रणबीर कपूर 44 के हुए: जब सिड, प्रेम और बनी में हर युवा को दिखता था अपना अक्स

हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली और बहुमुखी अभिनेताओं में शुमार रणबीर कपूर आज यानी 28 सितंबर 2026 को अपना 44वां जन्मदिन मना रहे हैं। कपूर खानदान की चौथी पीढ़ी के इस चमकते सितारे ने अपने लगभग दो दशक लंबे करियर में जिस तरह से खुद को बार-बार नए सांचे में ढाला है, वह भारतीय सिनेमा में अपने आप में एक अनूठी मिसाल है। एक जमाना था जब रणबीर कपूर को दर्शकों के दिलों में सीधे उतरने के लिए किसी विशालकाय सेट, भारी-भरकम सीजीआई, धांसू एक्शन सीन्स या लार्जर-दैन-लाइफ किरदारों की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ती थी। वह केवल एक सादे से कमरे में टी-शर्ट और जींस पहनकर खड़े हो जाते थे और एक ऐसे आम नौजवान का रूप धर लेते थे, जो जिंदगी की कशमकश को समझने की कोशिश कर रहा हो, जिसका दिल टूटा हो, जो करियर के दोराहे पर गलत फैसले ले रहा हो या जो यह तलाशने में जुटा हो कि उसकी असली मंजिल क्या है।

आज जब वे अपने जीवन के 44वें पड़ाव पर कदम रख चुके हैं, तो उनका सिनेमाई कैनवास पूरी तरह बदल चुका है। उनकी पिछली थिएटर रिलीज संदीप रेड्डी वांगा निर्देशित ‘एनिमल’ थी, जिसमें उन्होंने गुस्सैल, हिंसक और जटिल रणविजय सिंह के किरदार से पूरे बॉक्स ऑफिस को हिलाकर रख दिया। इसके बाद अब पूरी दुनिया की नजरें नितेश तिवारी की महाकाव्य पर आधारित फिल्म ‘रामायण’ पर टिकी हैं, जिसमें रणबीर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का पावन किरदार निभा रहे हैं। इसके तुरंत बाद वे संजय लीला भंसाली की भव्य फिल्म ‘लव एंड वॉर’ में नजर आएंगे। आज रणबीर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पैन-इंडिया सुपरस्टार्स में गिने जाते हैं, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने से पहले वे भारतीय युवाओं के सबसे आत्मीय दोस्त थे, जिनका चेहरा सिड, प्रेम, हरप्रीत, बनी और वेद के रूप में हर घर में पहचाना जाता था।

रणबीर कपूर के करियर के शुरुआती और सबसे निर्णायक दौर पर नजर डालें, तो उन्होंने ऐसे किरदार गढ़े जो ऊपर से बिल्कुल अलग थे लेकिन भीतर से वे आम आदमी की रोजमर्रा की धड़कनों के बेहद करीब थे। साल 2009 में आई अयान मुखर्जी की फिल्म ‘वेक अप सिड’ में वे सिड मेहरा बने थे—मुंबई के एक अमीर बाप का लापरवाह और दिशाहीन बेटा, जिसे कॉलेज खत्म होने के बाद यह नहीं पता था कि उसे जिंदगी से क्या चाहिए। सिड का वह असमंजस, कमरे की दीवारों पर चिपके पोस्टर और आजादी की तलाश उस दौर के हर उस युवा की अपनी दास्तान बन गई थी जो पहली बार दुनिया का सामना करने निकला था।

उसी जादुई साल में राजकुमार संतोषी की ‘अजब प्रेम की ग़ज़ब कहानी’ और शिमित अमीन की ‘रॉकेट सिंह: सेल्समैन ऑफ़ द ईयर’ रिलीज हुईं। जहां एक तरफ प्रेम एक नासमझ, बेरोजगार, हकलाता हुआ लेकिन बेइंतहा सच्चा और रोमांटिक आशिक था, वहीं दूसरी ओर हरप्रीत सिंह बेदी एक शांत, ईमानदार और जमीन से जुड़ा सिख नौजवान था जो कॉर्पोरेट दुनिया के छल-कपट के बीच अपनी शर्तों पर सफलता की इबारत लिखना चाहता था। साल 2009 की इन तीन फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि रणबीर केवल एक चॉकलेटी हीरो नहीं हैं, बल्कि वे कॉमेडी, रोमांस और गहरे संजीदा ड्रामा को एक ही सांस में जीने की दुर्लभ महारत रखते हैं।

