पंकज उधास की ‘कलेजा चीरने’ वाली गजल: ‘दिल देता है रो रो दुहाई’ के 33 साल, आज भी क्यों आंखें नम कर देता है यह कल्ट क्लासिक

भारतीय संगीत जगत में मखमली आवाज के जादूगर पद्मश्री पंकज उधास (Pankaj Udhas) भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित न हों, लेकिन उनकी रूहानी आवाज में गाए गए सदाबहार नग्मे और गजलें आज भी करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलों की धड़कन बने हुए हैं। 1980 और 1990 के दशक में जब भारतीय सिनेमा और संगीत की दुनिया में गजल गायकी को आम जनमानस तक पहुंचाने की बात आई, तो पंकज उधास का नाम सबसे आगे रहा। उन्होंने ‘चिट्ठी आई है आई है’, ‘आहिस्ता कीजिए बातें’, ‘चांदी जैसा रंग है तेरा’ और ‘ना कजरे की धार’ जैसे ऐतिहासिक गीतों से महफिलों को सजाया। पंकज उधास की गायकी की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि उनकी भाषा और उच्चारण अत्यंत सरल, सहज और आम बोलचाल के करीब होते थे, लेकिन उनकी धुन और गायकी सीधे सीने के पार उतरकर दिल के सबसे गहरे जख्मों को छू जाती थी। आज हम बात कर रहे हैं साल 1993 में रिलीज हुई महेश भट्ट की चर्चित म्यूजिकल रोमांटिक फिल्म ‘फिर तेरी याद आई’ (Phir Teri Kahani Yaad Aayee / Phir Teri Yaad Aayi) के उस दर्दभरे कल्ट क्लासिक गीत की, जिसने रिलीज के 33 साल बाद भी अपनी ताजगी और टीस को जस का तस बनाए रखा है। वह गाना है—’दिल देता है रो रो दुहाई, किसी से कोई प्यार न करे’।
33 साल बाद भी यूट्यूब पर छाया दर्द का तराना: टूटे हुए दिल की आखिरी बेबसी
साल 1993 में जब यह गाना पहली बार ऑडियो कैसेट और टीवी स्क्रीन पर आया था, तो इसने हर उस इंसान की आंखें नम कर दी थीं जिसने कभी सच्चे प्यार में जुदाई या ठुकराए जाने की असहनीय पीड़ा झेली हो। आज के डिजिटल युग में भी जब सोशल मीडिया और यूट्यूब पर यह गाना बजता है, तो युवा पीढ़ी से लेकर बुजुर्ग श्रोता तक इसकी गहराई में डूब जाते हैं। पंकज उधास ने इस गीत को जिस सोज, दर्द और कांपती हुई भावुक आवाज के साथ गाया है, वह एक ऐसे इंसान की रूहानी बेबसी को दर्शाता है जिसका सब कुछ इश्क के दरिया में लुट चुका हो। जब इंसान का दिल अंदर से पूरी तरह टूटकर बिखर जाता है और चारों ओर केवल सन्नाटा व निराशा रह जाती है, तब यह गीत उस टूटे हुए मन की चीख बनकर उभरता है। आधुनिक दौर के फास्ट-पेस्ड और रीमिक्स गानों की बाढ़ के बीच भी यह गजल यह साबित करती है कि सच्चे अहसास और जुदाई के आंसू कभी पुराने नहीं पड़ते।
राहुल रॉय और पूजा भट्ट की आइकॉनिक केमिस्ट्री: अनु मलिक का जादुई संगीत और कतील शिफाई के शब्द
इस अमर गीत के निर्माण में उस दौर के तीन सबसे बड़े फनकारों का संगम हुआ था। गाने के बोल पाकिस्तान के विख्यात शायर और गीतकार कतील शिफाई ने लिखे थे। कतील शिफाई की कलम से निकले एक-एक शब्द में इश्क की इंतहा और जुदाई की तड़प साफ महसूस की जा सकती है। उन्होंने जिस सच्चाई से लिखा कि ‘दिल देता है रो रो दुहाई, किसी से कोई प्यार न करे’, उसने टूटे प्रेमियों को एक सांत्वना दी कि इस दर्द में वे अकेले नहीं हैं। वहीं संगीतकार अनु मलिक ने इस दर्द को स्वर देने के लिए बेहद धीमे और दिलकश वाद्यों का इस्तेमाल किया। सारंगी की मर्मस्पर्शी धुन और तबले की धीमी थाप के साथ पंकज उधास की गायकी ने मिलकर इस गीत को अमर बना दिया। पर्दे पर इसे उस दौर के सुपरस्टार राहुल रॉय और संवेदनशील अभिनेत्री पूजा भट्ट पर फिल्माया गया था, जिनके चेहरे के भावों ने इस गाने के भावनात्मक स्तर को कई गुना ऊंचा उठा दिया।
