गौ संरक्षण केंद्र से ग्रामीण स्वावलम्बन की ओर बढ़ता आगरा का गांव खेड़ा राठौर

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में कृषि और पशुपालन हमेशा से आर्थिक एवं सामाजिक जीवन की धुरी रहे हैं। बदलते समय के साथ निराश्रित और बेसहारा गोवंश की समस्या एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी थी जिसका सीधा असर किसानों की फसलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा था। इस दिशा में प्रदेश सरकार द्वारा लागू किया गया निराश्रित गोवंश संरक्षण कार्यक्रम एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम साबित हुआ है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत राज्य के विभिन्न जनपदों में सुनियोजित तरीके से गौवंश आश्रय स्थलों का निर्माण और संचालन किया जा रहा है। जिला प्रशासन की कुशल देखरेख और स्थानीय जनभागीदारी के समन्वय से इन केंद्रों को न केवल पशुओं के ठहरने का स्थान बल्कि ग्रामीण विकास और पारिस्थितिक संतुलन का एक उत्कृष्ट केंद्र बनाया जा रहा है।
इसी दूरदर्शी सोच का एक जीवंत उदाहरण आगरा जनपद के बाह तहसील के अंतर्गत आने वाले ग्राम खेड़ा राठौर में देखने को मिलता है। यहाँ स्थापित वृहद गौ संरक्षण केंद्र ने पशुधन प्रबंधन और उनके कल्याण के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व स्थापित इस केंद्र ने अपनी निर्धारित परिचालन सीमाओं से आगे बढ़कर काम किया है और आज यह बेसहारा, बीमार और कमजोर गोवंश के लिए एक अत्यंत सुरक्षित और समृद्ध आश्रय स्थल का रूप ले चुका है।
इस गौ संरक्षण केंद्र की सफलता का मुख्य आधार इसका मजबूत बुनियादी ढांचा और वैज्ञानिक प्रबंधन है। सामान्यतः ऐसे केंद्रों में क्षमता से अधिक पशु होने पर अव्यवस्था की स्थिति बन जाती है लेकिन यहाँ की कहानी बिल्कुल अलग है। आधिकारिक तौर पर चार सौ पशुओं की क्षमता वाले इस आश्रय स्थल में वर्तमान में चार सौ से अधिक पशु बेहद सुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे हैं। जिला प्रशासन ने यहाँ देखभाल की गुणवत्ता से समझौता किए बिना संसाधनों का ऐसा कुशल आवंटन किया है कि हर पशु को उचित पोषण और चिकित्सा सहायता मिल रही है। यह प्रबंधन व्यवस्था जनपद के अन्य क्षेत्रों के लिए भी एक मार्गदर्शिका बन रही है।
बुनियादी ढांचे की बात करें तो इस केंद्र का निर्माण लगभग एक एकड़ की विस्तृत भूमि पर किया गया है। इसकी बनावट में वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलुओं का पूरा ध्यान रखा गया है। उत्तर-दक्षिण दिशा में संरेखित करते हुए यहाँ एक विशाल भूसा गोदाम बनाया गया है जिसकी क्षमता चार सौ कुंतल है। उत्तर-दक्षिण दिशा के चयन के पीछे मुख्य उद्देश्य हवा की आवाजाही को बेहतर बनाए रखना और नमी को नियंत्रित करना है जिससे चारे की गुणवत्ता लंबे समय तक सुरक्षित बनी रहती है और उसमें फंगस या सड़न की समस्या नहीं होती। इसके साथ ही पशुओं को सुगमता से चारा खिलाने के लिए आधुनिक चरहियों का निर्माण किया गया है। केंद्र परिसर में चौबीस घंटे निगरानी के लिए केयरटेकर कक्ष और प्रशासनिक कार्यों के सुचारू संचालन हेतु एक समर्पित कार्यालय भी स्थापित किया गया है।
इस केंद्र का स्थान चयन बहुत सावधानी से किया गया है। यह मुख्य गाँव की घनी आबादी से लगभग सौ मीटर की सुरक्षित दूरी पर स्थित है जिससे गाँव में किसी भी प्रकार की गंदगी या संक्रमण का खतरा नहीं रहता। साथ ही मुख्य मार्ग से एक पक्की सड़क द्वारा जुड़े होने के कारण यहाँ चारे की आपूर्ति, चिकित्सकीय वाहनों के आवागमन और प्रशासनिक निरीक्षण के लिए पहुँचना बेहद आसान है। इस केंद्र की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक रेतीली जमीन और उन्नत जल निकासी प्रणाली है। यहाँ पक्के ढांचे से निर्मित जल निकासी व्यवस्था दी गई है जिसमें मानसून या भारी बारिश के दिनों में भी परिसर के भीतर पानी का जमाव न हो। इसके चलते पशुओं को हर मौसम में कीचड़ मुक्त, स्वच्छ और सूखा वातावरण मिलता है जो उन्हें पैर और त्वचा की विभिन्न बीमारियों से बचाता है।
