अमेरिका में ट्रंप की हार, भारतीय शेयर मार्केट में बहार! सेंसेक्स 1680 अंकों से अधिक उछला

अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर अब दुनिया भर के कमोडिटी और शेयर बाजारों पर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। अमेरिका में हुए महत्वपूर्ण चुनावों में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पार्टी को लगे बड़े राजनीतिक झटके के बाद वैश्विक बाजारों में एक नई हलचल मच गई है। इस राजनीतिक फेरबदल का सबसे सकारात्मक असर भारतीय शेयर बाजार पर पड़ा है, जहां हफ्ते के शुरुआती कारोबार में ही भूचाल जैसी तेजी देखने को मिली। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स (Sensex) 1680 अंकों से अधिक की ऐतिहासिक छलांग के साथ उछल गया, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी (Nifty) भी मजबूत बढ़त के साथ कारोबार करता नजर आया। इस जबरदस्त तेजी के पीछे कई बड़े वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारक काम कर रहे हैं, जिन्होंने निवेशकों का भरोसा एक बार फिर से आसमान पर पहुंचा दिया है।

अमेरिकी चुनावों के नतीजों और ट्रंप की हार का वैश्विक बाजारों पर असर

अमेरिका में राजनीतिक परिदृश्य बदलने के साथ ही वैश्विक निवेशक समुदाय ने राहत की सांस ली है। अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी को मिली हार और राजनीतिक संतुलन में आए बदलाव के बाद बाजार के जानकारों का मानना है कि इससे भविष्य की अमेरिकी नीतियों में अधिक स्थिरता और कूटनीतिक नरमी देखने को मिल सकती है। इस राजनीतिक घटनाक्रम का असर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर इंडेक्स पर भी पड़ा है, जिससे उभरते हुए बाजारों (Emerging Markets) की तरफ विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) का रुझान तेजी से बढ़ा है। जब दुनिया के सबसे बड़े बाजार में अनिश्चितता के बादल छंटते हैं, तो उसका सीधा फायदा भारत जैसे मजबूत बुनियादी ढांचे वाले विकासशील देशों के शेयर बाजारों को मिलता है, जो इस बार भी पूरी तरह स्पष्ट रूप से दिखाई दिया है।

कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट से भारतीय अर्थव्यवस्था को मिली बड़ी राहत

भारतीय शेयर बाजार में आई इस तूफानी तेजी के पीछे सबसे बड़ा आर्थिक कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) के दामों में आई भारी गिरावट है। अमेरिका में राजनीतिक समीकरण बदलने और वैश्विक आपूर्ति के नए समीकरणों के चलते ब्रेंट क्रूड के दाम लुढ़ककर निचले स्तर पर आ गए हैं। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए क्रूड ऑयल सस्ता होने से देश के आयात बिल और चालू खाता घाटे पर पड़ने वाला दबाव काफी हद तक कम हो जाता है। तेल की कीमतें घटने से देश के भीतर परिवहन लागत, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण खर्च में कमी आने की उम्मीद बंधती है, जिससे कंपनियों का मुनाफा सुधरता है और शेयर बाजार में जोरदार लिwali देखने को मिलती है।

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की जबरदस्त लिवाली और निवेशकों की संपत्ति में इजाफा

दलाल स्ट्रीट पर लौटी इस रौनक में विदेशी निवेशकों की भारी-भरकम खरीदारी ने सोने पर सुहागे का काम किया है। पिछले कुछ सत्रों से लगातार विदेशी फंड हाउस भारतीय शेयरों में बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश कर रहे हैं। बाजार खुलते ही चौतरफा हुई लिवाली के चलते निवेशकों की कुल संपत्ति (Investor Wealth) में कुछ ही घंटों के भीतर करीब 8 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम इजाफा दर्ज किया गया। सेंसेक्स के सभी प्रमुख शेयर हरे निशान में कारोबार करते हुए नजर आए, जिससे यह साबित होता है कि घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों का भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर की विकास गाथा पर अटूट विश्वास बना हुआ है। बैंकिंग, ऑटो, आईटी और मेटल सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा खरीदारी देखी गई है।

भारतीय रुपये में मजबूती और मैक्रो-इकोनॉमिक्स के मजबूत संकेत

शेयर बाजार की इस शानदार छलांग के साथ-साथ विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये (Indian Rupee) ने भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सुदृढ़ वापसी की है। कच्चे तेल के आयात पर कम खर्च होने और विदेशी निवेश के निरंतर प्रवाह के कारण रुपया मजबूत होकर अपने दो सप्ताह के उच्च स्तर के करीब पहुंच गया है। रुपये की यह मजबूती देश के आयातित सामानों को सस्ता बनाती है और विदेशी कर्ज चुकाने के बोझ को कम करती है। इसके अलावा, देश के भीतर खुदरा महंगाई दर को नियंत्रण में रखने के लिए केंद्रीय स्तर पर उठाए जा रहे कदम भी निवेशकों का मनोबल ऊंचा रख रहे हैं। इन तमाम सकारात्मक वृहद आर्थिक संकेतकों (Macro-Economic Indicators) के दम पर भारत वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।

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