थाने में अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त: ’12 अप्रैल से CCTV खराब’ बताने पर भड़के जस्टिस अतुल श्रीधरन; सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी पर पुलिस को लगाई फटकार

नागरिकों को बिना औपचारिक गिरफ्तारी या विधिक प्रक्रिया के थानों में गैरकानूनी रूप से बैठाए रखने (Illegal Custody) और फिर अदालत में बचाव के लिए कैमरों की खराबी का तर्क देने की प्रवृत्ति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तीखी टिप्पणी की है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन की पीठ के समक्ष जब पुलिस विभाग की ओर से यह दलील दी गई कि थाने के सीसीटीवी (CCTV) कैमरे '12 अप्रैल से ही खराब पड़े हैं', तो अदालत ने इसे पुलिसिया जवाबदेही से बचने का एक सुविधाजनक और अस्वीकार्य हथकंडा करार दिया। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा थानों में कैमरों की अनिवार्यता को लेकर जारी किए गए ऐतिहासिक दिशा-निर्देशों का इस तरह मखौल उड़ाया जाना कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला? अवैध हिरासत और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, एक नागरिक को पुलिस द्वारा बिना किसी विधिवत एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो या 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए बिना कई दिनों तक थाने में गैरकानूनी तरीके से बैठाए रखने का आरोप लगा था।
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पीड़ित पक्ष के परिजनों ने पुलिसिया कार्रवाई और मनमानी के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) दाखिल की थी।
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याचिका में स्पष्ट आरोप लगाया गया था कि संबंधित व्यक्ति को थाने की चारदीवारी के भीतर अवैध कस्टडी में रखकर प्रताड़ित किया जा रहा है।
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अदालत ने जब मामले की निष्पक्षता और आरोपों की सच्चाई परखने के लिए थाने की घटना दिनांक की सीसीटीवी फुटेज तलब की, तो संबंधित पुलिस अधिकारियों ने हलफनामा दाखिल कर कहा कि थाने का सीसीटीवी सिस्टम 12 अप्रैल से ही तकनीकी खराबी के चलते काम नहीं कर रहा है।
'12 अप्रैल से अब तक कैमरे ठीक क्यों नहीं हुए?': जस्टिस अतुल श्रीधरन की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब पुलिस ने महीनों से कैमरे बंद होने की बात कही, तो जस्टिस अतुल श्रीधरन ने पुलिस अधिकारियों की मंशा और प्रशासनिक लापरवाही पर कड़े सवाल उठाए:
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अदालत ने टिप्पणी की कि जब भी थानों में अवैध हिरासत, हिरासत में मारपीट (Custodial Violence) या अधिकारों के हनन का मामला अदालत तक पहुंचता है, तो पुलिस का सबसे पहला और तयशुदा जवाब यही होता है कि संबंधित समय पर सीसीटीवी बंद था या खराब था।
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बेंच ने सवाल किया कि यदि 12 अप्रैल से कैमरा खराब था, तो इतने लंबे समय तक सक्षम अधिकारियों या संबंधित एजेंसी को इसकी मरम्मत के लिए सूचित क्यों नहीं किया गया? क्या सिस्टम को जानबूझकर बंद रखा गया ताकि थाने के भीतर की जाने वाली गैरकानूनी गतिविधियों का कोई डिजिटल रिकॉर्ड न बन सके?
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अदालत ने कहा कि पुलिस थानों में सीसीटीवी कोई विलासिता (Luxury) नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) और पुलिस जवाबदेही की रक्षा के लिए अनिवार्य सुरक्षा कवच है।
सुप्रीम कोर्ट के 'परमवीर सिंह सैनी' फैसले की याद दिलाई
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान देश की सर्वोच्च अदालत के ऐतिहासिक परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020) मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला दिया:
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हर कोने में कैमरा अनिवार्य: सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त आदेश दिया था कि हर पुलिस स्टेशन के प्रवेश द्वार, निकास द्वार, लॉकअप, गलियारे, इंस्पेक्टर-सब इंस्पेक्टर के कमरे और रिसेप्शन समेत सभी प्रमुख स्थानों पर नाइट विजन और ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग युक्त कैमरे लगाए जाएं।
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18 महीने का बैकअप: दिशा-निर्देशों के अनुसार, फुटेज का कम से कम एक साल (12 से 18 महीने) का डेटा सुरक्षित (Backup) रखना अनिवार्य है।
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कैमरा खराब होने पर तुरंत रिपोर्टिंग: यदि किसी थाने का कोई भी कैमरा खराब होता है, तो स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) का यह कानूनी दायित्व है कि वह उसी दिन इसकी सूचना जिला स्तरीय निगरानी समिति (DLC) और उच्चाधिकारियों को दे तथा समयबद्ध तरीके से उसे ठीक कराए।
पुलिस अधिकारियों पर तय होगी व्यक्तिगत जवाबदेही
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'सीसीटीवी खराब होने' की आड़ में मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के हनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे इस बात की विस्तृत रिपोर्ट पेश करें कि कैमरा खराब होने की आधिकारिक शिकायत कब दर्ज कराई गई थी और इसे इतने दिनों तक दुरुस्त क्यों नहीं कराया गया। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि पुलिस की ओर से जानबूझकर साक्ष्य छिपाने या अवैध हिरासत को ढकने की पुष्टि होती है, तो संबंधित दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ अवमानना (Contempt) और विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।




