टैक्स ऑडिट फॉर्म 3CD में 8 बड़े बदलाव: 30 सितंबर से पहले जान लें नए नियम, वरना रद्द हो सकती है फाइलिंग और लगेगा भारी जुर्माना

देशभर के कारोबारियों, प्रोफेशनल्स और चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CAs) के लिए सितंबर का यह अंतिम पखवाड़ा अत्यंत व्यस्त और महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। वित्तीय वर्ष 2025-26 (असेसमेंट ईयर 2026-27) के लिए इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 44AB के तहत टैक्स ऑडिट रिपोर्ट (Form 10B/3CA/3CB के साथ Form 3CD) दाखिल करने की अंतिम तिथि 30 सितंबर 2026 तय है।

इस बार टैक्स ऑडिट प्रक्रिया पिछले वर्षों की तरह सामान्य 'रोल-फॉरवर्ड' या कॉपी-पेस्ट आधारित नहीं रहने वाली है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा अधिसूचित संशोधनों के तहत फॉर्म 3CD के विवरणों में 8 बड़े और कड़े बदलाव लागू किए जा चुके हैं। यदि करदाता या टैक्स ऑडिटर पुराने फॉर्मेट के आधार पर ऑडिट रिपोर्ट अपलोड करते हैं, तो पोर्टल पर त्रुटि (Defective Return) आ सकती है या आयकर विभाग की तरफ से भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।

1. क्लॉज 12: प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन में सेक्शन 44BBC की नई एंट्री

फॉर्म 3CD के क्लॉज 12 में प्रॉफिट एंड लॉस अकाउंट (P&L) में शामिल उन लाभों की रिपोर्टिंग की जाती है जो अनुमानित कराधान (Presumptive Taxation) के आधार पर कर योग्य होते हैं।

इस संशोधन के तहत क्लॉज 12 में अब सेक्शन 44BBC को अनिवार्य रूप से जोड़ दिया गया है। यह सेक्शन विशेष रूप से कुछ निर्दिष्ट क्रूज जहाजों के संचालन से होने वाले लाभ के विशेष कराधान से जुड़ा है। यदि किसी निर्धारिती के खाते में इस श्रेणी की आय शामिल है, तो उसे अब पुराने सेक्शन (44AD, 44ADA, 44AE) के साथ अलग से कोडिफाई करके दिखाना होगा।

2. क्लॉज 19: चार पुराने डिडक्शन रो (Legacy Deductions) को हटाया गया

आयकर कानूनों के सरलीकरण और अप्रासंगिक हो चुके प्रावधानों को हटाने के क्रम में क्लॉज 19 से चार पुरानी कटौती पंक्तियों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है:

  • सेक्शन 32AC (मैन्युफैक्चरिंग में नए प्लांट व मशीनरी में निवेश पर कटौती)

  • सेक्शन 32AD (अधिसूचित पिछड़े क्षेत्रों में निवेश पर कटौती)

  • सेक्शन 35AC (सामाजिक व आर्थिक कल्याणकारी परियोजनाओं पर खर्च)

  • सेक्शन 35CCB (पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रमों पर व्यय)

कर सलाहकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे ऑडिट वर्किंग पेपर्स में इन निरस्त वर्गों के कॉलम हटा दें ताकि ई-फाइलिंग यूटिलिटी में एक्सएमएल/जेसन (JSON) एरर न आए।

3. क्लॉज 21: सेटलमेंट और कानूनी उल्लंघन खर्चों की अलग रिपोर्टिंग

क्लॉज 21(a) के दायरे को अत्यधिक सख्त बनाया गया है। पहले केवल किसी कानून के उल्लंघन के लिए लगाए गए दंड या जुर्माने (Penalties) को डिसअलो (Disallow) श्रेणी में दिखाया जाता था।

