बॉलीवुड के दोहरे चरित्र पर एकता कपूर का तीखा प्रहार: भक्ति से नोट छापने वालों को तिलक से क्यों है चिढ़?

मनोरंजन की चकाचौंध से भरी मायानगरी मुंबई के बंद कमरों में चलने वाले पाखंड और वैचारिक दोहरेपन का एक ऐसा कच्चा-चिट्ठा सामने आया है, जिसने बॉलीवुड के तथाकथित लिबरल और एलीट तबके को कटघरे में खड़ा कर दिया है। भारतीय टेलीविजन और सिनेमा को दशकों तक दिशा देने वाली दिग्गज फिल्म निर्माता एकता कपूर ने इंडस्ट्री के भीतर दशकों से जड़ें जमाए बैठे ‘हिंदूफोबिया’ और सांस्कृतिक संकोच पर पहली बार खुलकर तीखा हमला बोला है। मशहूर पॉडकास्टर रणवीर अलाहबादिया के चर्चित चैट शो में पहुंचीं एकता कपूर ने बेबाक अंदाज में सवाल उठाया कि जो फिल्म इंडस्ट्री आज भगवान शिव, हनुमान, देवी-देवताओं और लोककथाओं पर आधारित बड़े बजट की भक्ति फिल्में बनाकर बॉक्स ऑफिस पर सैकड़ों करोड़ रुपये की कमाई कर रही है, वही इंडस्ट्री असल जिंदगी में सनातन प्रतीकों को धारण करने वाले लोगों को दोयम दर्जे का और हीन भावना से क्यों देखती है? एकता ने सीधे लफ्जों में उस कड़वी हकीकत को उजागर किया जहां पश्चिमी सभ्यता के हर चलन को आधुनिकता का तमगा दे दिया जाता है, लेकिन अगर कोई भारतीय अपनी आस्था, माथे पर तिलक या हाथ में रक्षा सूत्र को गर्व के साथ अपनाता है, तो उसे इंडस्ट्री के तथाकथित बौद्धिक सर्कल्स में उपहास का पात्र बना दिया जाता है।

कैमरे के सामने हमेशा माथे पर पीला-चंदन तिलक, गले में रक्षा सूत्र, हाथों में कलावा और विभिन्न ग्रहों की अंगूठियां पहने नजर आने वाली एकता कपूर का यह रूप दशकों से दर्शकों और मीडिया के लिए बेहद परिचित रहा है। लेकिन इस रूप के पीछे उन्हें अपने शुरुआती दौर में किस कदर सामाजिक और पेशेवर प्रताड़ना का सामना करना पड़ा, इसका दर्द अब उनकी जुबान पर छलक पड़ा है। एकता ने भारी मन से याद किया कि जब वे अपने करियर की शुरुआत में माथे पर तिलक लगाकर बैठकों, पार्टियों या फिल्म सेट पर जाती थीं, तो इंडस्ट्री के बड़े-बड़े लोग पीठ पीछे उन्हें ‘सनकी’ (Freak) और यहां तक कि ‘तांत्रिक’ का तमगा दे दिया करते थे। एकता ने तीखे शब्दों में पूछा कि माथे पर एक साधारण सा तिलक लगाना या हाथ में कलावा बांधना किसी को अजीब या असभ्य कैसे बना सकता है? उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों में लोग अगर अपनी आस्था से जुड़े क्रॉस या अन्य प्रतीकों को खुलेआम पहनते हैं, तो उसे ‘कूल’ और निजी स्वतंत्रता माना जाता है, लेकिन भारत में रहकर अपनी ही सनातनी जड़ों को जाहिर करना आखिर इतना बड़ा अपराध या चर्चा का विषय क्यों बन जाता है?

पॉडकास्ट के दौरान एकता कपूर ने अपने निजी जीवन का एक बेहद आंखें खोलने वाला किस्सा साझा किया, जो बॉलीवुड के तथाकथित कुलीन वर्ग के खोखलेपन को पूरी तरह बेनकाब करता है। उन्होंने बताया कि एक बार वे शाम को मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना करने के बाद सीधे अपने दोस्तों के साथ मुंबई के एक हाई-प्रोफाइल नाइटक्लब पहुंची थीं। जब वहां मौजूद कुछ लोगों ने उनके माथे पर लगा चंदन और प्रसाद देखा, तो वे हैरान रह गए और बेहद अजीबोगरीब नजरों से पूछने लगे कि क्या वे सचमुच मंदिर होकर क्लब आई हैं। एकता ने इस संकीर्ण मानसिकता पर पलटवार करते हुए कहा कि इसमें चौंकने वाली क्या बात है? क्या भगवान की आराधना करने वाला इंसान संगीत, दोस्तों के साथ पार्टी या आधुनिक जीवन का आनंद नहीं ले सकता? उन्होंने कहा कि वे हमेशा से अपनी आस्था और अपनी आधुनिक जीवनशैली दोनों को बिना किसी संकोच के साथ लेकर चली हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि धार्मिक होने का मतलब दकियानूसी होना नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करते हुए दुनिया के साथ कदमताल करना है।

