क्या पीएम मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की आगामी मुलाकात में होने वाली है रूस के साथ सबसे बड़ी रक्षा महाडील

भारतीय रक्षा गलियारों और वैश्विक कूटनीति के मंच से इस वक्त की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और महाशक्तियों की धड़कनें तेज कर दी हैं। भारत और रूस के बीच सदियों से चली आ रही रणनीतिक और सैन्य साझेदारी एक बार फिर से इतिहास रचने के मुहाने पर खड़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स और रक्षा सूत्रों के हवाले से यह बड़ा खुलासा हुआ है कि वायु रक्षा प्रणाली के क्षेत्र में दुनिया के सबसे घातक हथियार 'एस-400' (S-400 Triumf) की शानदार सफलता के बाद अब भारत की निगाहें रूस के और भी ज्यादा अत्याधुनिक और अचूक हथियारों पर टिक चुकी हैं। आने वाले दिनों में भारत और रूस के शीर्ष नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच होने वाली उच्च स्तरीय द्विपक्षीय बातचीत में दुनिया की सबसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम 'एस-500' (S-500 Prometheus) और पांचवीं पीढ़ी के रडार-अदृश्य फाइटर जेट 'सुखोई Su-57' (Su-57 Felon) के अधिग्रहण को लेकर एक ऐतिहासिक महाडील पर मुहर लग सकती है। यदि यह मेगा डिफेंस डील फाइनल होती है, तो यह भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता को एक ऐसी अजेय ऊंचाई पर पहुंचा देगी, जिसका मुकाबला करना किसी भी दुश्मन देश के लिए नामुमकिन साबित होगा। इस हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक और रक्षा हलचल से जुड़े हर एक पहलू को आइए विस्तार से और गहराई के साथ समझते हैं।
S-400 की ऐतिहासिक सफलता के बाद एस-500 और Su-57 की ओर क्यों बढ़ रहे हैं भारत के कदम
जब भारत ने रूस के साथ एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का सौदा किया था, तब पश्चिमी देशों और अमेरिका की तरफ से भारी कूटनीतिक दबाव बनाया गया था। इसके बावजूद भारत ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए इस डील को पूरा किया और आज एस-400 भारतीय वायुसेना की ढाल बनकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहा है। इसकी अचूक मारक क्षमता और सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही दुश्मन के विमानों या मिसाइलों को आसमान में ही भाप लेने की तकनीक ने यह साबित कर दिया कि रूसी रक्षा तकनीक का कोई सानी नहीं है। अब जबकि आधुनिक युद्ध की रणनीतियां तेजी से बदल रही हैं और पड़ोसी देशों द्वारा लगातार अपनी हवाई ताकत को बढ़ाया जा रहा है, भारत को एक ऐसे और भी अधिक उन्नत सुरक्षा कवच की आवश्यकता महसूस हो रही है, जो हाइपरसोニック मिसाइलों और अंतरिक्ष से होने वाले हमलों को भी हवा में नेस्तनाबूद कर सके। यही वजह है कि भारत अब रूस के नवीनतम और सबसे गोपनीय प्रोजेक्ट 'एस-500' और पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ फाइटर जेट 'एसयू-57' को अपनी सेना में शामिल करने के विकल्पों पर बहुत ही गंभीरता से विचार कर रहा है।
क्या है S-500 प्रोमेथियस और Su-57 लड़ाकू विमान की खासियत, जो इन्हें बनाती है दुनिया में सबसे खतरनाक
रूस द्वारा विकसित 'एस-500 प्रोमेथियस' (S-500 Prometheus) वर्तमान समय में दुनिया की सबसे एडवांस एंटी-बैलिस्टिक और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल डिफेंस सिस्टम मानी जाती है। यह प्रणाली न केवल पारंपरिक लड़ाकू विमानों और क्रूज मिसाइलों को मार गिरा सकती है, बल्कि यह अंतरिक्ष के निचले हिस्से में मौजूद उपग्रहों और हाइपरसोनिक हथियारों को भी अपना निशाना बनाने की अद्भुत क्षमता रखती है। इसकी रडार रेंज और ट्रैकिंग क्षमता एस-400 से कई गुना अधिक शक्तिशाली है। वहीं दूसरी तरफ, 'सुखोई Su-57' (Su-57) रूस का पांचवीं पीढ़ी का ट्विन-इंजन स्टेल्थ मल्टी-रोल फाइटर जेट है। यह विमान अपने रडार-अदृश्य (Stealth) डिजाइन के कारण दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम की पकड़ में आए बिना गहराई तक जाकर हमला करने में पूरी तरह सक्षम है। भारतीय वायुसेना के बेड़े में यदि Su-57 शामिल होता है, तो यह भारत को वायु सेना के क्षेत्र में एक ऐसी रणनीतिक बढ़त दिलाएगा, जो दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह से भारत के पक्ष में मोड़ देगी।
प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की शिखर वार्ता और भारत-रूस रक्षा संबंधों का नया भविष्य
भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग किसी ठेकेदार और खरीदार का रिश्ता नहीं है, बल्कि यह दशकों पुराना एक ऐसा अटूट विश्वास है, जो हर अंतरराष्ट्रीय संकट की कसौटी पर खरा उतरा है। पश्चिमी देशों के तमाम प्रतिबंधों और दबाव के बावजूद भारत ने रूस के साथ अपने ऊर्जा और रक्षा व्यापार को बनाए रखा है और समय-समय पर इसे और अधिक मजबूत किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच व्यक्तिगत तालमेल और मजबूत कूटनीतिक संबंधों के कारण दोनों देशों के बीच बड़े समझौतों को अमलीजामा पहनाने में तेजी आई है। आगामी शिखर वार्ता में रक्षा प्रौद्योगिकी के स्वदेशी हस्तांतरण यानी 'मेक इन इंडिया' के तहत भारत में ही इन हथियारों के सह-उत्पादन (Co-production) को लेकर भी अहम चर्चा होने की उम्मीद है। भारत केवल तैयार हथियार खरीदने के बजाय अब तकनीक हासिल करने पर जोर दे रहा है, ताकि देश रक्षा निर्माण के क्षेत्र में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन सके।
वैश्विक महाशक्तियों की बढ़ रही चिंताएं और भारतीय रक्षा कूटनीति की परिपक्वता
रूस और भारत के बीच इस संभावित महाडील की आहट से अमेरिका, यूरोपीय देशों और पश्चिमी रक्षा गलियारों में बेचैनी साफ तौर पर देखी जा सकती है। पश्चिमी देश लगातार यह कोशिश कर रहे हैं कि भारत रूस पर अपनी निर्भरता कम करे, लेकिन भारत ने हमेशा अपनी विदेश नीति में 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को सर्वोपरि रखा है। भारत की यह स्पष्ट नीति है कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए जो भी हथियार सबसे उत्तम और उपयोगी होंगे, उनका चयन देश के हित में किया जाएगा। एस-500 और Su-57 को लेकर चल रही इन चर्चाओं ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब अपनी रक्षा आवश्यकताओं के लिए किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है। यह कदम न केवल भारतीय सशस्त्र बलों को दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं की कतार में खड़ा करेगा, बल्कि यह वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती हुई कूटनीतिक ताकत और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता का भी सबसे बड़ा प्रमाण है।