‘इश्क की राहों में जितनी शिद्दत, जुदाई का सफर उतना ही महंगा’: गीत का गहरा दर्शन
यदि इस गीत के आंतरिक दर्शन को गहराई से समझा जाए, तो यह केवल एक साधारण विरह गीत नहीं है, बल्कि यह प्रेम की उस अनसुलझी पहेली को सामने रखता है जहां समर्पण ही सबसे बड़ी त्रासदी बन जाता है। यह गीत साफ तौर पर यह संदेश देता है कि इश्क की राहों में व्यक्ति जितनी अधिक शिद्दत और गहराई से उतरता है, अलग होने पर उसका हर एक लम्हा उतना ही ज्यादा दर्दनाक और महंगा साबित होता है। प्रेम में मिला धोखा या किस्मत द्वारा थोपी गई जुदाई इंसान के भीतर एक ऐसा खालीपन छोड़ जाती है जिसे दुनिया की कोई दौलत या शोहरत नहीं भर सकती। गाने में नायक की लाचारी यह बयां करती है कि कैसे एक बार दिल टूटने के बाद इंसान दूसरों को इस आग में जलने से बचने की चेतावनी देने लगता है।
क्या थी फिल्म ‘फिर तेरी याद आई’ की अनूठी और दर्दनाक प्रेम कहानी
इस कल्ट गाने की पृष्ठभूमि को समझने के लिए फिल्म की कहानी पर गौर करना जरूरी है, जो अपने दौर से काफी आगे की एक जटिल और संवेदनशील दास्तान थी। फिल्म की कहानी राहुल नाम के एक प्रतिभाशाली लेकिन शराब की लत में डूबे फिल्म निर्देशक के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका जीवंत किरदार अभिनेता राहुल रॉय ने निभाया था। अपने जीवन से निराश और भटके हुए राहुल को अपनी लत से उबरने के लिए एक मेंटल हेल्थ रिहैबिलिटेशन सेंटर (नशामुक्ति एवं मानसिक स्वास्थ्य केंद्र) में भर्ती होना पड़ता है। इसी पुनर्वास केंद्र में राहुल की मुलाकात पूजा नाम की एक बेहद खूबसूरत लेकिन मानसिक रूप से गंभीर रूप से बीमार और अस्थिर युवती से होती है, जिसका किरदार पूजा भट्ट ने बेहद शिद्दत से निभाया था। दोनों एक-दूसरे के अकेलेपन और दर्द को साझा करते हुए एक गहरे और पवित्र प्रेम संबंध में बंध जाते हैं।
रिहैबिलिटेशन सेंटर की दीवारों से उपजी मोहब्बत: मानसिक बीमारी और ट्रेजिक अंत
कहानी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जहां राहुल धीरे-धीरे पूजा के प्यार और संबल की वजह से अपनी शराब की लत को छोड़ देता है और समाज की मुख्यधारा में लौटने लगता है, वहीं पूजा की मानसिक स्थिति लगातार बिगड़ती चली जाती है। उसकी मानसिक अस्थिरता, भावनात्मक आघात और समाज के बेरहम नियम दोनों के पवित्र रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पाते। चाहकर भी दोनों एक नहीं हो पाते और कहानी में एक ऐसा ट्रेजिक और हृदयविदारक मोड़ आता है जो दोनों प्रेमियों को हमेशा के लिए एक-दूसरे से जुदा कर देता है। इसी जुदाई और प्रेम के बिखर जाने की पृष्ठभूमि पर जब फिल्म के क्लाइमेक्स के करीब पंकज उधास का यह नग्मा ‘दिल देता है रो रो दुहाई’ बजता है, तो वह केवल पर्दे पर चल रहे दृश्यों का संगीत नहीं रहता, बल्कि सिनेमाहॉल में बैठे हर दर्शक के कलेजे को चीर कर रख देता है। यही कारण है कि आज तीन दशक बीत जाने के बाद भी यह गजल हिंदी सिनेमा के सबसे महान दर्दभरे गीतों में शीर्ष स्थान पर शुमार की जाती है।



