चीनी के दाम तेज पर गन्ने की मिठास पड़ी फीकी: यूपी के 3 जिलों में घटा रकबा, जानिए किसानों के मोहभंग की असली वजह

देशभर के खुदरा और थोक बाजारों में चीनी के तेवर तल्ख हैं और उपभोक्ताओं को मीठे के लिए ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है। लेकिन बाजार के इस तेजी के दौर में भी उत्तर प्रदेश के चीनी का कटोरा कहे जाने वाले गन्ना किसानों के चेहरे पर मायूसी छाई हुई है। गन्ने की जो फसल पश्चिमी और मध्य यूपी की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती रही है, उसी फसल से अब किसानों का मोह धीरे-धीरे भंग होता नजर आ रहा है। कृषि विभाग और गन्ना विकास परिषद के हालिया सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के तीन प्रमुख गन्ना उत्पादक जिलों—लखीमपुर खीरी, बिजनौर और मुजफ्फरनगर के कई हिस्सों में गन्ने की बुवाई का रकबा (Sown Area) पिछले पेराई सत्रों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से घट गया है। चीनी मिलों को जहां इस बार गन्ने की किल्लत का अंदेशा सता रहा है, वहीं कृषि वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री इस बदलाव को ग्रामीण कृषि परिदृश्य में एक बड़े खतरे की घंटी मान रहे हैं।
बाजार में चीनी महंगी तो खेतों से गन्ना क्यों हो रहा कम? समझिए पूरा विरोधाभास
आम आर्थिक नियम यह कहता है कि जब अंतिम उत्पाद (चीनी) के दाम ऊंचे होते हैं, तो कच्चा माल पैदा करने वाले किसानों को उसकी बुवाई बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए। लेकिन गन्ने के मामले में यह गणित पूरी तरह उल्टा बैठ रहा है। किसानों का कहना है कि चीनी के बढ़ते दामों का सीधा मुनाफा चीनी मिलों और बिचौलियों की जेब में जाता है, जबकि खेत में खड़ी गन्ने की फसल को पालने की लागत पिछले दो वर्षों में आसमान छू गई है। डीजल के बढ़ते दाम, कीटनाशकों और रासायनिक खादों की महंगाई और कटाई के वक्त लेबर (मजदूरों) की भारी किल्लत ने गन्ने को पहले जैसा मुनाफा देने वाली नकदी फसल नहीं रहने दिया है। लगभग 12 से 14 महीने तक जमीन घेरकर रखने वाली इस लंबी अवधि की फसल में जब लागत ही नहीं निकलती, तो किसान अपनी जमीन पर उन फसलों को तरजीह देने लगे हैं जो 3 से 4 महीने में तैयार होकर तुरंत हाथ में नकदी दे देती हैं।
1. 'रेड रॉट' (लाल सड़न) की महामारी और 0238 प्रजाति का पतन
उत्तर प्रदेश में गन्ने का रकबा घटने के पीछे सबसे बड़ा तकनीकी और जैविक कारण 'रेड रॉट' यानी गन्ने का कैंसर माना जाने वाला लाल सड़न रोग है। बीते एक दशक में यूपी के किसानों को मालामाल करने वाली सबसे लोकप्रिय और बंपर पैदावार देने वाली किस्म 'Co-0238' अब इस फफूंद जनित बीमारी की चपेट में आकर पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है। लखीमपुर खीरी और बिजनौर के हजारों एकड़ खेतों में खड़ी हरी-भरी फसल रातों-रात सूखकर लाल पड़ गई। इस किस्म के पतन के बाद शोध संस्थानों द्वारा पेश की गईं नई किस्में—जैसे Co-15023, Co-0118 या Co-98014—बीमारी प्रतिरोधी तो हैं, लेकिन कई इलाकों में उनकी प्रति एकड़ उपज 0238 जितनी भारी नहीं निकल रही है। रोग के डर और नई किस्मों के बीजों की अनुपलब्धता ने किसानों को गन्ने का क्षेत्र घटाने पर विवश कर दिया।
