खड़गे प्रकरण पर राजेंद्रपाल गौतम का फूटा गुस्सा, बीजेपी और आरएसएस पर साधा तीखा निशाना

भारतीय राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सामाजिक न्याय, आरक्षण और दलित नेताओं के अपमान को लेकर जुबानी जंग और तीखे हमलों का दौर एक बार फिर से तेज हो गया है. कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़े एक हालिया राजनीतिक प्रकरण को लेकर देश की सियासत में भूचाल आ गया है, जिस पर विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा लगातार तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. इसी क्रम में आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्रपाल गौतम (Rajendra Pal Gautam) ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर खुलकर हमला बोला है. उन्होंने एक तीखा बयान देते हुए कहा है कि बीजेपी और आरएसएस से जुड़े लोगों के मानस और वैचारिक पृष्ठभूमि से आज भी दलितों और पिछड़ों के प्रति छुआछूत और भेदभाव का जहर पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाया है. इस बयान के सामने आने के बाद से राष्ट्रीय राजधानी से लेकर विभिन्न राज्यों तक राजनीतिक पारा काफी हाई हो चुका है और इस पर पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी बहस छिड़ गई है.

दलित नेतृत्व और सामाजिक न्याय को लेकर छिड़ी सियासी जंग

राजेंद्रपाल गौतम ने अपने बयान में इस बात पर जोर दिया कि देश के सर्वोच्च पदों पर बैठने वाले दलित और आदिवासी नेताओं के साथ जिस प्रकार का व्यवहार राजनीतिक और सामाजिक मंचों पर किया जाता है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज भी देश के एक बड़े वर्ग की सोच सामंती और जातिगत पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है. उनका आरोप है कि जब भी कोई दलित समुदाय से आने वाला व्यक्ति अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर ऊंचे मुकाम पर पहुंचता है, तो सत्ताधारी दल और उससे जुड़े वैचारिक संगठनों के लोगों को यह बात रास नहीं आती है. खड़गे प्रकरण को इसी मानसिकता का एक हिस्सा बताते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का अपमान नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों दलितों, शोषितों और बहुजन समाज के आत्मसम्मान पर सीधा प्रहार है. इस तरह के बयानों से देश में जातिगत और वैचारिक ध्रुवीकरण की राजनीति एक बार फिर केंद्र में आ गई है, और विभिन्न दलों के नेता इस पर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में जुटे हुए हैं.

बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा पर गंभीर सवाल

विपक्ष के नेताओं का लगातार यह हमला रहा है कि बीजेपी और आरएसएस की नीतियां हमेशा से समाज के वंचित वर्गों को उनका हक देने के बजाय उन्हें दबाने वाली रही हैं. राजेंद्रपाल गौतम ने तीखे शब्दों में कहा कि वे लोग जो खुद को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पैरोकार बताते हैं, वे असल में पुरानी वर्ण व्यवस्था और असमानता की मानसिकता को पोषित करने का काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज जब देश संविधान और लोकतंत्र के रास्ते पर आगे बढ़ने की बात करता है, तब इस तरह की घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि सामाजिक समानता का लक्ष्य अभी भी हमसे काफी दूर है. इस तीखे राजनीतिक हमले के बाद से बीजेपी के नेताओं की तरफ से भी पलटवार किए जाने की पूरी संभावना है, जिससे आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक तूल पकड़ सकता है. जनता के बीच भी इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि क्या भारतीय राजनीति में जातिगत भेदभाव की जड़े अब भी उतनी ही गहरी हैं जितनी पहले हुआ करती थीं.

आने वाले चुनावी समीकरण और सामाजिक समरसता पर इसका असर

जिस प्रकार से मल्लिकार्जुन खड़गे से जुड़े इस प्रकरण को लेकर दलित राजनीति के चेहरे मुखर होकर सामने आ रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर है कि आने वाले चुनावों में सामाजिक न्याय और आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़ा चुनावी हथियार बनने वाला है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के बयानों से एक तरफ जहां बहुजन और दलित मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने की कोशिश की जाती है, वहीं दूसरी तरफ यह समाज के विभिन्न वर्गों के बीच की दूरियों को और अधिक बढ़ाने का काम भी करता है. देश को जरूरत इस बात की है कि राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक समरसता और समानता के मूल सिद्धांतों पर काम किया जाए, ताकि हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मान-सम्मान मिल सके. लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात को देखकर यही लगता है कि यह टकराव अभी और अधिक तीखा होने वाला है, और नेता इस मुद्दे को आसानी से छोड़ने वाले नहीं हैं.

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