल्कि यह आतंक और विभाजनकारी सोच के खिलाफ आम कश्मीरियों की शांति और सांस्कृतिक स्वाभिमान की खुली उद्घोषणा थी।

एक तरफ गूंजी अजान और दूसरी तरफ शंखनाद: कश्मीरियत की जीवंत मिसाल

इस ऐतिहासिक शोभायात्रा का सबसे भावुक और प्रेरणादायक पहलू वह क्षण रहा जब शोभायात्रा हब्बा कदल और जहांगीर चौक के मध्यवर्ती इलाके से गुजर रही थी। ठीक उसी समय पास की मस्जिद की मीनार से नमाज की अजान की आवाज फिजा में तैरने लगी। एक तरफ लाउडस्पीकर से गूंजती अजान के पाक बोल थे, तो ठीक उसी समानांतर सड़क पर श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और गरिमा के साथ शंखनाद करते हुए कृष्ण भजनों का गायन कर रहे थे। न किसी के चेहरे पर कोई हिचक थी और न ही मन में कोई दुर्भाव। रास्ते के दोनों ओर खड़े स्थानीय कश्मीरी मुस्लिम नागरिकों ने इस शोभायात्रा का स्वागत हाथ हिलाकर और मुस्कुराकर किया। कई स्थानों पर स्थानीय दुकानदारों और युवाओं ने आगे बढ़कर जुलूस में शामिल श्रद्धालुओं को पीने का पानी, शरबत और मिठाइयां भेंट कीं। यह वही साझा विरासत और सदियों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब है जिसे कश्मीर में 'कश्मीरियत' कहा जाता है। 1990 के दशक में आई विस्थापन और हिंसा की आंधी ने भले ही इस सामाजिक ताने-बाने को चोट पहुंचाई हो, लेकिन इस दृश्य ने यह सिद्ध कर दिया कि दिलों में आपसी सम्मान की जड़ें आज भी बेहद गहरी हैं।

हब्बा कदल के ऐतिहासिक गणपत्यार मंदिर से लाल चौक तक का सफर

शोभायात्रा की शुरुआत झेलम नदी के किनारे बसे पुराने शहर (डाउनटाउन) के प्रसिद्ध और अत्यंत प्राचीन श्री गणपत्यार मंदिर से विधिवत पूजा-अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ हुई। यह मंदिर कश्मीरी हिंदू समाज की अगाध आस्था का केंद्र रहा है। वहां से भगवान श्रीकृष्ण की सजी हुई पालकी को भक्तों ने अपने कंधों पर उठाया और शोभायात्रा आगे बढ़ी। यात्रा पुराने शहर की संकरी गलियों, हब्बा कदल, बरबर शाह, क्रालखुद और मैसूमा जैसे दशकों तक बेहद संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों से होते हुए ऐतिहासिक घंटाघर (क्लॉक टॉवर), लाल चौक पर पहुंची। कभी पत्थरबाजी और बंद के कैलेंडरों के लिए कुख्यात रहे मैसूमा के बाजार में जब कृष्ण भजन गूंजे, तो स्थानीय दुकानदारों ने अपनी दुकानों के बाहर आकर इस अलौकिक दृश्य को अपने कैमरों में कैद किया। कई बुजुर्ग स्थानीय नागरिकों की आंखें यह देखकर नम हो गईं कि उनके कश्मीरी पंडित भाई-बहन एक बार फिर अपने पुश्तैनी रास्तों पर बिना किसी डर के उत्सव मना रहे हैं। लाल चौक पर पहुंचकर शोभायात्रा एक विशाल धार्मिक सभा में तब्दील हो गई, जहां श्रद्धालुओं ने आरती उतारी और प्रसाद वितरित किया।

