‘नया मैसेज नहीं जा रहा, मेरा अकाउंट बैन कर दिया…’ CJP प्रवक्ता सौरव दास का व्हाट्सएप पर गंभीर आरोप

नागरिक अधिकार संगठन सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के आधिकारिक प्रवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सौरव दास ने लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप पर अपना अकाउंट मनमाने ढंग से ब्लॉक और प्रतिबंधित करने का गंभीर आरोप लगाया है। सौरव दास के अनुसार, उनका चालू मोबाइल नंबर अचानक मैसेज भेजने की सुविधा से वंचित कर दिया गया है और स्क्रीन पर अकाउंट बैन होने की चेतावनी दिखाई दे रही है। सौरव दास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक सार्वजनिक पोस्ट साझा करते हुए मेटा के स्वामित्व वाले व्हाट्सएप को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने अपनी पोस्ट में साफ तौर पर लिखा कि उनका आधिकारिक व्हाट्सएप अकाउंट प्रतिबंधित कर दिया गया है और वह किसी भी व्यक्ति अथवा समूह को कोई नया संदेश भेजने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
इस घटना के सामने आते ही डिजिटल एक्टिविज्म, सोशल मीडिया की पारदर्शिता और प्लेटफॉर्म सेंसरशिप को लेकर एक बार फिर तीखी बहस शुरू हो गई है। सौरव ने सीधे व्हाट्सएप प्रबंधन को टैग करते हुए सवाल दागा कि आखिर उनके अकाउंट के साथ यह क्या किया जा रहा है और बिना किसी स्पष्ट पूर्व सूचना के उनका संपर्क साधन क्यों छीना गया है। देश की राजधानी दिल्ली से लेकर इंटरनेट जगत तक इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोग अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बोलने की आजादी और डिजिटल सेंसरशिप का विवाद
सौरव दास लंबे समय से विभिन्न सामाजिक और कानूनी मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं। उनके मैसेजिंग अकाउंट पर अचानक लगी इस रोक ने डिजिटल अधिकारों की वकालत करने वाले समूहों का ध्यान खींचा है। यह पहला मौका नहीं है जब सौरव दास ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की कार्यप्रणाली अथवा सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए हों। इससे पहले भी वह अलग-अलग अवसरों पर अपनी निजता में दखलंदाजी, ऑनलाइन निगरानी और डिजिटल सेंसरशिप को लेकर गंभीर दावे करते रहे हैं।
अगस्त महीने के दौरान सौरव दास ने इंस्टाग्राम पर भी इसी तरह के मनमाने प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया था। उस वक्त उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल से जुड़े स्क्रीनशॉट्स साझा करते हुए दावा किया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार के खिलाफ होने वाले शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी उनकी पोस्ट्स और स्टोरीज की पहुंच को जानबूझकर सीमित किया जा रहा है। सौरव का आरोप था कि 'शैडो बैन' और 'अकाउंट रिस्ट्रिक्शन' जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके सामाजिक कार्यकर्ताओं की आवाज को दबाया जा रहा है, जो सीधे तौर पर संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर गहरा आघात है।
दिल्ली पुलिस पर लगाया था फोन क्लोनिंग और सबूत गढ़ने का गंभीर आरोप
व्हाट्सएप पर रोक लगने से पहले सौरव दास सुरक्षा एजेंसियों की कार्यशैली को लेकर भी मुखर रहे हैं। उन्होंने दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए दावा किया था कि उनका निजी फोन गैर-कानूनी ढंग से जब्त करके उसे हैक और क्लोन किया गया था। इस मामले का ब्योरा देते हुए उन्होंने बताया था कि जब उन्हें एयरपोर्ट पर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा रोका गया, तब बिना कोई कानूनी जब्ती मेमो (सीजर मेमो) दिए उनका मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया गया था।
सौरव दास ने उस दौरान यह गंभीर आशंका जाहिर की थी कि फोन जब्त करने के बाद उसे अवैध रूप से एक्सेस किया गया ताकि भविष्य में उन्हें किसी झूठे आपराधिक मामले में फंसाने के लिए उनके डिवाइस में फर्जी दस्तावेज या डिजिटल सबूत प्लांट किए जा सकें। उनका कहना था कि किसी नागरिक का फोन बिना कानूनी प्रक्रिया और स्पष्ट मेमो के जब्त करना न केवल प्रक्रियात्मक नियमों की अवहेलना है, बल्कि यह न्याय की मूल भावना के भी एकदम विपरीत है।
पत्रकारों और यूट्यूबर्स द्वारा घर में घुसपैठ: दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था मामला
सौरव दास केवल सुरक्षा एजेंसियों और टेक कंपनियों से ही नहीं, बल्कि गैर-जिम्मेदाराना मीडिया कवरेज के खिलाफ भी कानूनी लड़ाई लड़ चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि कुछ यूट्यूबर्स और मीडियाकर्मियों ने बिना किसी वैधानिक अनुमति के उनके निजी आवास में जबरन प्रवेश किया और घर के अंदरूनी हिस्सों की वीडियोग्राफी की। इतना ही नहीं, उस संवेदनशील वीडियो फुटेज को सोशल मीडिया पर प्रसारित कर उनके घर का सटीक पता और बेहद संवेदनशील निजी जानकारियां सार्वजनिक कर दी गईं।
सौरव दास का कहना था कि इस अनैतिक और आक्रामक कवरेज के कारण उनके और उनके पूरे परिवार की जान-माल की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा पैदा हो गया था। लगातार मिल रही धमकियों और असुरक्षा के माहौल के बीच उन्होंने न्याय और सुरक्षा की गुहार लगाते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया था। अदालत में उन्होंने निजता के अधिकार, सुरक्षा और गैर-जिम्मेदार मीडिया चैनलों पर लगाम लगाने के संबंध में याचिका दायर कर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।
मेटा की कम्युनिटी गाइडलाइंस और यूजर्स के अधिकारों के बीच खींचतान
व्हाट्सएप जैसी वैश्विक मैसेजिंग कंपनियां अक्सर दावा करती हैं कि वे स्पैम, ऑटोमेटेड बॉट्स, बल्क मैसेजिंग और अपनी सेवा शर्तों के उल्लंघन की रोकथाम के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एल्गोरिद्म आधारित टूल्स का उपयोग करके खातों पर प्रतिबंध लगाती हैं। हालांकि, कई बार इन एल्गोरिद्म की खामियों और बिना मानवीय समीक्षा के की जाने वाली कार्रवाइयों के चलते पत्रकारों, शोधकर्ताओं और अधिकार कार्यकर्ताओं के सामान्य खाते भी अचानक ब्लॉक हो जाते हैं।
सौरव दास का मामला अब केवल एक व्यक्ति के अकाउंट बंद होने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह तकनीकी कंपनियों की मनमानी, यूजर ग्रीवेंस सिस्टम की विफलता और डिजिटल युग में नागरिकों के संवाद करने के अधिकार से जुड़ चुका है। सोशल मीडिया पर अब कई नागरिक समाज के प्रतिनिधि यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या मेटा जैसी विशाल तकनीकी कंपनियां किसी बाहरी दबाव में काम कर रही हैं या फिर यह उनके ऑटोमेटेड सिस्टम की कोई बड़ी तकनीकी चूक है। फिलहाल सभी की निगाहें व्हाट्सएप प्रबंधन की आधिकारिक प्रतिक्रिया और सौरव दास के अकाउंट की बहाली पर टिकी हुई हैं।




