Eetha Trailer Review: ‘नाचते हुए मरी तो मिसाल बन जाऊंगी…’ जब नववारी पहन मंच पर उतरीं श्रद्धा कपूर; तमाशा कलाकारों के प्रति बदल जाएगी देखने की सोच!

Eetha movie trailer review : बॉलीवुड अभिनेत्री श्रद्धा कपूर ने अपनी सुपरहिट हॉरर-कॉमेडी छवि से एकदम अलग हटकर एक ऐसा रूप धारण किया है जिसने पूरे सिनेमा जगत और दर्शकों को स्तब्ध कर दिया है। निर्देशक लक्ष्मण उतेकर की बहुप्रतीक्षित बायोपिक फिल्म ‘ईठा’ (Eetha) का आधिकारिक ट्रेलर रिलीज हो चुका है और रिलीज होते ही यह सोशल मीडिया पर छा गया है। महाराष्ट्र की समृद्ध लोककला, लावणी और तमाशा परंपरा की बेताज मलिका यानी ‘तमाशा सम्राज्ञी’ विठाबाई भाऊ मांग नारायणगांवकर के संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित यह फिल्म न केवल एक असाधारण कलाकार की गाथा कहती है, बल्कि तमाशा कलाकारों को लेकर समाज के संकीर्ण नजरिए को भी सीधी चुनौती देती है। 3 मिनट से अधिक लंबे इस रोंगटे खड़े कर देने वाले ट्रेलर में श्रद्धा कपूर नौवारी साड़ी, नाक में नथ, पैरों में भारी घुंघरू और आंखों में गजब का स्वाभिमान लिए मंच पर आग लगाती नजर आ रही हैं।

फिल्म ‘ईठा’ सिर्फ एक पारंपरिक डांस ड्रामा या म्यूजिकल फिल्म नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी महिला कलाकार की सच्ची दास्तान है जिसने गरीबी, सामाजिक तिरस्कार और व्यक्तिगत त्रासदियों के बीच अपनी लोककला को अमर बना दिया। विठाबाई नारायणगांवकर का जीवन इतना समर्पित था कि नौ महीने के गर्भ के दौरान मंच पर प्रस्तुति देते समय उन्हें प्रसव पीड़ा हुई, उन्होंने स्टेज के पीछे बच्चे को जन्म दिया और तुरंत अपनी कला के प्रति समर्पण दिखाते हुए दोबारा मंच पर लौटने को तैयार हो गईं। समाज ने भले ही तमाशा कलाकारों को लंबे समय तक केवल मनोरंजन की वस्तु समझा हो, लेकिन विठाबाई ने अपनी कला के दम पर राष्ट्रपति भवन तक अपनी पहचान बनाई और 1962 के युद्ध में भारतीय जवानों का हौसला बढ़ाने सीमा तक भी पहुंचीं। ट्रेलर इस बात की साफ गवाही देता है कि फिल्म विठाबाई की प्रसिद्धि से ज्यादा उनके भीतर के अटूट आत्मसम्मान और विद्रोह को सामने लाती है।

ट्रेलर का सबसे प्रभावशाली और झकझोर देने वाला पहलू इसके चुटीले, गंभीर और धारदार संवाद हैं। श्रद्धा कपूर का एक संवाद हर किसी की जुबान पर चढ़ गया है:

“पड़े-पड़े मरी तो बेचारी कहलाऊंगी, पर नाचते हुए मरी तो मिसाल बन जाऊंगी।”

यह एक पंक्ति विठाबाई के पूरे जीवनदर्शन और अपनी कला के प्रति दीवानगी को बयां करने के लिए काफी है। इसी तरह जब एक दृश्य में कोई उनकी वेशभूषा पर तंज कसता है, तो ईठाबाई गरजकर जवाब देती हैं कि “यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, यह हमारी नौवारी है… यह अभिमान है, मराठी संस्कृति का सम्मान और हमारी पहचान है।” वहीं किरदार के व्यक्तिगत दर्द और धोखे को उजागर करता एक और संवाद दर्शकों को भावुक कर देता है—“मेरा भरोसा ही मेरा घमंड था रे, जब वो टूट गया ना, सब टूट गया।” ये डायलॉग्स साबित करते हैं कि फिल्म में केवल बाहरी तड़क-भड़क नहीं, बल्कि गहरी भावनात्मक परतें हैं।

इस फिल्म के जरिए श्रद्धा कपूर ने अपने करियर का अब तक का सबसे कठिन और जोखिम भरा किरदार निभाया है। महाराष्ट्रियन संस्कृति और लावणी के तेज बोल, जटिल फुटवर्क और भाव-भंगिमाओं को जिस सहजता और गरिमा के साथ श्रद्धा ने पकड़ा है, वह काबिले-तारीफ है। मंच पर उतरते समय उनका आत्मविश्वास और निजी जीवन में उनका अकेलापन दोनों ही उनके चेहरे के भावों में साफ झलकता है। श्रद्धा के साथ-साथ ट्रेलर में रणदीप हुड्डा का सख्त और प्रभावशाली अंदाज देखने को मिलता है, जो कहानी के तनाव को और बढ़ाते हैं। इसके अलावा मोहम्मद जीशान अय्यूब, सिद्धार्थ जाधव और अनंत जोशी जैसे मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी यह सुनिश्चित करती है कि कहानी का हर दृश्य अभिनय के स्तर पर बेहद सधा हुआ रहेगा।

जब बात महाराष्ट्र की लोककला और लावणी की हो, तो संगीत उसकी आत्मा बन जाता है। इंडस्ट्री की दिग्गज संगीतकार जोड़ी अजय-अतुल ने ‘ईठा’ के बैकग्राउंड स्कोर और गानों में ढोलकी, तुतारी और घुंघरुओं की ऐसी थाप पिरोई है जो सीधे रोंगटे खड़े कर देती है। वहीं कोरियोग्राफर वैभवी मर्चेंट ने लावणी के पारंपरिक और जोशीले स्वरूप को बड़े पर्दे के लायक भव्य बनाया है। निर्देशक लक्ष्मण उतेकर—जो ‘मिमी’, ‘लुका छुपी’ और ऐतिहासिक कहानी ‘छावा’ के लिए जाने जाते हैं—ने एक बार फिर जमीनी और भावनात्मक कहानी को बड़े कैनवास पर उकेरा है। गांव के तंबुओं, खुले मैदानों की खचाखच भीड़ और उस दौर के तमाशा मंडलों के माहौल को सिनेमैटोग्राफी के जरिए बेहद प्रामाणिक ढंग से पर्दे पर जीवित किया गया है।

दिनेश विजन (Maddock Films) और लक्ष्मण उतेकर के संयुक्त निर्माण में बनी फिल्म ‘ईठा’ आगामी 4 दिसंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए पूरी तरह तैयार है। ट्रेलर को देखकर यह साफ है कि यह सिर्फ एक मनोरंजक फिल्म नहीं है, बल्कि यह उन हजारों तमाशा व लोक कलाकारों के आत्मसम्मान की लड़ाई है, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाने में गुजार दी, लेकिन समाज ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसके वे हकदार थे। यदि पूरी फिल्म में ट्रेलर जैसी ही ऊर्जा और भावनात्मक गहराई बरकरार रही, तो यह फिल्म श्रद्धा कपूर के करियर की मील का पत्थर साबित हो सकती है और राष्ट्रीय पुरस्कारों की दौड़ में भी मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है।

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