संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुटेरेस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मेगा बैठक के कूटनीतिक मायने

अंतरराष्ट्रीय राजनीति के गलियारों में इस समय एक बहुत बड़ी और अहम खबर सामने आ रही है, जिसके तहत संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच आगामी 'ब्रिक्स' (BRICS) सम्मेलन के दौरान एक उच्च स्तरीय और बेहद खास द्विपक्षीय बैठक होने जा रही है। वैश्विक शांति, सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार जैसे गंभीर मुद्दों के बीच होने वाली यह मुलाकात कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दुनिया भर की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के शीर्ष नेता और संयुक्त राष्ट्र के सर्वोच्च प्रशासनिक प्रमुख आपस में विचार-विमर्श करेंगे, तो वैश्विक मंच पर इसके क्या गहरे और दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे। इस बैठक के माध्यम से भारत एक बार फिर ग्लोबल साउथ की आवाज को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता से उठाने और वैश्विक संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने का मजबूत संदेश देने की तैयारी कर रहा है।

ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान भारत का मुख्य एजेंडा और वैश्विक प्राथमिकताओं का खाका

भारत की मेजबानी या सहभागिता में होने वाले इस बहुपक्षीय सम्मेलन के दौरान देश का एजेंडा बेहद स्पष्ट और दूरदर्शी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत हमेशा से बहुपक्षीयवाद (Multilateralism) और समावेशी विकास का प्रबल समर्थक रहा है। इस बार के ब्रिक्स सम्मेलन और यूएन चीफ के साथ होने वाली बैठक में भारत का मुख्य जोर आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति को दुनिया के सामने रखने, विकासशील देशों के आर्थिक हितों की रक्षा करने, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत बनाने पर रहेगा। इसके साथ ही, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), हरित ऊर्जा संक्रमण (Green Energy Transition) और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने के लिए वैश्विक सहयोग बढ़ाने पर भी विशेष रूप से चर्चा की जाएगी, ताकि दुनिया के कमजोर और पिछड़े देशों को मुख्यधारा में लाया जा सके।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार और भारत की स्थायी सदस्यता का मुद्दा

एंटोनियो गुटेरेस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बहुप्रतीक्षित बैठक में सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और अन्य वैश्विक प्रशासनिक निकायों में तत्काल सुधार लाने का रहेगा। भारत लंबे समय से यह आवाज उठाता रहा है कि आज की 21वीं सदी की बदलती वास्तविकताओं के अनुसार यूएन जैसी संस्थाओं का ढांचा पूरी तरह से पुराना पड़ चुका है और इसमें व्यापक बदलाव की सख्त जरूरत है। सुरक्षा परिषद में दुनिया की एक-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत को स्थायी सदस्यता न मिलना वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की विसंगति को दर्शाता है। प्रधानमंत्री मोदी इस मुलाकात के दौरान यूएन प्रमुख के समक्ष इस बात पर जोर देंगे कि जब तक दुनिया के प्रमुख विकासशील और ग्लोबल साउथ के देशों को वैश्विक निर्णय लेने वाली संस्थाओं में उचित और न्यायसंगत हिस्सेदारी नहीं मिलती, तब तक वैश्विक शांति और सुरक्षा के दावे अधूरे ही रहेंगे।

जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल साउथ की आवाज और आर्थिक सुरक्षा पर मंथन

आज के समय में जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों, ग्लोबल वार्मिंग, खाद्य सुरक्षा और भीषण आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, तब भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच का तालमेल और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। भारत ने 'मिशन लाइफ' (LiFE – Lifestyle for Environment) और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) जैसे अनूठे वैश्विक अभियानों के जरिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में दुनिया को एक नया रास्ता दिखाया है। यूएन चीफ गुटेरेस के साथ होने वाली इस बैठक में इस बात पर भी गहन मंथन होगा कि कैसे विकसित देश अपने वादे के मुताबिक जलवायु वित्त पोषण (Climate Finance) और तकनीक हस्तांतरण के मोर्चे पर विकासशील देशों की मदद करें। प्रधानमंत्री मोदी यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेंगे कि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर विकासशील देशों की आर्थिक तरक्की पर कोई अनावश्यक दबाव न डाला जाए, बल्कि उन्हें बराबरी के हक के साथ आगे बढ़ने का अवसर मिले।

वैश्विक कूटनीति में भारत की बढ़ती भूमिका और भविष्य की दिशा

संयुक्त राष्ट्र महासचिव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह मुलाकात इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि आज अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के केंद्र में भारत की स्थिति कितनी मजबूत और निर्णायक हो चुकी है। दुनिया की हर बड़ी समस्या के समाधान के लिए आज पश्चिमी देश हों या पूर्वी, सभी की निगाहें भारत की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखती हैं। ब्रिक्स जैसे शक्तिशाली मंच का उपयोग करके भारत न केवल अपनी आर्थिक ताकत का लोहा मनवा रहा है, बल्कि दुनिया के तमाम देशों को एक साथ लेकर चलने की अपनी ऐतिहासिक परंपरा को भी बखूबी निभा रहा है। इस हाई-प्रोफाइल बैठक के परिणाम आने वाले समय में वैश्विक राजनीति की दिशा और दशा तय करने में मील का पत्थर साबित होंगे, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत अब दुनिया की तय की गई चाल पर चलने वाला देश नहीं, बल्कि खुद दुनिया के लिए एक नया रास्ता बनाने वाला राष्ट्र बन चुका है।

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