संरक्षण केन्द्र में रह रहे कुल गोवंशों में बछड़े और बछड़ियों की संख्या बीस है जबकि गर्भवती और दुधारू गायों की संख्या क्रमशः आठ और सोलह है। आश्रय स्थल में वर्तमान में नर गोवंश की संख्या शून्य है। केन्द्र संरक्षण पर उन पशुओं के संरक्षण पर ज्यादा ध्यान केंद्रित है जिन्हें तत्काल सहारे और विशेष पोषण की आवश्यकता होती है। दुधारू और गर्भवती गायों के होने से केंद्र के भीतर एक सकारात्मक वातावरण निर्मित होता है। यहाँ उनके स्वास्थ्य की निगरानी के लिए विशेष प्रबंध किए गए हैं।
आगरा जनपद के संदर्भ में पशुधन संरक्षण और इसके व्यापक प्रबंधन की कार्ययोजना को बहुत ही व्यवस्थित रूप से धरातल पर उतारा गया है। जिला प्रशासन द्वारा प्राप्त आंकड़ों और क्षेत्रीय सर्वेक्षण के अनुसार आगरा के इस विशेष वृहद गौ संरक्षण केंद्र में पशुओं के खान-पान, स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर दैनिक स्तर पर कड़े मानक लागू किए गए हैं। केंद्र के भीतर चार सौ से अधिक गोवंश की शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जो चार सौ कुंतल क्षमता का भूसा गोदाम बनाया गया है वह मौसम की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करता है।
इसके अतिरिक्त पशुओं के लिए पौष्टिक आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु केंद्र परिसर में प्रतिदिन लगभग दो टन हरे चारे का उत्पादन किया जा रहा है। हरा चारा पशुओं के पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने और दुधारू व गर्भवती गायों के शारीरिक पूर्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस निरंतर उत्पादन के कारण केंद्र को चारे के लिए बाहरी स्रोतों पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना पड़ता जिससे वित्तीय संसाधनों की भी भारी बचत होती है। हरे चारे का यह आत्मनिर्भर मॉडल आगरा के स्थानीय स्तर पर जैविक खेती और उन्नत कृषि तकनीकों को भी बढ़ावा दे रहा है।
इस पूरी व्यवस्था से केवल पशुओं को ही लाभ नही हुआ बल्कि गांवों को भी लाभ हो रहा है। बेसहारा गोवंश के सुरक्षित आश्रय में आ जाने से आगरा के इस क्षेत्र में किसानों की फसलों का नुकसान बंद हो गया है जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। पूर्व में रात-रात भर जागकर खेतों की रखवाली करने वाले किसानों को अब इस समस्या से मुक्ति मिल गई है जिससे उनका सामाजिक और पारिवारिक जीवन सुधरा है। इसके साथ ही गोवंश के मलमूत्र से बनने वाली जैविक खाद का उपयोग खेतों की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने में किया जा रहा है जो रासायनिक उर्वरकों पर किसानों की निर्भरता को कम कर रही है।
स्थानीय प्रशासन, ब्लॉक स्तरीय तंत्र और ग्राम पंचायत के आपसी तालमेल ने इस केंद्र को ग्रामीण विकास और पारिस्थितिक संतुलन के एक आदर्श मॉडल में बदल दिया है। यहाँ से उत्पादित जैविक संसाधनों का पुनर्चक्रण करके पर्यावरण को संरक्षित किया जा रहा है। यह पूरी परियोजना यह स्पष्ट करती है कि किस प्रकार एक सही सरकारी पहल, जनभावनाओं और कुशल प्रशासनिक क्रियान्वयन के मेल से आगरा के ग्रामीण जीवन में व्यापक और सकारात्मक बदलाव ला सकती है। खेड़ा राठौर का यह वृहद गौ संरक्षण केंद्र आज प्रदेश के विकास मानचित्र पर एक ऐसा चमकता हुआ बिंदु बन चुका है जो पशुधन संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और ग्रामीण स्वावलंबन की सामूहिक शक्ति को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रदर्शित करता है।