एकता कपूर का यह विस्फोटक बयान ऐसे समय में आया है जब उनकी हालिया रिलीज लोककथा-आधारित फैंटेसी फिल्म ‘द वीवन’ (The V Vaan) बॉक्स ऑफिस पर 90 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर चुकी है। इस फिल्म की सफलता का हवाला देते हुए उन्होंने इंडस्ट्री के रचनाकारों के वैचारिक दिवालियापन पर प्रहार किया। एकता ने कहा कि बॉलीवुड के निर्देशक और लेखक हॉलीवुड की विदेशी फैंटेसी कहानियों, मार्वल यूनिवर्स, हैरी पॉटर और पश्चिमी एनिमेशन को तो बड़े चाव से सराहते हैं और उन पर अरबों रुपये खर्च करने को तैयार रहते हैं, लेकिन जब भारत की समृद्ध लोककथाओं, यक्ष-गंधर्वों, वेदों और पौराणिक मिथकों पर फिल्म बनाने की बात आती है, तो उनके हाथ-पांव फूलने लगते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक लंबे समय तक इंडस्ट्री के एक विशेष धड़े ने भारतीय संस्कृति और आस्था से जुड़ी कहानियों को जानबूझकर मुख्यधारा के सिनेमा से दूर रखा, क्योंकि वे इसे ‘पिछड़ा’ और गैर-धर्मनिरपेक्ष मानते थे। लेकिन हाल के वर्षों में ‘कांतारा’, ‘कार्तिकेय 2’ और अब ‘द वीवन’ जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि भारत का आम दर्शक अपनी मिट्टी और पौराणिक जड़ों से जुड़ी कहानियों को देखने के लिए थियेटर्स में उमड़ रहा है।

एकता कपूर ने अपनी बात को सकारात्मक दिशा में मोड़ते हुए कहा कि आज का भारत अब 90 के दशक या 2000 के शुरुआती दौर जैसा नहीं रहा, जहां पश्चिमी अनुमोदन (Western Validation) पाना ही सफलता का अंतिम पैमाना माना जाता था। आज की नई पीढ़ी यानी ‘जेन-जी’ (Gen Z) अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर किसी हीन भावना की शिकार नहीं है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज, जयपुर और इंदौर जैसे शहरों से लेकर देश के महानगरों तक के युवा आज बिना किसी झिझक के माथे पर तिलक लगाकर दफ्तरों और कॉलेजों में जा रहे हैं, महाकाल और केदारनाथ के दर्शन की रील्स बना रहे हैं और अपनी सनातन पहचान को शान से फ्लॉन्ट कर रहे हैं। एकता ने खुद को मजाकिया अंदाज में अपने दौर की ‘जेन-जी’ बताते हुए कहा कि वे उस समय भी बिना डरे अपनी आस्था के साथ खड़ी रहीं जब इंडस्ट्री में ऐसा करना अपने करियर को दांव पर लगाने जैसा माना जाता था।

एकता कपूर के इस बेबाक इंटरव्यू ने बॉलीवुड के उस सिंडिकेट को आईना दिखाया है जो वर्षों से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आस्थाओं का मजाक उड़ाता रहा है। यदि किसी निर्माता या अभिनेता को धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक प्रतीकों से व्यक्तिगत रूप से इतनी ही एलर्जी है, तो फिर उन्हें सनातन संस्कृति की कहानियों और भक्ति से करोड़ों का मुनाफा कमाने का भी कोई नैतिक हक नहीं होना चाहिए। जनता का मिजाज अब पूरी तरह बदल चुका है; दर्शक अब परदे पर और परदे के पीछे भी प्रामाणिकता और सम्मान की मांग कर रहे हैं। एकता कपूर का यह साहसिक कदम निसंदेह इंडस्ट्री के उन तमाम कलाकारों और रचनाकारों को हिम्मत देगा जो अब तक अपनी आस्था को किसी कोने में छिपाने के लिए मजबूर थे।

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