Super El Niño Alert: 1982, 1997 और 2015 के रिकॉर्ड भी होंगे ध्वस्त? 1000 साल पुराने कोरल की रिपोर्ट में हुआ अब तक के सबसे भयंकर अल नीनो का खुलासा

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और लगातार गर्म होते समंदर ने अब दुनिया के सबसे बड़े वेदर पैटर्न यानी अल नीनो (El Niño) को एक अभूतपूर्व विनाशकारी मोड़ पर ला खड़ा किया है। प्रशांत महासागर से सामने आ रहे नए वैज्ञानिक आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों ने मौसम वैज्ञानिकों के होश उड़ा दिए हैं। 1,000 साल पुराने कोरल (मूंगा चट्टानों) पर किए गए एक वैश्विक अध्ययन में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इंसानी गतिविधियों और ग्लोबल वार्मिंग के चलते अल नीनो पहले से करीब 36% ज्यादा उग्र और अस्थिर हो चुका है।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि उभरता हुआ यह 'सुपर अल नीनो' (Super El Niño) इतिहास के सबसे भयानक माने जाने वाले 1982-83, 1997-98 और 2015-16 के अल नीनो के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकता है।
1,000 साल पुरानी 'टाइम मशीन': कोरल से कैसे खुला 1000 वर्षों का समुद्री राज?
मौसम उपग्रहों और आधुनिक थर्मामीटर से समुद्री तापमान का सटीक डेटा हमें केवल पिछले 40 से 50 सालों से ही मिल रहा है। इसलिए सदियों पुराने जलवायु इतिहास को समझने के लिए मिशिगन यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जूलिया कोल और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की टीम ने प्रशांत महासागर के प्राचीन कोरल का सहारा लिया।
कोरल हर साल 1 से 2 सेंटीमीटर बढ़ते हैं और उनके कंकालों में उस समय के समुद्री पानी के रासायनिक तत्व (जैसे स्ट्रोंटियम, कैल्शियम और ऑक्सीजन आइसोटोप) दर्ज होते रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इस प्राकृतिक टाइम मशीन का विश्लेषण कर पिछले 1,000 वर्षों के हर महीने के तापमान का सटीक ग्राफ तैयार किया। रिसर्च से पता चला कि साल 1000 से 1850 (औद्योगिक क्रांति से पहले) तक अल नीनो के उतार-चढ़ाव सीमित थे, लेकिन पिछले चार दशकों में समुद्री तापमान की यह अस्थिरता अप्रत्याशित रूप से 36% तक बढ़ चुकी है।
1982, 1997 और 2015 से कितना अलग और खतरनाक है यह अल नीनो?
अल नीनो के इतिहास में 1982, 1997 और 2015 के वर्षों को वैश्विक अर्थव्यवस्था और मौसम के लिए सबसे विनाशकारी 'सुपर अल नीनो' माना जाता है, जिन्होंने अरबों डॉलर का नुकसान और लाखों लोगों को सूखे व बाढ़ की चपेट में धकेला था।
| सुपर अल नीनो वर्ष | वैश्विक प्रभाव और विशेषताएं | अनुमानित नुकसान / प्रभाव |
| 1982-83 | गैलापागोस के 95% कोरल नष्ट, केन्या में बाढ़, ब्राजील-इंडोनेशिया में भयंकर सूखा | $4.1 ट्रिलियन की आर्थिक क्षति |
| 1997-98 | आधुनिक इतिहास का सबसे तीव्र अल नीनो, महामारियां और वैश्विक आपदाएं | $5.7 ट्रिलियन का नुकसान, 23,000+ मौतें |
| 2015-16 | रिकॉर्ड समुद्री गर्मी, भारतीय मॉनसून में कमी (86% LPA), भारी भुखमरी संकट | 60 मिलियन से ज्यादा लोगों को खाद्य सहायता की जरूरत |
| आगामी सुपर अल नीनो | पहले से उबलते हुए तीनों महासागरों (प्रशांत, अटलांटिक, हिंद) के साथ तालमेल | 2027 तक वैश्विक तापमान के सारे रिकॉर्ड टूटने की आशंका |
पिछली सदियों के अल नीनो केवल प्रशांत महासागर के गर्म होने तक सीमित थे और बाकी महासागर अपेक्षाकृत सामान्य थे। इसके विपरीत, वर्तमान में प्रशांत, अटलांटिक और हिंद महासागर पहले से ही ग्लोबल वार्मिंग के चलते रिकॉर्ड स्तर पर गर्म हैं। जब यह नया अल नीनो पहले से गर्म समंदर के ऊपर अपनी अतिरिक्त ताप ऊर्जा जोड़ेगा, तो वायुमंडलीय सिस्टम पूरी तरह अनियंत्रित हो सकता है।
भारत और दुनिया पर क्या होंगे इसके विनाशकारी प्रभाव?
इस अध्ययन और मौसम मॉडल की चेतावनियों के अनुसार, आने वाले सुपर अल नीनो के चरम पर पहुंचने से वैश्विक स्तर पर बड़े संकट पैदा हो सकते हैं:
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भारतीय मॉनसून पर दबाव: अल नीनो के सक्रिय होने से भारतीय उपमहाद्वीप में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं, जिससे खरीफ फसलों के उत्पादन पर संकट और कई राज्यों में सूखे के हालात बन सकते हैं।
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जंगलों में आग और भीषण सूखा: दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया) और मध्य अमेरिका में वर्षा में भारी कमी आएगी, जिससे जंगलों में भीषण आग और पाम ऑयल व कोको जैसे कृषि उत्पादों की वैश्विक कमी हो सकती है।
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तटीय इलाकों में प्रलयंकारी बाढ़: दक्षिण अमेरिका (पेरू, इक्वाडोर) और पूर्वी अफ्रीका में मूसलाधार बारिश से बड़े पैमाने पर बाढ़ और जलजनित बीमारियों (जैसे हैजा और डेंगू) का प्रसार हो सकता है।
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2027 तक तापमान के रिकॉर्ड टूटना: वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अल नीनो की गर्मी वायुमंडल में फैलने के बाद आगामी वर्षों, विशेषकर 2027 तक धरती का औसत तापमान नए ऐतिहासिक शिखर को छू सकता है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी: अब संभलने का समय
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि 1000 साल पुराने कोरल के प्रमाण यह स्पष्ट करते हैं कि अल नीनो का यह उग्र रूप अब केवल एक प्राकृतिक चक्र नहीं, बल्कि इंसानों द्वारा बढ़ाई गई ग्लोबल वार्मिंग का सीधा नतीजा है। यदि दुनिया भर के देशों ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए, तो भविष्य के ये सुपर अल नीनो वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पेयजल आपूर्ति और तटीय जीवन के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाएंगे।



