नो-पार्किंग के नाम पर दोहरे मापदंड: अस्पतालों पर नरमी और मॉल्स पर क्रेन का कहर

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में नगर निगम और यातायात पुलिस के संयुक्त प्रवर्तन अभियान के तहत संचालित होने वाली क्रेन टोइंग (गाड़ी उठाने की व्यवस्था) गंभीर विवादों के घेरे में आ गई है। शहर के नागरिकों, स्थानीय व्यापारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने नगर निगम के शीर्ष अधिकारियों और क्रेन ठेकेदारों के बीच कथित सांठगांठ का खुला आरोप लगाया है।

शिकायतकर्ताओं का कहना है कि शहर में अवैध पार्किंग और अतिक्रमण हटाने के नाम पर खुलेआम दोहरा चरित्र अपनाया जा रहा है। एक तरफ जहां शहीद पथ स्थित मेदांता अस्पताल और फैजाबाद रोड स्थित चंदन अस्पताल जैसे बड़े निजी चिकित्सा संस्थानों के बाहर सर्विस लेन और मुख्य सड़कों पर दिनभर बेतरतीब तरीके से दर्जनों गाड़ियां खड़ी रहने के बावजूद नगर निगम की क्रेनें वहां फटकती तक नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ लूलू मॉल, गोमती नगर स्थित फन रिपब्लिक मॉल, आईनॉक्स (INOX) और हजरतगंज के आसपास चंद मिनटों के लिए रुकी आम जनता की गाड़ियों को तुरंत क्रेन से खींच लिया जाता है। स्थानीय स्तर पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि जो संस्थान या इलाके कथित तौर पर 'महीना' या अनुचित लाभ नहीं पहुंचाते, केवल वहीं कड़ा अभियान चलाया जाता है, जबकि मिलीभगत वाले क्षेत्रों में नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

अस्पताल बनाम मॉल: आखिर क्यों बदल जाते हैं नगर निगम के टोइंग नियम?

राजधानी की सड़कों पर क्रेन संचालन की पड़ताल करने पर कार्रवाई में साफ विषमता नजर आती है:

  • मेदांता और चंदन अस्पताल के बाहर का हाल: शहीद पथ और फैजाबाद रोड पर स्थित इन दोनों बड़े सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में रोजाना हजारों मरीज और तीमारदार पहुंचते हैं। अस्पतालों के भीतर तय पार्किंग क्षमता कम पड़ने पर गाड़ियां सर्विस लेन, फुटपाथ और मुख्य कैरिजवे तक पार्क कर दी जाती हैं, जिससे पीक आवर्स में भीषण जाम की स्थिति बन जाती है। स्थानीय लोगों का गंभीर आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन और स्थानीय स्तर पर कथित प्रशासनिक समझ-बूझ के चलते यहां टोइंग गाड़ियां कभी कार्रवाई नहीं करतीं।

  • लूलू मॉल, फन मॉल और आईनॉक्स के बाहर सख्त पहरा: इसके विपरीत, शहीद पथ पर लूलू मॉल या गोमती नगर में फन मॉल और मल्टीप्लेक्सों के आसपास बाहर से आने वाले मुसाफिर यदि किसी को ड्रॉप करने या थोड़ी देर के लिए सड़क किनारे रुकते हैं, तो क्रेन कर्मी बिना कोई चेतावनी दिए या अनाउंसमेंट किए गाड़ी को जबरन टो कर ले जाते हैं।

  • वसूली और जुर्माने का खेल: गाड़ी उठाने के बाद चालकों से ₹1,000 से ₹2,500 तक का भारी जुर्माना और टोइंग चार्ज वसूला जाता है। आरोप है कि यह पूरी कवायद ट्रैफिक सुधारने के लिए नहीं, बल्कि निजी क्रेन ठेकेदारों के डेली टार्गेट और अवैध कमीशन के तंत्र को भरने के लिए की जा रही है।

नगर आयुक्त और शीर्ष नेतृत्व पर सवाल: विजिलेंस जांच की उठी मांग

इस पक्षपातपूर्ण कार्रवाई को लेकर नागरिकों और सामाजिक संगठनों का आक्रोश अब सीधे विभाग के मुखिया और नगर आयुक्त की कार्यशैली पर केंद्रित हो गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तब तक पार्किंग और टोइंग के नाम पर चल रही यह संगठित मनमानी बंद नहीं होगी।

