CNG Price Hike: क्या पेट्रोल से भी महंगी हो गई CNG? कई शहरों में दाम ₹105 के पार, आम जनता और कैब चालकों की जेब पर बड़ा झटका

देश के कई प्रमुख शहरों में कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (CNG) की कीमतें ₹100 से ₹105 प्रति किलोग्राम के आंकड़े को छू रही हैं और कुछ इलाकों में पार भी कर चुकी हैं। कभी मध्यम वर्ग और व्यावसायिक वाहन चालकों के लिए सबसे सस्ता और किफायती विकल्प मानी जाने वाली सीएनजी अब पेट्रोल के दामों को सीधी टक्कर दे रही है। जिन लोगों ने पेट्रोल के भारी खर्च से बचने के लिए लाखों रुपये खर्च करके सीएनजी किट लगवाई थी या सीएनजी गाड़ियां खरीदी थीं, वे अब खुद को असमंजस की स्थिति में पा रहे हैं।

सीएनजी के दामों में लगातार आग क्यों? जानिए पूरा गणित

प्राकृतिक गैस की खुदरा कीमतों में इस ऐतिहासिक बढ़ोतरी के पीछे मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव और घरेलू स्तर पर नीतियों में बदलाव जिम्मेदार हैं। भारत अपनी प्राकृतिक गैस की कुल जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल के भाव बदलते हैं, तो उसका सीधा असर स्थानीय गैस वितरण कंपनियों की लागत पर पड़ता है।

इसके अलावा, सरकार द्वारा दी जाने वाली घरेलू एपीएम (Administered Price Mechanism) गैस के कोटे में कटौती और सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों को महंगी आयातित गैस पर निर्भर होना पड़ रहा है। परिणामस्वरूप, गैस वितरण कंपनियों ने बढ़ी हुई इनपुट लागत का पूरा बोझ सीधे अंतिम उपभोक्ताओं की जेब पर डाल दिया है।

पेट्रोल बनाम सीएनजी: क्या अब भी बचा है बचत का दायरा?

अगर तुलनात्मक रूप से देखा जाए, तो पेट्रोल की मौजूदा कीमतें देश के अधिकांश राज्यों में ₹94 से ₹106 प्रति लीटर के बीच बनी हुई हैं। वहीं कई राज्यों और दूर-दराज के जिलों में सीएनजी ₹95 से ₹105 प्रति किलोग्राम के स्तर पर बिक रही है।

कागजी तौर पर सीएनजी का माइलेज पेट्रोल के मुकाबले प्रति किलोग्राम कुछ किलोमीटर अधिक जरूर रहता है, लेकिन जब दोनों के खुदरा दामों में अंतर लगभग खत्म हो जाता है, तो वाहन मालिक की कुल बचत न के बराबर रह जाती है। सीएनजी किट का नियमित रखरखाव, बूट स्पेस (डिक्की) की कमी, हाइड्रो टेस्टिंग का खर्च और गैस भराने के लिए घंटों लंबी कतारों में लगने वाला समय जोड़ने के बाद यह सौदा अब पहले जैसा फायदेमंद नहीं दिखता।

ऑटो और कैब ड्राइवरों की आजीविका पर सीधा प्रहार

इस मूल्य वृद्धि का सबसे गंभीर प्रभाव ओला, उबर जैसी ऐप-आधारित टैक्सियों, ऑटो-रिक्शा चालकों और छोटे मालवाहक वाहन स्वामियों पर पड़ा है। महानगरों में कैब चलाकर गुजारा करने वाले चालकों का कहना है कि उनकी रोजाना की कमाई का लगभग 50 से 60 प्रतिशत हिस्सा केवल ईंधन भराने में निकल जाता है।

दूसरी ओर, एग्रीगेटर कंपनियों के किराए और यात्री भाड़े में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई है। इससे चालकों का दैनिक मुनाफा घटकर आधा रह गया है। कई शहरों में ट्रांसपोर्ट यूनियनों ने किराया बढ़ाने या ईंधन पर लगने वाले टैक्स को कम करने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू करने की चेतावनी भी दी है।

वैट और टैक्स का दोहरा मार: जीएसटी के दायरे से बाहर ईंधन

सीएनजी की ऊंची कीमतों का एक बड़ा कारण कर ढांचा भी है। पेट्रोल और डीजल की तरह सीएनजी को भी अभी तक वस्तु एवं सेवा कर (GST) के दायरे में नहीं लाया गया है। इसके चलते केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और अलग-अलग राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) दोनों मिलकर इसकी अंतिम कीमत को बहुत ऊंचा बना देते हैं।

उदाहरण के तौर पर, दिल्ली-एनसीआर में जहां वैट की दरें अपेक्षाकृत संतुलित हैं, वहां सीएनजी लगभग ₹80-₹84 प्रति किलो के दायरे में है, लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई शहरों में वैट और अतिरिक्त ट्रांसपोर्टेशन लॉजिस्टिक्स जुड़ने के बाद यह दर ₹95 से ₹105 प्रति किलो तक पहुंच जाती है। राज्यों के बीच कीमतों का यह बड़ा अंतर सीधे तौर पर प्रांतीय टैक्स नीतियों को दर्शाता है।

क्या कहते हैं ऑटोमोबाइल और ऊर्जा विशेषज्ञ?

ऑटोमोबाइल सेक्टर के विश्लेषकों का मानना है कि यदि सीएनजी के दामों में स्थिरता नहीं आई, तो सीएनजी वाहनों की बिक्री में भारी गिरावट आ सकती है। पिछले तीन वर्षों में कई कार निर्माताओं ने डीजल मॉडल बंद करके फैक्टरी-फिटेड सीएनजी गाड़ियों पर बड़ा दांव लगाया था।

अब यदि ग्राहक को पेट्रोल और सीएनजी के परिचालन खर्च में उल्लेखनीय अंतर नहीं दिखेगा, तो वे सीएनजी के बजाय पेट्रोल हाइब्रिड या फिर सीधे इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर रुख करेंगे। हालांकि, देश में ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी विकास के चरण में है, जिससे आम उपभोक्ता के सामने किफायती सफर का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

आगे की राह: क्या सरकार से राहत की उम्मीद है?

जनता की नजरें अब केंद्र और राज्य सरकारों पर टिकी हैं। ऊर्जा जानकारों का सुझाव है कि सीएनजी को तुरंत जीएसटी के दायरे में लाया जाए, जिससे पूरे देश में एक समान और तर्कसंगत कर व्यवस्था लागू हो सके। साथ ही, घरेलू गैस आवंटन में सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को उच्च प्राथमिकता देकर सब्सिडी या टैक्स छूट दी जाए, ताकि सार्वजनिक परिवहन और मध्यम वर्ग को महंगाई के इस दोहरे झटके से बचाया जा सके।

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