समय का पहिया आगे बढ़ा और साल 2013 में आई ‘ये जवानी है दीवानी’, जिसने भारतीय पॉप कल्चर को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। इस फिल्म का कबीर थापर यानी ‘बनी’ सिड से कहीं ज्यादा महत्वाकांक्षी था और प्रेम से कहीं ज्यादा आत्मविश्वासी। वह उड़ना चाहता था, दौड़ना चाहता था और गिरना भी चाहता था, बस रुकना नहीं चाहता था। लेकिन बनी के भीतर भी वही जाने-पहचाने इंसानी द्वंद्व थे—दोस्ती की अहमियत, प्यार का अहसास, करियर की अंधी दौड़ और एक सपने को पूरा करने के लिए अपनों को पीछे छोड़ देने का अनजाना खौफ। बनी का यह सफर आज भी हर उस शख्स को छू जाता है जो दुनिया नापने के लिए अपने घर से दूर निकला है।

इम्तियाज अली की कालजयी फिल्म ‘तमाशा’ में रणबीर का यह आंतरिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया। इस फिल्म का मुख्य पात्र वेद बाहर से एक संभ्रांत, सफल और टाई-सूट पहनने वाला कॉर्पोरेट कर्मचारी था, लेकिन अंदर से वह एक ऐसा घुटन भरा रोबोट बन चुका था जो अपनी ही बनाई जिंदगी में कैदी था। समाज की उम्मीदों और अपनी असली कलात्मक चाहतों के बीच पिसते वेद के दर्द को रणबीर ने जिस संवेदनशीलता से पर्दे पर उतारा, उसने ‘तमाशा’ को केवल एक फिल्म नहीं बल्कि एक कल्ट सिनेमा बना दिया। इससे पहले ‘रॉकस्टार’ के जनार्दन जाखड़ (जॉर्डन) और अनुराग बसु की ‘बर्फी!’ में मूक-बधिर मर्फी बनकर उन्होंने लगातार दो साल फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीता और पारंपरिक बॉलीवुड हीरो की परिभाषा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

रणबीर कपूर का ‘पड़ोस के सीधे-सादे लड़के’ (Boy-Next-Door) से पैन-इंडिया मेगास्टार बनने का यह सफर अचानक नहीं आया, बल्कि यह एक बहुत ही सधा हुआ और क्रमिक बदलाव था। राजकुमार हिरानी की ‘संजू’ में संजय दत्त की जटिल जिंदगी को अपने भीतर उतारकर उन्होंने साबित किया कि वे किसी भी रूप में ढल सकते हैं। इसके बाद ‘ब्रह्मास्त्र’ ने उन्हें भारत के पहले बड़े पौराणिक-फैंटेसी सुपरहीरो यूनिवर्स का चेहरा बना दिया। वहीं, साल 2023 के अंत में रिलीज हुई ‘एनिमल’ ने रणबीर के सिनेमाई व्यक्तित्व के उस सबसे डार्क, आक्रामक और कच्चे पहलू को उजागर किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों के मुताबिक, ‘एनिमल’ भारत और दुनिया भर में उनके करियर की अब तक की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुई।

अब 2026 में रणबीर अपने करियर के उस सबसे पवित्र और चुनौतीपूर्ण मोड़ पर खड़े हैं जहां उन्हें भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े प्रतीक ‘भगवान राम’ के रूप में देखा जाएगा। नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही दो भागों की भव्य पैन-इंडिया फिल्म ‘रामायण’ का पहला भाग 6 नवंबर 2026 को दिवाली के पावन अवसर पर रिलीज होने जा रहा है। इस महाकाव्य में रणबीर के साथ मां सीता के किरदार में साईं पल्लवी और लंकापति रावण की भूमिका में केजीएफ फेम यश नजर आएंगे। सिड के छोटे से फ्लैट में बैठकर भविष्य की चिंता करने वाले उस युवा से लेकर आज करोड़ों लोगों के आराध्य भगवान राम का दिव्य रूप धारण करने तक, रणबीर कपूर का यह सफर असाधारण रहा है। आज उनके 44वें जन्मदिन पर भारतीय दर्शक गर्व से कह सकते हैं कि उनका अपना ‘बॉय-नेक्स्ट-डोर’ अब भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा नायक बन चुका है।

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