अब केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी भी कानून के तहत शुरू की गई दंडात्मक या नियामक कार्यवाहियों को निपटाने (Settlement) के लिए किए गए खर्चों को अलग से रिपोर्ट करना अनिवार्य कर दिया गया है। यानी यदि किसी कंपनी ने सेबी (SEBI), फेमा (FEMA) या अन्य नियामक जांच से बचने के लिए कोई सेटलमेंट फीस या कंपाउंडिंग चार्ज चुकाया है, तो उसे अब व्यापारिक खर्च मानकर क्लेम नहीं किया जा सकेगा और ऑडिटर को इसकी स्पष्ट जानकारी देनी होगी।

4. क्लॉज 22: MSME भुगतान और ब्याज का बदला हुआ ढांचा

यह बदलाव पूरे व्यापार जगत के लिए सबसे अधिक संवेदनशील है। संशोधित क्लॉज 22 के तहत अब एमएसएमई (सूक्ष्म और लघु उद्यम) अधिनियम के सेक्शन 15 और 23 के अंतर्गत लेन-देन की त्रिस्तरीय रिपोर्टिंग मांगी गई है:

  • एमएसएमईडी एक्ट के सेक्शन 23 के तहत अमान्य घोषित ब्याज की राशि।

  • वित्त वर्ष के दौरान सूक्ष्म या लघु उद्यमों को सेक्शन 15 के तहत देय कुल राशि।

  • निर्धारित समय सीमा (15 या अधिकतम 45 दिन) के भीतर चुकाई गई कुल राशि।

  • तय समयसीमा के भीतर न चुकाई गई और कर योग्य आय में जोड़ी जाने वाली (Inadmissible) बकाया राशि।

5. क्लॉज 26: सेक्शन 43B(h) के लिए विशेष रिपोर्टिंग व्यवस्था

सेक्शन 43B के अंतर्गत क्लॉज 26 को अद्यतन करते हुए 'Allowed' शब्द के स्थान पर 'Allowable' किया गया है और इसमें सेक्शन 43B(h) को स्पष्ट रूप से अलग किया गया है।

साधारण सेक्शन 43B खर्चों (जैसे टैक्स, ड्यूटी, बैंक ब्याज) में छूट यह होती है कि यदि उनका भुगतान इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) दाखिल करने की नियत तारीख से पहले कर दिया जाए, तो कटौती मिल जाती है। लेकिन एमएसएमई के भुगतान यानी 43B(h) पर यह रिटर्न फाइलिंग तक की छूट लागू नहीं होती। 31 मार्च तक जो राशि बकाया रह गई और समय सीमा पार हो चुकी है, वह सीधे उसी वर्ष के मुनाफे में जुड़ जाएगी। फॉर्म 3CD में अब इसे अलग से उजागर करना अनिवार्य है।

6. क्लॉज 28 और 29 को फॉर्म 3CD से किया गया बाहर

ऑडिट रिपोर्ट को आधुनिक कर प्रणाली के अनुरूप बनाने के लिए फॉर्म 3CD से क्लॉज 28 और क्लॉज 29 को पूरी तरह हटा (Omit) दिया गया है

क्लॉज 28 में बिना प्रतिफल या अपर्याप्त प्रतिफल पर प्राप्त शेयरों से संबंधित पुराने नियमों की रिपोर्टिंग होती थी, जबकि क्लॉज 29 में फेयर मार्केट वैल्यू से अधिक पर शेयर जारी करने पर विचार किया जाता था। इन दोनों क्लॉजों के हटने के बाद अब ऑडिटर्स को इस सेक्शन में कोई डेटा फीड नहीं करना है।

7. क्लॉज 31: लोन, डिपॉजिट और रीपेमेंट के लिए नेचर कोड्स अनिवार्य

कैश ट्रांजैक्शन और हवाला लेन-देन पर रोक लगाने के लिए क्लॉज 31 को अत्यधिक विस्तृत बना दिया गया है। सेक्शन 269SS और 269T के तहत 20,000 रुपये या उससे अधिक के लोन, डिपॉजिट और उनके पुनर्भुगतान की रिपोर्टिंग में अब केवल राशि और नाम देना पर्याप्त नहीं होगा।

