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भारत में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वन्यजीव सम्मेलन में पहली बार ‘एनीमल कल्चर’ को संरक्षण से जोड़ा गया

नई दिल्ली: भारत में आयोजित संयुक्त राष्ट्र वन्यजीव सम्मेलन में पहली बार ‘एनीमल कल्चर’ को संरक्षण से जोड़ा गया है। आपसी सामाजिक व्यवहारों से जो पशु सीखते हैं, ‘एनीमल कल्चर’ के जरिये उन व्यवहारों का अध्ययन किया जाता है।

ऐसे सबूत मिले हैं कि व्हेल, डॉलफिन, हाथी और अन्य पशु सोशल लर्निंग के जरिये कुछ समझ और कुशलता अर्जित कर लेते हैं। कुछ पशु अपने समूह के बड़ों या साथियों से विभिन्न व्यवहारों के बारे में सीख लेते हैं, जिनमें इष्टतम प्रवासी मार्ग शामिल हैं।

पूर्वी उष्णकटिबंधी प्रशांत स्पर्म व्हेल और नटक्रेकिंग चिंपेंजी के संरक्षण विषयक ऐसे दो प्रस्ताव गांधी नगर में चल रहे जंगली पशुओं की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के सम्मेलन (सीएमएस कॉप 13) में प्रतिनिधियों के सामने पेश किये जायेंगे।

स्पर्म व्हेल के लिए संगठित कार्रवाई चार उप-प्रजातियों की जटिल सामाजिक संरचना का संज्ञान लेती है। उनका नाभिक डीएनए एक-दूसरे से अधिक भिन्न नहीं है, लेकिन उनके स्वरोच्चारण में काफी अंतर है, जिससे  पता चलता है कि इन्हें सामाजिक आदान-प्रदान तथा सीखने के जरिये ही अर्जित किया जा सकता है। ध्वनि संबंधी और फोटोग्राफिक रिकार्डों के जरिये डाटा संकलन से संरक्षणकर्ताओं को सभी उप-प्रजातियों के सामाजिक ढांचे को पूरी तरह समझने में मदद मिल सकती है। प्रस्तावित संरक्षण उपाय ज्ञान अंतराल को कम करने के लिए अनुसंधान और सूचनाओं के आपसी आदान-प्रदान का आह्वान करता है।

नटक्रेकिंग चिंपेंजी के लिए की जाने वाली पहल उस प्रजाति की अनोखी तकनीकी संस्कृति को रेखांकित करती है। यह प्रजाति पत्थर या लकड़ी को हथौड़े और सिल के रूप में इस्तेमाल करके तरह-तरह की फलियां तोड़ने में सक्षम होता है। फलियां, पत्थर और लकड़ी आमतौर पर आसानी से उपलब्ध होती हैं लेकिन इन्हें फलियां तोड़ने के लिए इस्तेमाल करने वाली उप-प्रजातियां गिनी, सियेरा लियोन, लाइबेरिया और आईवरी कोस्ट जैसे धुर पश्चिमी इलाकों में पाई जाती हैं, अफ्रीका के अन्य इलाकों में नहीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह सांस्कृतिक क्षमता इन चिंपेंजियों को अपने प्राकृतिक वास में सूखे मौसम में खुद को बचाए रखने के काबिल बनाती है। जलवायु की वजह से वनस्पति में आने वाले इलाकों में चिंपेंजियों का ऐसा व्यवहार उनके जीवित रहने की संभावना बढ़ा सकता है।

सांस्कृतिक रूप से विकसित प्रजातियों के सामाजिक ताने-बाने को मानव गतिविधियां तोड़ देती हैं, जिसके कारण इन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इसी इलाके से किसी प्रजाति के गायब हो जाने से, उसके विषय में जानकारी भी खो जाती है। उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड तटरेखा के आसपास प्रवासन मार्ग के बारे में सदर्न राइट व्हेल ने समझ खो दी थी। इसका कारण यह था कि 1800 के दशक में उस इलाके में व्हेलों को पकड़ने का काम शुरू हो गया था। आजकल कुछ व्हेल मछलियों ने न्यूजीलैंड के आसपास फिर से बच्चों को जन्म देना शुरू कर दिया है।

इन व्हेलों में जेनेटिक मिश्रण के हाल के प्रमाण से पता चला है कि व्हेल के शिकार के दुष्प्रभावों से उभरने के बाद ये प्रजातियां अपने भूले हुए प्रवासी गंतव्यों को फिर से आबाद कर सकती हैं।

अपने साथियों और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक ज्ञान को सुरक्षित करना कुछ प्रजातियों की प्राण रक्षा और उनके सफल प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हाथियों के समूह के बुजुर्ग और कुल माताओं जैसे सामाजिक ज्ञान के ‘भंडार’ के रूप में काम करने वाले पशुओं को सुरक्षित करना भी उनके प्राकृतिक वास को बचाने जितना महत्वपूर्ण है। स्पर्म व्हेल कैसे अपने बच्चों तक मूल्यवान सूचना पहुंचाती है या चिंपेंजी के कुछ समूहों में पत्थर के औजारों से पोषक फलियों को तोड़ने की संस्कृति क्यों मौजूद है, जबकि अन्यों में नहीं, इसे जानना इन प्रजातियों की संरक्षण चुनौतियों का मूल्यांकन करने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

जंगली पशुओं की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण का सम्मेलन (सीएमएस) ‘एनीमल कल्चर’ की वैज्ञानिक जानकारी को इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहा है, ताकि लुप्तप्राय वन्यजीवों को बेहतर तरीके से सुरक्षित किया जा सके। ‘एनीमल कल्चर’ में वैज्ञानिक अनुसंधान ने काफी प्रगति की है। बहरहाल, यह जरूरी है कि नतीजों और सुझावों को आगे बढ़ाया जाए, ताकि सीएमएस के तहत संरक्षण प्रयासों के तहत इस जटिल मुद्दे पर आगे विचार किया जा सके।

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