18 साल से पहले लड़की बनी मां तो पति पर लगेगा POCSO: बाल विवाह पर बंगाल सरकार का कड़ा एक्शन, निकाह और फेरे कराने वाले पुजारी-काजी भी जाएंगे जेल

पश्चिम बंगाल में बाल विवाह की गंभीर सामाजिक समस्या पर अंकुश लगाने और नाबालिग बालिकाओं के स्वास्थ्य व जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकार ने बेहद कड़ा कानूनी रुख अख्तियार कर लिया है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग और गृह विभाग के संयुक्त समन्वय से तैयार की गई नई कार्ययोजना के तहत यह स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि 18 वर्ष से कम आयु की कोई भी लड़की गर्भवती पाई जाती है या मां बनती है, तो उसके पति के खिलाफ सीधे तौर पर प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रंस फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) एक्ट की गैर-जमानती धाराओं के तहत मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। राज्य सरकार का मानना है कि बाल विवाह कानूनन अपराध है और किसी भी नाबालिग बालिका के साथ स्थापित शारीरिक संबंध कानूनन यौन शोषण की श्रेणी में आता है, भले ही विवाह किसी भी सामाजिक या धार्मिक रीति-रिवाज के तहत क्यों न संपन्न हुआ हो।

फेरे और निकाह कराने वाले पुजारी, पुरोहित और काजी भी होंगे सीधे जिम्मेदार

नए दिशा-निर्देशों में बाल विवाह कराने में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने वाले धार्मिक अगुओं पर भी नकेल कसी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल परिवार या पति पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि बाल विवाह को संभव बनाने वाले पूरे तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा। हिंदू रीति-रिवाज से सात फेरे कराने वाले पंडित-पुजारी हों या मुस्लिम रीति-रिवाज से निकाह पढ़ाने वाले काजी और मौलवी—यदि वे किसी भी 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह संपन्न कराते पाए गए, तो उन्हें भी बाल विवाह निषेध अधिनियम और पॉक्सो कानून के तहत सह-अभियुक्त (सह-अपराधी) बनाया जाएगा। दोषी पाए जाने पर इन धार्मिक अनुष्ठान कराने वालों को गैर-जमानती धाराओं में सीधी गिरफ्तारी और जेल की सजा का सामना करना पड़ेगा। सरकार ने सभी जिलों के स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि वे क्षेत्र के तमाम पुजारियों और काजियों की बैठक बुलाकर उन्हें वर-वधू के वैध जन्म प्रमाण पत्र या आधार कार्ड की अनिवार्य जांच करने के निर्देश दें।

सरकारी व निजी अस्पतालों के लिए स्वास्थ्य विभाग का सख्त रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल

नाबालिग गर्भावस्था के मामलों को प्रकाश में लाने के लिए स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर कड़ी निगरानी तंत्र स्थापित किया गया है। राज्य भर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC), उपमंडल व जिला अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों और सभी निजी नर्सिंग होम्स के लिए नया 'मैंडेटरी रिपोर्टिंग प्रोटोकॉल' जारी किया गया है। नियम के अनुसार, जब भी प्रसव पूर्व जांच (ANC) या डिलीवरी के लिए कोई गर्भवती लड़की अस्पताल पहुंचती है, तो डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मचारियों को उसकी उम्र का सत्यापन करना अनिवार्य होगा। यदि लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम निकलती है, तो अस्पताल प्रबंधन को चौबीस घंटे के भीतर संबंधित स्थानीय थाने और जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) को तत्काल लिखित सूचना देनी होगी। यदि कोई अस्पताल, डॉक्टर या नर्सिंग होम संचालक नाबालिग गर्भावस्था की जानकारी छिपाते हैं या पुलिस को सूचित करने में लापरवाही बरतते हैं, तो उनके खिलाफ भी विधिक प्रावधानों के तहत जवाबदेही तय की जाएगी।

कन्याश्री और रूपश्री जैसी योजनाओं के बावजूद सामाजिक कुरीति पर प्रहार

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बालिकाओं की शिक्षा और बाल विवाह रोकने के लिए 'कन्याश्री' और विवाह के लिए 'रूपश्री' जैसी व्यापक वित्तीय सहायता योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना भी हुई है। इसके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों में राज्य के कई ग्रामीण और सीमावर्ती जिलों—जैसे मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण 24 परगना, उत्तर दिनाजपुर और पुरुलिया—में कम उम्र में लड़कियों की शादी और कम उम्र में मातृत्व के मामले चिंताजनक बने हुए थे। इसी चुनौती से निपटने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रशासन ने केवल जागरूकता के भरोसे रहने के बजाय कठोर दंडात्मक कदम उठाने का निर्णय लिया है। पंचायत स्तर पर आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और ग्राम प्रधानों को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे अपने क्षेत्र में किसी भी बाल विवाह की सूचना तुरंत हेल्पलाइन नंबर 1098 या स्थानीय पुलिस को दें।

कानूनी पहलू: सहमति का कोई औचित्य नहीं, सीधे गैर-जमानती अपराध

पॉक्सो कानून के विधिक प्रावधानों के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति की सहमति को कानूनी रूप से अमान्य माना गया है। अदालतों ने भी कई ऐतिहासिक फैसलों में स्पष्ट किया है कि वैवाहिक बंधन नाबालिग के साथ बने शारीरिक संबंधों को पॉक्सो के दायरे से बाहर नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में पति को गंभीर यौन उत्पीड़न (Penetrative Sexual Assault) के आरोपों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें दस वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक की कड़ी सजा का प्रावधान है। सरकार का यह कदम राज्य भर में बाल विवाह के खिलाफ एक सख्त निवारक (Deterrent) का काम करेगा और कम उम्र में लड़कियों के विवाह की सामाजिक कुरीति को जड़ से समाप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा।

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