यूपी पंचायत चुनाव का काउंटडाउन: हाईकोर्ट में आज अहम सुनवाई; क्या खत्म होगा प्रशासक राज या टलेगा मतदान? जानिए कानूनी पेच और पूरी रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सियासी और प्रशासनिक हलचल तेज हो चुकी है। ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत (BDC) और जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव समय पर कराने, प्रशासकों की नियुक्ति और आरक्षण रोटेशन प्रक्रिया को लेकर दायर याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में आज बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई होने जा रही है। प्रदेश भर के भावी प्रत्याशियों, मौजूदा ग्राम प्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की नजरें अदालत की इस कार्यवाही पर टिकी हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243E के तहत ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव संपन्न कराना संवैधानिक बाध्यता है, जबकि सरकार और राज्य चुनाव आयोग की प्रशासनिक तैयारियों, परिसीमन और मतदाता सूची के पुनरीक्षण के चलते चुनाव कार्यक्रम की संभावित तारीखों को लेकर संशय बना हुआ है।

क्या खत्म होगा 'प्रशासक राज' या फिर बढ़ाई जाएगी अंतरिम व्यवस्था?

पंचायत प्रतिनिधियों का 5 वर्षीय कार्यकाल पूरा होने के बाद यदि समय पर चुनाव नहीं हो पाते, तो पंचायती राज अधिनियम के तहत सरकार सहायक विकास अधिकारियों (ADO) या प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त कर देती है। याचिकाओं में इस 'प्रशासक राज' को लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे के खिलाफ बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है। याचिकाओं में कहा गया है कि प्रशासकों के हाथ में कमान जाने से गांवों के विकास कार्य ठप हो जाते हैं और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के अधिकार नौकरशाही के पास चले जाते हैं। अदालत में आज इस बात पर तीखी बहस होने की उम्मीद है कि क्या सरकार को एक निश्चित समयसीमा के भीतर अधिसूचना जारी करने का बाध्यकारी निर्देश दिया जाए या फिर मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था को कुछ और समय के लिए जारी रखने की अनुमति मिलेगी।

आरक्षण निर्धारण और रैपिड सर्वे का कानूनी पेंच

यूपी पंचायत चुनाव में तारीखों के निर्धारण के साथ-साथ सबसे बड़ा कानूनी और प्रशासनिक पेंच सीटों के आरक्षण (Reservation Formula) को लेकर फंसता रहा है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य किए गए 'ट्रिपल टेस्ट' (Triple Test) और रैपिड सर्वे के आंकड़ों के आधार पर ही वार्डों और ग्राम पंचायतों का नए सिरे से चक्रानुक्रम (Rotation) आरक्षण तय होना है। इसके अलावा परिसीमन (Delimitation) के बाद कई ग्राम पंचायतों के शहरी स्थानीय निकायों (नगर निगम या नगर पालिका) में शामिल होने के कारण सीटों की संख्या में बदलाव हुआ है। यदि अदालत आरक्षण प्रक्रिया या मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर किसी स्पष्ट समय-सारिणी पर सहमति देती है, तभी राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सकेगा।

राज्य निर्वाचन आयोग की तैयारियां और संभावित चुनावी शेड्यूल

उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग पहले से ही मतदाता सूची के पुनरीक्षण, मतपत्रों की छपाई और मतदान केंद्रों के भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया में जुटा हुआ है। आयोग का रुख स्पष्ट है कि जैसे ही शासन की ओर से आरक्षण की अंतिम सूची सौंपी जाएगी और अदालत से हरी झंडी मिलेगी, 30 से 45 दिनों की प्रक्रिया के भीतर चार से पांच चरणों में मतदान संपन्न कराया जा सकता है। हाईकोर्ट के संभावित आदेश के बाद यह साफ हो जाएगा कि क्या यूपी के गांवों में लोकतंत्र की चुनावी रणभेरी तुरंत बजेगी या फिर प्रत्याशियों और मतदाताओं को नई तिथियों के लिए कुछ हफ्तों का और इंतजार करना पड़ेगा।

Related Articles

Back to top button