परिंदा भी पर न मार सके: अभेद्य सुरक्षा चक्र में संपन्न हुआ महापर्व

घाटी में शांति भंग करने की फिराक में बैठे असामाजिक तत्वों और आतंकी गुटों के नापाक मंसूबों को देखते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) और सेना की राष्ट्रीय राइफल्स ने सुरक्षा के अभूतपूर्व और चाक-चौबंद बंदोबस्त किए थे। पूरी शोभायात्रा के मार्ग को संवेदनशील और अति-संवेदनशील सेक्टरों में विभाजित किया गया था। बहुमंजिला इमारतों की छतों पर अत्याधुनिक हथियारों से लैस स्नाइपर्स तैनात किए गए थे, जबकि आसमान से पूरे रूट की सतत निगरानी हाई-डेफिनिशन ड्रोन कैमरों से की जा रही थी। क्विक रिएक्शन टीम्स (QRT) और बम निरोधक दस्ते किसी भी अप्रिय स्थिति से तुरंत निपटने के लिए हर सौ मीटर की दूरी पर अलर्ट मोड पर थे। सादे कपड़ों में महिला और पुरुष पुलिसकर्मियों को भीड़ के बीच तैनात किया गया था ताकि संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। इस त्रिस्तरीय सुरक्षा घेरे और पुलिस के उच्च अधिकारियों के स्वयं जमीनी स्तर पर मौजूद रहने से श्रद्धालुओं का मनोबल आसमान छू रहा था। सुरक्षाबलों के इस दोस्ताना और मुस्तैद व्यवहार ने आम जनता के भीतर सुरक्षा का गहरा भाव पैदा किया।

कश्मीरी पंडितों के चेहरों पर झलकी खुशी, याद आए पुराने दिन

इस शोभायात्रा में भाग लेने वाले विस्थापित और घाटी में रह रहे कश्मीरी पंडितों के लिए यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से पुन: जुड़ने का भावुक अवसर था। जम्मू, दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों से विशेष रूप से इस पर्व में शामिल होने पहुंचे कई प्रवासियों ने कहा कि 30-35 साल पहले जब वे अपने घरों में जन्माष्टमी मनाते थे, तो पूरा मोहल्ला साथ मिलकर रात-रात भर भजन गाता था। आज जब नई पीढ़ी के बच्चे कृष्ण और राधा बनकर श्रीनगर के चौक-चौराहों पर घूम रहे हैं, तो ऐसा महसूस हो रहा है जैसे वक्त का पहिया सकारात्मक दिशा में घूम चुका है। श्रद्धालुओं का कहना था कि आतंकियों ने कश्मीर से हिंदुओं को निकालने और उनकी संस्कृति को मिटाने की जो साजिश रची थी, वह आज पूरी तरह नाकाम साबित हो चुकी है। युवाओं ने कहा कि आस्था को किसी बंदूक या धमकी के दम पर बंधक नहीं बनाया जा सकता। भगवान कृष्ण का संदेश ही कर्म और अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का है, और श्रीनगर की यह शोभायात्रा उसी संदेश का सजीव प्रमाण है।

बदलते जम्मू-कश्मीर और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का नया अध्याय

धारा 370 के निरसन के बाद जम्मू-कश्मीर में जिस नए युग की शुरुआत हुई है, उसमें विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों का पुनरुद्धार एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है। बीते कुछ वर्षों में कश्मीर घाटी में रिकॉर्ड संख्या में पर्यटकों का आगमन हुआ है और सिनेमा हॉल खुलने से लेकर रात्रिकालीन जनजीवन तक सामान्य हुआ है। इसी कड़ी में खीर भवानी मेला, अमरनाथ यात्रा और अब श्रीनगर में जन्माष्टमी शोभायात्रा का भव्य एवं शांतिपूर्ण आयोजन यह साबित करता है कि घाटी अब पुराने डर और अलगाववादी नैरेटिव से बहुत आगे निकल चुकी है। आज का कश्मीरी युवा हिंसा के बजाय पर्यटन, रोजगार, शिक्षा और भाईचारे की राह पर चलने को उत्सुक है। श्रीनगर की सड़कों पर अजान और भजन का यह दुर्लभ संगम दुनिया को यह कड़ा संदेश देता है कि कश्मीर नफरत की आग में नहीं, बल्कि प्यार, समन्वय और शांति के उजाले में आगे बढ़ रहा है।

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