Why Himalayas Trembling: क्यों कांप रहा है हिमालय? 1 महीने में आए 130 से ज्यादा भूकंप के झटके, लद्दाख से हिमाचल तक अलर्ट; समझें भूवैज्ञानिकों की चेतावनी

धरती का मुकुट कहे जाने वाले हिमालयी क्षेत्र में पिछले कुछ हफ्तों से जमीन के भीतर असामान्य हलचल देखी जा रही है। नेशनल सेंटर फॉर सेस्मोलॉजी (NCS) के हालिया आंकड़ों के अनुसार, बीते महज एक महीने के भीतर पूरे हिमालयी बेल्ट और उससे जुड़े हिंदूकुश-पामीर क्षेत्र में 130 से ज्यादा भूकंप के झटके दर्ज किए गए हैं। लद्दाख, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक लगातार जमीन डोल रही है। 3 या उससे अधिक तीव्रता वाले झटकों में सबसे ज्यादा 63 घटनाएं अकेले भारतीय हिमालयी क्षेत्र में रिकॉर्ड हुई हैं। लगातार आ रहे इन छोटे और मध्यम झटकों ने वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और आम नागरिकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं कि क्या यह किसी बड़े विनाशकारी भूकंप की आहट है।
आंकड़े क्यों डरा रहे हैं: 1 महीने में कहां-कितनी हलचल?
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) के रिकॉर्ड के विश्लेषण से सामने आया है कि पश्चिमी हिमालय का हिस्सा इस दौरान सबसे अधिक सक्रिय रहा:
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लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल: इस त्रिकोण में अकेले 36 से अधिक भूकंपीय घटनाएं दर्ज हुईं। 13 अगस्त को लद्दाख में 5.5 तीव्रता का तेज झटका महसूस किया गया, जिसकी गहराई जमीन से मात्र 10 किमी नीचे थी। इसके अलावा 4.3 और 4.4 तीव्रता के कई आफ्टरशॉक्स आए। शिमला, कांगड़ा, चंबा और डोडा-किश्तवाड़ में लगातार झटके लगे।
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अफगानिस्तान और हिंदूकुश-पामीर: इस गहरे भूगर्भीय इलाके में 26 झटके आए, जिनकी गहराई 100 से 180 किमी तक थी।
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नेपाल और उत्तराखंड: नेपाल में 10 और उत्तराखंड के बागेश्वर, चमोली, पिथौरागढ़ व उत्तरकाशी में 7 भूकंपीय गतिविधियां दर्ज की गईं।
क्यों कांप रहा है हिमालय: जमीन के नीचे का विज्ञान
हिमालय का निर्माण और उसका लगातार कांपना एक ही भूगर्भीय प्रक्रिया का हिस्सा है:
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टेक्टोनिक प्लेटों का निरंतर टकराव: भारतीय भूगर्भीय प्लेट (Indian Tectonic Plate) लगातार उत्तर दिशा की ओर खिसक रही है और तिब्बती/यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate) से टकरा रही है। यह टकराव प्रति वर्ष लगभग 4 से 5 सेंटीमीटर की दर से जारी है। जब दोनों विशाल चट्टानी प्लेटें आपस में टकराती हैं, तो उनके जोड़ों पर जबर्दस्त तनाव (Stress) इकट्ठा होता है।
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तनाव का फूटना (Seismic Energy Release): जब चट्टानें इस भारी दबाव को सहन नहीं कर पातीं, तो वे टूटती हैं या फॉल्ट लाइन के सहारे फिसलती हैं। इसी ऊर्जा के तरंगों के रूप में बाहर निकलने पर सतह पर भूकंप के झटके महसूस होते हैं।
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उथले भूकंप (Shallow Earthquakes) ज्यादा खतरनाक: पश्चिमी और मध्य हिमालय में हाल के ज्यादातर भूकंप 5 से 15 किलोमीटर की उथली गहराई पर आए हैं। उथले केंद्र वाले भूकंपों की ऊर्जा सीधे सतह तक पहुंचती है, जिससे कम तीव्रता होने पर भी कंपन ज्यादा तेज महसूस होता है।
छोटे झटके: बड़ी राहत या बड़े खतरे का अलार्म?
भूवैज्ञानिकों के बीच लगातार आ रहे इन छोटे भूकंपों को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण हैं:
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तनाव रिलीज होने की दलील: कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि छोटे-छोटे भूकंप आते रहने से प्लेटों के बीच फंसा हुआ तनाव धीरे-धीरे किस्तों में बाहर निकलता रहता है, जिससे किसी महा-भूकंप (Great Himalayan Earthquake) की तात्कालिक संभावना कुछ समय के लिए टल जाती है।
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'सिस्मिक गैप' का डर: वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) और प्रमुख भूवैज्ञानिकों के अनुसार, केवल छोटे भूकंप इतनी भारी ऊर्जा को पूरी तरह शांत नहीं कर सकते। हिमालय के कई ऐसे हिस्से हैं (जिन्हें सेंट्रल सिस्मिक गैप कहा जाता है), जहां पिछले 200 से 500 सालों में 8 या उससे अधिक तीव्रता का कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। इसका अर्थ यह है कि जमीन के नीचे भारी ऊर्जा संचित है, जो कभी भी एक बड़े झटके के रूप में फूट सकती है। हालांकि, वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि लगातार आ रहे छोटे भूकंप सीधे तौर पर किसी बड़े भूकंप की तारीख या समय की भविष्यवाणी नहीं करते।
उत्तर भारत और दिल्ली-एनसीआर के लिए खतरे की घंटी
हिमालय का बड़ा हिस्सा भूकंपीय संवेदनशीलता के मामले में देश के सबसे खतरनाक जोन-4 और जोन-5 में आता है। यदि हिमालयी बेल्ट में 7.5 या 8 तीव्रता का कोई बड़ा भूकंप आता है, तो उसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा।
गंगा के मैदानी इलाके (जैसे सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, लखनऊ) और विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील हैं। दिल्ली-एनसीआर की जमीन जलोढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) से बनी है, जो भूकंपीय तरंगों को सोखने के बजाय उन्हें और अधिक बढ़ा (Amplify) देती है। इसके अलावा, बिना भूकंपरोधी मानकों (Seismic Building Codes) के बने घने और कमजोर निर्माण इस खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सख्त बिल्डिंग नॉर्म्स का पालन, अनियोजित पहाड़ी निर्माण पर रोक और समय-समय पर मॉक ड्रिल ही इस प्राकृतिक आपदा के जान-माल के नुकसान को न्यूनतम करने का एकमात्र उपाय हैं।