नागरिक संगठनों और कानूनी जानकारों ने उत्तर प्रदेश सतर्कता अधिष्ठान (Vigilance Department) और शासन के उच्चाधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग करते हुए निम्नलिखित बिंदुओं पर जांच की मांग उठाई है:

  • क्रेन टेंडर और राजस्व का ऑडिट: नगर निगम द्वारा निजी क्रेन ऑपरेटरों को दिए गए अनुबंधों, गाड़ियों के दैनिक चालान के अनुपात और सरकारी खजाने में जमा होने वाली राशि की गहन वित्तीय पड़ताल की जाए।

  • क्षेत्रीय पक्षपात की वीडियो मॉनिटरिंग: सीसीटीवी और जीपीएस डेटा के आधार पर जांच की जाए कि पिछले 6 महीनों में क्रेनें किन विशिष्ट सड़कों पर सबसे ज्यादा सक्रिय रहीं और बड़े निजी संस्थानों के सामने से कितनी गाड़ियां उठाई गईं।

  • कमीशनखोरी के सिंडिकेट की जांच: इस बात की पड़ताल कराई जाए कि क्या क्रेन माफिया और नगर निगम के प्रवर्तन दस्ते के बीच कथित मासिक उगाही का कोई गुप्त चैनल चल रहा है।

निजी क्रेन ठेकेदारों की कार्यप्रणाली: नियमों की खुली अनदेखी

यातायात और नगर निगम के नियमों के तहत किसी भी वाहन को उठाने से पहले कुछ अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक होता है, जिसे जमीन पर पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है:

  • लाउडस्पीकर पर चेतावनी अनिवार्य: नियम के अनुसार, नो-पार्किंग में खड़ी गाड़ी को क्रेन पर चढ़ाने से पहले लाउडहाइलर/माइक से गाड़ी का नंबर बोलकर 2 से 3 मिनट का समय मालिक को दिया जाना चाहिए। लेकिन क्रेन कर्मी छिपकर आते हैं और मालिक के आते-आते गाड़ी खींचकर ले जाते हैं।

  • गाड़ी के भीतर व्यक्ति की मौजूदगी: यदि गाड़ी के भीतर कोई बुजुर्ग, महिला, बच्चा या बीमार व्यक्ति बैठा हो, तो उसे किसी भी सूरत में टो नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद कई बार जबरन गाड़ी खींचने के प्रयास में गंभीर विवाद और दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।

  • गाड़ी को होने वाला नुकसान: अनाड़ी क्रेन ऑपरेटरों द्वारा क्लैंप लगाने या हाइड्रो-लिफ्ट करते समय लग्जरी और ऑटोमैटिक कारों के बंपर, सस्पेंशन और गियरबॉक्स क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिसका कोई हर्जाना निगम या ठेकेदार नहीं देता।

यदि गलत तरीके से उठाई जाए आपकी गाड़ी, तो क्या हैं कानूनी अधिकार?

यदि किसी वाहन चालक को लगता है कि उसकी गाड़ी को अवैध तरीके से उठाया गया है या उससे नियमों के विपरीत वसूली की जा रही है, तो वह इन कानूनी विकल्पों का सहारा ले सकता है:

  • ऑन-द-स्पॉट चालान का नियम: मोटर व्हीकल एक्ट के नियमों के अनुसार, यदि क्रेन द्वारा गाड़ी को बांधने या उठाने की प्रक्रिया के दौरान ही वाहन स्वामी मौके पर पहुंच जाता है, तो क्रेन उसे जबरन टो करके यार्ड में नहीं ले जा सकती। ऐसी स्थिति में केवल निर्धारित नो-पार्किंग का चालान काटकर गाड़ी को वहीं छोड़ना अनिवार्य है।

  • डिजिटल साक्ष्य और वीडियो रिकॉर्डिंग: क्रेन कर्मियों द्वारा बदसलूकी या गाड़ी खींचने का तुरंत वीडियो बनाएं। पर्ची पर सरकारी मुहर, क्रेन नंबर और ई-चालान रसीद की मांग करें।

  • आईजीआरएस और जनसुनवाई पोर्टल: मुख्यमंत्री के जनसुनवाई पोर्टल (IGRS Portal) पर लोकेशन, समय और क्रेन के नंबर के साथ पक्षपातपूर्ण कार्रवाई की सीधी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

  • हेल्पलाइन पर सूचना: जबरन वसूली या विवाद की स्थिति में तत्काल यूपी 112 और नगर निगम के हेल्पलाइन नंबर 1533 पर कॉल करके घटना की आधिकारिक शिकायत दर्ज कराएं।

 

Related Articles

Back to top button