2. चीनी मिलों पर पुराना बकाया और भुगतान चक्र की सुस्ती
उत्तर प्रदेश सरकार के तमाम सख्त निर्देशों और 14 दिनों के भीतर गन्ना मूल्य भुगतान के वैधानिक नियमों के बावजूद आज भी कई निजी चीनी मिलें पेराई सत्र बीत जाने के महीनों बाद तक किसानों का बकाया नहीं चुका पाती हैं। किसान जब खाद, बीज, बच्चों की स्कूल फीस या घर के जरूरी खर्चों के लिए पैसे की तंगी से जूझता है, तो मिल से मिलने वाली देरी से आई पर्ची उसकी परेशानी का हल नहीं निकाल पाती। भुगतान की इसी अनिश्चितता ने छोटे और सीमांत किसानों की कमर तोड़ दी है। किसान अब अपनी आजीविका के लिए ऐसे विकल्प तलाश रहे हैं जहां फसल कटते ही मंडी में तुरंत नकदी हाथ आ जाए।
3. बदलता मौसम और बेमौसम बारिश की दोहरी मार
जलवायु परिवर्तन का सबसे सीधा असर गन्ने की मिठास यानी 'शुगर रिकवरी' और वजन पर पड़ा है। पिछले सत्रों में अत्यधिक गर्मी, अनियमित मानसून और फिर कटाई के ठीक पहले हुई बेमौसम मूसलाधार बारिश ने खेतों में जलभराव की स्थिति पैदा कर दी थी। गन्ने की जड़ों में पानी भरने से तने पतले रह गए और गन्ने का वजन गिर गया। वजन घटने का सीधा अर्थ होता है प्रति क्विंटल कम पैसा मिलना। मौसम की इस मार ने किसानों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि एक साल तक मौसम का जोखिम उठाने के बजाय कम जोखिम वाली मौसमी फसलें लगाना ज्यादा सुरक्षित है।
धान, सरसों और मक्के की ओर तेजी से मुड़ रहे हैं किसान
यूपी के इन जिलों में गन्ने के रकबे में आई गिरावट का सीधा फायदा अन्य फसलों को मिलता दिख रहा है। किसान अब गन्ने के लंबे 365 दिनों के चक्र से बाहर निकलकर 'फसल विविधीकरण' (Crop Diversification) अपना रहे हैं। किसान अब एक साल में गन्ने की जगह दो से तीन फसलें ले रहे हैं—जैसे खरीफ में धान या मक्का, रबी में अगेती सरसों और उसके तुरंत बाद गर्मियों में मेंथा (पिपरमेंट) या मूंग। सरसों और मक्के के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खुले बाजार में मिल रहे बेहतरीन भावों ने किसानों को सुरक्षित विकल्प दिया है। इन फसलों में पानी की खपत भी गन्ने के मुकाबले बेहद कम होती है और बीमारियां लगने का जोखिम भी सीमित रहता है।
चीनी उत्पादन और आगामी पेराई सत्र पर क्या पड़ेगा असर?
गन्ने का रकबा घटने का सीधा प्रभाव आने वाले पेराई सत्र में चीनी मिलों के संचालन और कुल उत्पादन पर पड़ना तय है। यदि मिलों को अपनी पेराई क्षमता के अनुसार पर्याप्त गन्ना नहीं मिला, तो पेराई सत्र समय से पहले समाप्त हो सकता है। कच्चे माल की कमी से पेराई लागत बढ़ेगी, जिसका सीधा असर आने वाले महीनों में चीनी की खुदरा कीमतों पर और दबाव बना सकता है। गन्ना विभाग अब किसानों को जागरूक करने, खेतों में ट्रेंच विधि से सह-फसली खेती को बढ़ावा देने और रेड रॉट मुक्त नई उन्नत किस्मों के बीज रियायती दरों पर बांटने की कवायद में जुटा है, ताकि खोई हुई मिठास को दोबारा यूपी के खेतों में लौटाया जा सके।