उत्तर प्रदेश सरकार की इन योजनाओं की व्यापकता केवल एक जनपद या एक केंद्र तक सीमित नहीं है बल्कि पूरे राज्य में पशुधन के विकास और संरक्षण की नई गाथा लिखी जा रही है। प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में की गई समीक्षा के अनुसार राज्य में वर्तमान में कुल सात हजार पांच सौ सत्ताइस गो-आश्रय स्थल संचालित हैं जिनमें बारह लाख उनतीस हजार से अधिक गोवंश पूरी तरह संरक्षित हैं। इस विशाल व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए इन्हें अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इसके अंतर्गत छह हजार चार सौ तैंतीस अस्थायी स्थलों में नौ लाख निवासी हजार गोवंश, पांच सौ अठारह वृहद गो-संरक्षण केन्द्रों में एक लाख अट्ठावन हजार गोवंश, तीन सौ तेईस कान्हा गो-आश्रयों में सतहत्तर हजार नौ सौ पच्चीस गोवंश तथा दो सौ त्रेपन कांजी हाउस में तेरह हजार पांच सौ छिहत्तर गोवंश को आश्रय दिया गया है।
सरकार की दूरगामी नीतियों के कारण मुख्यमंत्री सहभागिता योजना के तहत अब तक एक लाख चौदह हजार लाभार्थियों को एक लाख ब्यासी हजार से अधिक गोवंश सुपुर्द किए जा चुके हैं जिनका नियमित सत्यापन कर उनके भरण-पोषण की व्यवस्था की जा रही है। इस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सुदृढ़ बनाने के लिए प्रदेश सरकार ने आधुनिक तकनीक का समावेश किया है। निगरानी व्यवस्था के तहत राज्य के चौहत्तर जनपदों में पांच हजार चार सौ छियालीस गो-आश्रय स्थलों पर सात हजार पांच सौ बानवे सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए जा चुके हैं। इसके साथ ही बावन जनपदों में कमाण्ड एण्ड कण्ट्रोल रूम स्थापित हो चुके हैं और शेष जिलों में यह प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है।
गोचर भूमि के प्रभावी उपयोग के लिए राज्य में इकसठ हजार एक सौ अठारह हेक्टेयर से अधिक भूमि उपलब्ध है जिसमें से दस हजार छह सौ बयालीस हेक्टेयर को सीधे गो-आश्रय स्थलों से जोड़ा गया है तथा सात हजार तीन सौ चौंसठ हेक्टेयर में हरे चारे का विकास किया जा चुका है। प्रदेश में वर्तमान में सत्तानवे गोबर गैस संयंत्र संचालित हैं जो स्वच्छ ऊर्जा और आय सृजन का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। विभिन्न जनपदों में स्वयं सहायता समूहों तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा गो-पेण्ट, वर्मी कम्पोस्ट और गो-दीप सहित अन्य उत्पादों का निर्माण किया जा रहा है जिससे ग्रामीण स्वावलंबन को बल मिल रहा है और मुजफ्फरनगर का गो-अभयारण्य इस दिशा में एक उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आया है।
वृहद गो-संरक्षण केन्द्रों की प्रगति के तहत स्वीकृत छह सौ तीस केंद्रों में से पांच सौ अठारह पूर्ण हो चुके हैं और शेष का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में खुरपका-मुंहपका, गलाघोटू एवं लम्पी स्किन डिजीज के विरुद्ध व्यापक टीकाकरण अभियान संचालित कर पशुपालकों को निरंतर प्रशिक्षित किया जा रहा है जिससे राज्यव्यापी विकास और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य तेजी से पूरा हो रहा है। आगरा जनपद का यह सफल प्रयोग यह स्पष्ट संदेश देता है कि प्रदेश सरकार की विकासपरक नीतियां धरातल पर उतरकर न केवल बेसहारा पशुओं को जीवनदान दे रही हैं बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विविधीकरण और संवर्धन का भी सबसे सशक्त माध्यम सिद्ध हो रही हैं।

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