‘वैवाहिक कलह गर्भपात का आधार नहीं बन सकती, गर्भ में पल रहे बच्चे पर पिता का भी अधिकार है’: सुप्रीम कोर्ट की बेहद अहम और कड़े शब्दों में टिप्पणी

भारतीय न्यायपालिका और पारिवारिक कानूनों के दायरे से इस वक्त देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) से एक बहुत ही संवेदनशील, मार्मिक और कानूनी रूप से दूरगामी असर डालने वाली बड़ी खबर सामने आ रही है। देश की शीर्ष अदालत ने 6 महीने से अधिक यानी गर्भावस्था के एक गंभीर और एडवांस स्टेज में गर्भपात (Abortion) की अनुमति मांगने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बेहद स्पष्ट और सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि पति-पत्नी के बीच होने वाला आपसी झगड़ा, वैवाहिक कलह (Matrimonial Discord) या घरेलू अनबन कभी भी गर्भपात का कानूनी या नैतिक आधार नहीं हो सकती है। अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि केवल पति-पत्नी के आपसी विवादों के कारण गर्भ में पल रहे स्वस्थ शिशु के जीवन को समाप्त करने की अनुमति दी जाने लगे, तो हमारा समाज किस दिशा में आगे बढ़ेगा। इस बहुचर्चित मामले में अदालत ने पिता के अधिकारों और अजन्मे बच्चे के संरक्षण को लेकर भी कई अहम बातें कही हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट की इस बेंच ने सुनवाई के दौरान क्या-क्या टिप्पणियां की हैं और इस पूरे कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि क्या है।

6 महीने से अधिक की गर्भावस्था और गर्भपात की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

यह पूरा कानूनी मामला तब प्रकाश में आया जब एक विवाहित महिला ने अपनी 6 महीने से अधिक की यानी लगभग एडवांस्ड प्रेगनेंसी को कानूनी रूप से समाप्त करने (Medical Termination of Pregnancy) की अनुमति मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। महिला ने अपनी याचिका में यह आरोप लगाया था कि उसके पति और ससुराल पक्ष के लोग उसके साथ बुरा बर्ताव करते हैं और उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, जिसके चलते वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है।

दूसरी ओर, इस याचिका का पुरजोर विरोध करते हुए महिला के पति ने अदालत में अपना पक्ष रखा और कहा कि गर्भ में पल रहे उस अजन्मे बच्चे पर पिता का भी पूरा अधिकार है। पति ने अदालत को भरोसा दिलाया कि बच्चे के जन्म के बाद वह उसकी पूरी जिम्मेदारी उठाने और उसकी उचित देखभाल करने के लिए पूरी तरह तैयार है, इसलिए उसने कोर्ट से अनुरोध किया कि गर्भपात की अनुमति न दी जाए। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सीधे तौर पर याचिकाकर्ता महिला से भी बातचीत की और उसके मन की बात जानने का प्रयास किया।

"क्या पति-पत्नी का झगड़ा गर्भपात की वजह बन सकता है?": जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की सख्त टिप्पणी

इस संवेदनशील मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice B.V. Nagarathna) और जस्टिस आर. महादेवन (Justice R. Mahadevan) की बेंच कर रही है। सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों ने वैवाहिक विवादों और गर्भपात के अधिकारों के बीच एक बहुत ही बारीक और महत्वपूर्ण कानूनी रेखा खींचते हुए कड़े सवाल उठाए।

बेंच ने स्पष्ट रूप से कहा कि कानूनन गर्भपात की अनुमति किन परिस्थितियों में दी जा सकती है, यह पूरी तरह तय है—जैसे कि बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामले, या फिर जब मेडिकल रिपोर्ट्स में यह साबित हो जाए कि भ्रूण में कोई गंभीर या लाइलाज शारीरिक विकलांगता या मेडिकल कॉम्प्लिकेशन है। लेकिन यह मामला उन सभी श्रेणियों से बिल्कुल अलग है। कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "अगर कोई महिला सिर्फ इसलिए गर्भपात का फैसला ले ले कि उसके पति और ससुराल वालों ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया है या उनके बीच आपसी कलह है, तो समाज के रूप में हम किस दिशा में जा रहे हैं? पति-पत्नी के बीच मनमुटाव और एक-दूसरे के खिलाफ कड़वी बातें होना एक आम बात हो सकती है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इस आधार पर छह महीने से अधिक के गर्भ को समाप्त कर दिया जाए।"

अजन्मे बच्चे पर पिता के अधिकार और सामाजिक दायित्वों पर अदालत का गंभीर मंथन

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि जब एक गर्भ में छह महीने से अधिक का जीवन पल रहा हो, तो उसमें केवल मां का ही नहीं, बल्कि जैविक पिता का भी नैतिक और कानूनी अधिकार शामिल होता है। अदालत ने अपने मौखिक अवलोकन में कहा कि यह मामला न तो किसी प्रकार के यौन उत्पीड़न का है और न ही किसी अकेली महिला के गर्भवती होने का प्रकरण है, जहाँ सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न सबसे ऊपर हो।

बेंच ने कहा कि जब पति अदालत में यह लिखित और मौखिक रूप से कह रहा है कि वह बच्चे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी लेने को तैयार है, तो केवल आपसी मतभेदों और पति-पत्नी के झगड़े को आधार बनाकर गर्भपात की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि न्यायपालिका को ऐसे मामलों में बहुत ही संतुलित और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाना होता है, क्योंकि एक तरफ जहां महिला के मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा का सवाल होता है, वहीं दूसरी तरफ एक नए जीवन के अधिकार और समाज के नैतिक ताने-बाने की रक्षा करना भी अदालत की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है।

चरित्र पर लगाए गए आरोपों और सुलह को लेकर कोर्ट का बड़ा निर्देश

इस कानूनी विवाद की मुख्य जड़ में पति द्वारा अपनी पत्नी के चरित्र पर उठाए गए कुछ सवाल और लगाए गए आरोप थे, जिसके कारण महिला का मानसिक तनाव और अधिक बढ़ गया था। महिला का कहना था कि वह इस अपमानजनक माहौल में अपने बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती और तुरंत वैवाहिक बंधन से मुक्ति पाना चाहती है।

महिला की इस पीड़ा को समझते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पति को कड़ी चेतावनी दी और कहा कि यदि वह अपनी वैवाहिक जिंदगी को बचाना चाहता है और सुलह की दिशा में पहला सकारात्मक कदम उठाना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अदालत में एक औपचारिक हलफनामा (Affidavit) दाखिल करना होगा। इस हलफनामे के जरिए पति को अपनी पत्नी पर लगाए गए सभी आपत्तिजनक और निराधार आरोपों को आधिकारिक रूप से वापस लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अगली सुनवाई के लिए बुधवार की तारीख तय की है, जिस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं कि क्या यह जोड़ा अपने मतभेदों को भुलाकर एक नई शुरुआत करेगा या कानूनी लड़ाई आगे बढ़ेगी।

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