50 नए तेल कुओं की ड्रिलिंग और 30,000 किमी का विशाल गैस-LPG पाइपलाइन नेटवर्क: ऊर्जा संकट के बीच हरदीप पुरी ने बताया भारत का सीक्रेट मास्टरप्लान

वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के बाजारों में अनिश्चितता के बादलों के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए अब तक के सबसे बड़े अभियानों में से एक का शंखनाद कर दिया है। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को सुरक्षित करने और विदेशी तेल आयात पर निर्भरता को निर्णायक रूप से कम करने के लिए एक बहु-स्तरीय मेगा कार्ययोजना का खुलासा किया है। सरकार की इस रणनीतिक तैयारी के दो सबसे प्रमुख स्तंभ हैं—घरेलू तेल व गैस उत्पादन को रफ्तार देने के लिए 150 नए कुओं की आक्रामक ड्रिलिंग और देश के सुदूर कोनों तक स्वच्छ ईंधन पहुंचाने के लिए 30,000 किलोमीटर से अधिक लंबे गैस एवं एलपीजी पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार।

विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर भारत के लिए ऊर्जा की मांग अगले दो दशकों में दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में सबसे तेजी से बढ़ने का अनुमान है। ऐसे में वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में आने वाले झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ताओं को सुरक्षित रखने के लिए केंद्र सरकार ने 'अन्वेषण से आपूर्ति' (Exploration to Distribution) तक के पूरे तंत्र का कायाकल्प करने की योजना जमीन पर उतार दी है। केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया है कि भारत केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों का मूक दर्शक नहीं रहेगा, बल्कि घरेलू उत्पादन में अभूतपूर्व छलांग लगाकर आत्मनिर्भरता की ठोस बुनियाद तैयार करेगा।

150 नए तेल और गैस कुओं की ड्रिलिंग: गहरे समंदर से लेकर थार के रेगिस्तान तक महा-अभियान

पेट्रोलियम मंत्रालय की इस महत्वाकांक्षी योजना का मुख्य केंद्रबिंदु देश के पारंपरिक और गैर-पारंपरिक हाइड्रोकार्बन बेसिनों में तेल और प्राकृतिक गैस की सघन खोज करना है। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की दिग्गज तेल कंपनियों—ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ONGC) और ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL)—के सहयोग से देश भर में 150 नए खोजी (Exploratory) और विकास (Development) कुओं की ड्रिलिंग का कार्य चरणबद्ध तरीके से तेज गति से आगे बढ़ाया जा रहा है। इस अभियान में गहरे समुद्री क्षेत्रों (Deepwater and Ultra-Deepwater Drilling) से लेकर तटीय और स्थलीय बेसिनों तक व्यापक स्तर पर खुदाई की जा रही है।

हाल के महीनों में अंडमान सागर के श्री विजयपुरम ब्लॉक और बंगाल की खाड़ी स्थित महानदी बेसिन के गहरे पानी में मिली प्राकृतिक गैस की ऐतिहासिक सफलताओं ने भारतीय वैज्ञानिकों और ऊर्जा रणनीतिकारों के हौसले बुलंद किए हैं। इसके अलावा, कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन, असम-अराकान फोल्ड बेल्ट, राजस्थान के बाड़मेर बेसिन और कैम्बे बेसिन में अत्याधुनिक 3D सीस्मोग्राफिक मैपिंग और आधुनिकतम रिग्स की तैनाती की जा रही है। आधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सब-सी टेक्नोलॉजी के जरिए उन परतों तक पहुंचा जा रहा है जिन्हें पहले तकनीकी रूप से दुर्गम माना जाता था। 150 कुओं की यह ड्रिलिंग न केवल भारत के घरेलू कच्चे तेल उत्पादन को बढ़ाएगी, बल्कि प्राकृतिक गैस के उत्पादन में भी ऐतिहासिक उछाल दर्ज करेगी, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार की भारी बचत संभव होगी।

30,000 किलोमीटर का राष्ट्रीय पाइपलाइन नेटवर्क: रसोई से कारखानों तक निर्बाध आपूर्ति

घरेलू स्तर पर तेल व गैस निकालना जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण है उसका त्वरित, सुरक्षित और किफायती परिवहन। इसी कड़ी में भारत सरकार देश भर में 30,000 किलोमीटर से अधिक लंबे एकीकृत राष्ट्रीय गैस एवं एलपीजी ग्रिड का निर्माण पूरा करने के बेहद करीब पहुंच चुकी है। पूर्व में ऊर्जा के बुनियादी ढांचे का विकास कुछ पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों तक ही केंद्रित था, लेकिन वर्तमान में 'वन नेशन, वन गैस ग्रिड' मिशन के तहत पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत को भी मुख्यधारा से जोड़ दिया गया है।