अब ऑडिटर को प्रत्येक लेन-देन के लिए निर्दिष्ट नेचर और मोड कोड (Nature and Mode Codes) दर्ज करने होंगे। इसमें स्पष्ट करना होगा कि लेन-देन:

  • नकद में हुआ,

  • गैर-अकाउंट पेयी चेक/ड्राफ्ट से हुआ,

  • संपत्ति या देनदारी के ट्रांसफर/कन्वर्जन के जरिए हुआ,

  • या केवल जर्नल एंट्री (खाता समायोजन) के जरिए डेबिट/क्रेडिट किया गया।

8. नया क्लॉज 36B: शेयर बायबैक पर मिली राशि का खुलासा

फॉर्म 3CD में जोड़ा गया सबसे नया क्लॉज Clause 36B है। यह क्लॉज शेयर बायबैक (Share Buyback) से जुड़ी प्राप्तियों पर नजर रखने के लिए लाया गया है।

यदि करदाता को आयकर अधिनियम के सेक्शन 2(22)(f) के अंतर्गत कवर होने वाले शेयरों के बायबैक पर कोई राशि प्राप्त हुई है, तो ऑडिटर को इस नए क्लॉज में दो मुख्य जानकारियां दर्ज करनी होंगी:

  1. बायबैक पर कुल कितनी धनराशि प्राप्त हुई।

  2. उन बायबैक किए गए शेयरों की वास्तविक अधिग्रहण लागत (Cost of Acquisition) क्या थी।

लखनऊ, दिल्ली, मुंबई समेत देश भर के व्यापारिक हब में हलचल

उत्तर प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक और व्यापारिक केंद्रों—जैसे लखनऊ (अमीनाबाद, ट्रांसपोर्ट नगर, हजरतगंज), कानपुर (माल रोड, फजलगंज इंडस्ट्रियल एरिया), नोएडा, गाजियाबाद, वाराणसी और आगरा—से लेकर दिल्ली-एनसीआर और मुंबई तक चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के कार्यालयों में काम का भारी दबाव देखा जा रहा है।

विशेष रूप से एमएसएमई क्लॉज (क्लॉज 22 और 26) के कारण छोटे विनिर्माताओं और थोक व्यापारियों को अपने सभी सप्लायर्स के उद्यम आधार (Udyam Aadhar) सर्टिफिकेट और 31 मार्च की इनवॉइस-वार पेंडेंसी का मिलान करना पड़ रहा है। जिन कारोबारियों ने एमएसएमई सप्लायर्स को समय पर भुगतान नहीं किया है, उन्हें भारी टैक्स असेसमेंट का सामना करना पड़ सकता है।

30 सितंबर की समयसीमा चूके तो क्या होगा नुकसान

टैक्स ऑडिट रिपोर्ट 30 सितंबर तक ऑनलाइन फाइल न करने की स्थिति में आयकर अधिनियम के सेक्शन 271B के तहत दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। इसके तहत:

  • कुल कारोबार/टर्नओवर का 0.5%, या

  • अधिकतम ₹1,50,000 (डेढ़ लाख रुपये)—जो भी कम हो, पेनल्टी के रूप में करदाता पर ठोका जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, ऑडिट रिपोर्ट समय पर न जाने से 31 अक्टूबर तक भरी जाने वाली अंतिम इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भी प्रभावित हो सकती है और करदाता को नुकसान (Losses) को आगे ले जाने (Carry Forward) की अनुमति नहीं मिलेगी। इसलिए कारोबारी तुरंत अपने सीए से संपर्क कर इन 8 नए क्लॉजों के अनुरूप अपने खाते फाइनल करें।

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