जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी पर कड़ा प्रहार: सोपोर में इस्लामिया मॉडल स्कूल की 2 इमारतें और 6 दुकानें सील, जानिए आतंक के वित्तीय नेटवर्क पर कैसे कसा शिकंजा

केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के बारामूला जिले के सोपोर कस्बे में गैरकानूनी और देशविरोधी गतिविधियों के खिलाफ चलाए जा रहे सघन अभियान के तहत स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों ने प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी (JeI) के विरुद्ध एक और बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया है। जिला मजिस्ट्रेट बारामूला के आधिकारिक आदेशों और कानूनी दिशा-निर्देशों का अनुपालन करते हुए राजस्व विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने सोपोर स्थित इस्लामिया मॉडल स्कूल की दो बहुमंजिला इमारतों और परिसर से सटी छह व्यावसायिक दुकानों को विधिवत रूप से सील कर अपने नियंत्रण में ले लिया है। इस संपत्ति की अनुमानित बाजार कीमत करोड़ों रुपये बताई जा रही है।
कार्रवाई के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पूरे इलाके में भारी संख्या में पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के जवानों की तैनाती की गई थी। प्रशासन ने संपत्तियों पर आधिकारिक जब्ती नोटिस चस्पा करते हुए स्पष्ट किया है कि गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) की धारा 8 के प्रावधानों के तहत अब इन संपत्तियों की किसी भी प्रकार की खरीद-बिक्री, हस्तांतरण, लीज या व्यावसायिक उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। यदि कोई व्यक्ति या संस्था इस आदेश की अवहेलना करने की कोशिश करेगी, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
आतंक की फंडिंग और राष्ट्रविरोधी नेटवर्क को ध्वस्त करने की व्यापक रणनीति
गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा जमात-ए-इस्लामी को प्रतिबंधित संगठन घोषित किए जाने के बाद से ही केंद्र शासित प्रदेश में इसके वित्तीय ढांचे और भूमिगत नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने की मुहिम तेज गति से चल रही है। जांच एजेंसियों की विस्तृत रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ था कि जमात-ए-इस्लामी ने वर्षों से कश्मीर घाटी के विभिन्न हिस्सों में ट्रस्टों और शैक्षणिक संस्थानों की आड़ में अकूत संपत्तियां जुटाई थीं। इन संपत्तियों से आने वाला किराया, दान और अन्य व्यावसायिक राजस्व अप्रत्यक्ष रूप से राष्ट्रविरोधी प्रचार, अलगाववादी गतिविधियों और सीमा पार से संचालित होने वाले आतंकी तंत्र को वित्तीय मदद पहुंचाने के काम आता था।
सोपोर हमेशा से उत्तरी कश्मीर का एक संवेदनशील और प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है। ऐसे में सोपोर में स्थित इस्लामिया मॉडल स्कूल की संपत्तियों और दुकानों की जब्ती जमात के स्थानीय प्रभाव पर एक निर्णायक चोट मानी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि व्यावसायिक दुकानों से मिलने वाले मासिक किराए का उपयोग संगठन से जुड़े कैडर के भरण-पोषण और उनके नेटवर्क को जिंदा रखने के लिए किया जा रहा था। इस कार्रवाई के बाद यह पूरी वित्तीय जीवनरेखा पूरी तरह से कट गई है।
छात्रों की शिक्षा और स्थानीय व्यवस्था पर प्रशासन की स्पष्ट नीति
स्कूल परिसर की इमारतों को सील किए जाने के बाद स्थानीय नागरिकों और अभिभावकों के मन में विद्यार्थियों की पढ़ाई को लेकर चिंता स्वाभाविक थी। इस पर जिला प्रशासन और स्कूल शिक्षा विभाग ने तुरंत स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि इस कार्रवाई का उद्देश्य केवल प्रतिबंधित संगठन के अवैध वित्तीय और संगठनात्मक ढांचे को खत्म करना है, न कि निर्दोष बच्चों की शिक्षा में व्यवधान पैदा करना।
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि पंजीकृत छात्रों की शैक्षणिक गतिविधियों को सुचारू रूप से चलाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। शिक्षा विभाग ऐसे सभी संस्थानों के प्रबंधन को सीधे अपने पर्यवेक्षण में लेने या नजदीकी सरकारी विद्यालयों के साथ समन्वय स्थापित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है, ताकि किसी भी छात्र का शैक्षणिक सत्र या भविष्य प्रभावित न हो। इसके साथ ही, पाठ्यक्रम में किसी भी प्रकार की कट्टरपंथी या असंवैधानिक सामग्री न पढ़ाई जाए, इसकी सतत निगरानी के लिए एक विशेष समिति भी गठित की गई है।
घाटी भर में चल रही संपत्ति कुर्की की लंबी फेहरिस्त
सोपोर की यह कार्रवाई कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि यह राज्य जांच एजेंसी (SIA), राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा चलाई जा रही एक विस्तृत शृंखला का अभिन्न हिस्सा है। इससे पहले बारामूला, शोपियां, पुलवामा, कुलगाम, बडगाम और श्रीनगर में जमात-ए-इस्लामी से जुड़ी सैकड़ों कनाल कृषि भूमि, आवासीय बंगले, व्यावसायिक परिसर, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और गेस्ट हाउस पहले ही जब्त किए जा चुके हैं।
खुफिया एजेंसियों द्वारा तैयार की गई सूची के आधार पर उन सभी बेनामी और संस्थागत संपत्तियों की पहचान की जा रही है, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिबंधित संगठनों से जुड़ी हैं। राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने कई मामलों में यह स्थापित किया है कि कैसे 1990 के दशक से लेकर हाल के वर्षों तक सार्वजनिक जमीनों पर अतिक्रमण करके और ट्रस्टों के नाम पर हेरफेर कर इन संपत्तियों को विकसित किया गया था। सरकार की वर्तमान 'जीरो टॉलरेंस' नीति के तहत इन अवैध ढांचों को कानून के दायरे में लाकर राज्य के पक्ष में अधिगृहीत किया जा रहा है।
शांति बहाली और स्थानीय सुरक्षा व्यवस्था पर दूरगामी असर
कश्मीर घाटी में पिछले कुछ वर्षों के दौरान पथराव, हड़ताल के कैलेंडरों और अलगाववादी बंद की घटनाओं में भारी गिरावट दर्ज की गई है। सुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जब तक आतंक और अलगाववाद को पोषण देने वाले वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) पर कड़ा प्रहार नहीं किया जाता, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं हो सकती। सोपोर जैसे प्रमुख केंद्र में हुई यह जब्ती स्पष्ट संकेत देती है कि कानून का शासन सर्वोच्च है और किसी भी संगठन को शैक्षणिक अथवा सामाजिक आवरण की आड़ में कानून से बचने की छूट नहीं मिलेगी।
स्थानीय स्तर पर इस प्रकार के कदमों से आम नागरिकों का भरोसा मुख्यधारा की प्रशासनिक व्यवस्था में और मजबूत हुआ है। व्यावसायिक गतिविधियों का सामान्य संचालन और युवाओं को मुख्यधारा की आधुनिक शिक्षा से जोड़ना ही प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। अधिकारियों ने दोहराया है कि आने वाले दिनों में भी उत्तरी और दक्षिणी कश्मीर के अन्य इलाकों में चिन्हित की गई संपत्तियों पर इसी तरह की कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।