प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा पाइपलाइन और पूर्वोत्तर गैस ग्रिड जैसी विशालकाय परियोजनाएं उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा से लेकर असम और त्रिपुरा तक स्वच्छ ऊर्जा की जीवनरेखा बन रही हैं। इस 30,000 किलोमीटर के पाइपलाइन संजाल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह सिलेंडरों के सड़क परिवहन पर होने वाली निर्भरता और लॉजिस्टिक्स लागत को लगभग आधा कर देगा। ट्रकों के माध्यम से एलपीजी और ईंधनों की आवाजाही में होने वाले कार्बन उत्सर्जन और दुर्घटनाओं के जोखिम में भारी कमी आएगी। पाइपलाइनों के जरिए एलपीजी बॉटलिंग प्लांट्स और सीधे घरों तक पीएनजी (पाइप्ड नेचुरल गैस) की आपूर्ति इतनी सहज हो जाएगी कि मौसम या हड़ताल जैसी बाधाओं के बावजूद आपूर्ति कभी ठप नहीं होगी।

सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) और आम जनता की जेब पर पड़ने वाला सीधा असर

सरकार के इस आक्रामक ऊर्जा विस्तार का सीधा लाभ देश के 140 करोड़ नागरिकों और घरेलू उद्योग जगत को मिलने जा रहा है। सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) नेटवर्क के 11वें और 12वें राउंड की सफल बोलियों के बाद देश का 98 प्रतिशत से अधिक भौगोलिक क्षेत्रफल और लगभग समूची आबादी अब सीएनजी और पीएनजी नेटवर्क के दायरे में लाई जा रही है।

जब एलपीजी और प्राकृतिक गैस का परिवहन 30 हजार किलोमीटर लंबी पाइपलाइनों के माध्यम से होगा, तो बॉटलिंग और वितरण कंपनियों के परिचालन खर्च में भारी कमी आएगी। इसका प्रत्यक्ष लाभ आम उपभोक्ताओं को सस्ते गैस सिलेंडर, बिना रुकावट 24 घंटे चलने वाली रसोई पीएनजी और पेट्रोल-डीजल के मुकाबले बेहद किफायती सीएनजी के रूप में मिलेगा। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर लाखों नए रोजगारों का सृजन होगा—चाहे वह पाइपलाइन बिछाने का सिविल कार्य हो, कंप्रेशर स्टेशनों का संचालन हो या शहरी गैस वितरण नेटवर्क के अंतिम छोर तक सर्विसिंग की व्यवस्था। ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत में रहने वाली महिलाओं को धुआं-मुक्त रसोई और उज्‍ज्‍वला 2.0 के तहत मिलने वाली गैस की उपलब्धता में किसी प्रकार की देरी का सामना नहीं करना पड़ेगा।

पश्चिम एशिया संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य: भारत की सामरिक आत्मनिर्भरता क्यों है वक्त की जरूरत?

वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य पर नजर डालें तो इस महा-परियोजना का समय अत्यंत महत्वपूर्ण और रणनीतिक है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल व्यापार के सबसे संवेदनशील समुद्री गलियारे—स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) और बाब अल-मंदेब (Bab el-Mandeb)—पर लगातार युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर आता है।

हरदीप सिंह पुरी ने इस भू-राजनीतिक संकट की ओर इशारा करते हुए रेखांकित किया है कि दुनिया में कहीं भी युद्ध भड़कने पर आपूर्ति शृंखलाएं टूट जाती हैं और कच्चे तेल के दाम आसमान छूने लगते हैं। भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर और 60 दिनों के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) को सुरक्षित रखकर अब तक घरेलू ईंधन की कीमतों को नियंत्रित रखा है। लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल घरेलू क्षमता को कई गुना बढ़ाने में ही छिपा है। 150 नए कुओं से तेल की निकासी और 30 हजार किमी की आंतरिक पाइपलाइन कनेक्टिविटी देश के भीतर एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार कर देगी जो बाहरी दुनिया के किसी भी तेल संकट या प्रतिबंधों के दबाव से भारत को पूरी तरह सुरक्षित रखेगा। भारत का यह कदम ऊर्जा क्षेत्र में वैश्विक महाशक्ति बनने की दिशा में एक निर्णायक मील का पत्थर साबित होगा।

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