Bappi Lahiri Birth Anniversary: सोने की भारी चेन और डिस्को की धुन, जब बप्पी दा ने एक साल में 180 गाने रिकॉर्ड कर हिला दी थी पूरी दुनिया

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मुंबई। भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी ‘डिस्को’ शब्द का जिक्र होता है, तो आंखों के सामने एक ऐसी छवि उभरती है जो चमक-धमक, सोने की मोटी जंजीरों और काले चश्मे से सजी होती है। हम बात कर रहे हैं संगीत की दुनिया के इकलौते ‘डिस्को किंग’ बप्पी लहरी की। बप्पी दा सिर्फ एक संगीतकार या गायक नहीं थे, बल्कि वे खुद में एक पूरा संस्थान और एक अनोखा स्टाइल स्टेटमेंट थे। आज उनकी यादों के गलियारों में झांकें तो समझ आता है कि कैसे एक बंगाली बाबू ने पूरे बॉलीवुड को अपनी धुन पर थिरकने के लिए मजबूर कर दिया था।

तीन साल की उम्र में शुरू हुआ सुरों का सफर

27 नवंबर 1952 को बंगाल के एक प्रतिष्ठित संगीत घराने में जन्मे अलोकेश लहरी (बप्पी दा) को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता अपरेश लहरी और मां बंसरी लहरी दोनों ही संगीत की दुनिया के दिग्गज थे। बप्पी दा के रगों में संगीत इस कदर दौड़ता था कि महज तीन साल की उम्र में उन्होंने तबला बजाना शुरू कर दिया था। उन्होंने तबला वादन की बारीकियां मशहूर गुरु पंडित शांताप्रसाद से सीखीं और 11 साल की उम्र तक आते-आते वे पियानो पर अपनी उंगलियां चलाने लगे थे। यह उनकी मेहनत और लगन ही थी कि आगे चलकर उन्होंने 500 से ज्यादा फिल्मों में संगीत दिया और 5000 से अधिक गाने गाए।

नन्हा शिकारी से शुरू हुआ सफर और ‘जख्मी’ से मिली पहचान

बप्पी लहरी ने बॉलीवुड में अपने सफर की शुरुआत साल 1973 में फिल्म ‘नन्हा शिकारी’ से की थी। हालांकि, उन्हें घर-घर में पहचान साल 1975 की फिल्म ‘जख्मी’ से मिली। इस फिल्म में उन्होंने न केवल अपनी धुनों का जादू बिखेरा, बल्कि एक प्लेबैक सिंगर के रूप में भी अपनी दमदार आवाज का परिचय दिया। इसके बाद तो जैसे हिट गानों की झड़ी लग गई। 80 और 90 के दशक में बप्पी दा का संगीत हर पार्टी और हर जश्न की पहली पसंद बन गया। उन्होंने पॉप और डिस्को का जो फ्यूजन तैयार किया, वह उस दौर के युवाओं के लिए बिल्कुल नया और जोशीला था।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

बप्पी दा की काम के प्रति दीवानगी ऐसी थी कि उन्होंने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसे तोड़ना आज के दौर के संगीतकारों के लिए नामुमकिन सा लगता है। साल 1986 में बप्पी लहरी ने एक ही साल में 33 फिल्मों के लिए 180 से ज्यादा गाने रिकॉर्ड किए। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि को ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में जगह मिली। उस समय पूरी फिल्म इंडस्ट्री उनकी इस रफ्तार और ऊर्जा को देखकर दंग रह गई थी। उनके लिए संगीत सिर्फ पेशा नहीं, बल्कि उनकी सांसों में बसा जुनून था।

सोने से प्यार और एल्विस प्रेस्ली का कनेक्शन

बप्पी लहरी की पहचान उनके ढेर सारे सोने के गहनों के बिना अधूरी है। उनके इस अनोखे शौक के पीछे अमेरिकी रॉकस्टार एल्विस प्रेस्ली का हाथ था। बप्पी दा एल्विस प्रेस्ली के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उन्हें अक्सर सोने की चेन पहने देखा करते थे। तभी उन्होंने तय किया था कि जब वे सफल होंगे, तो अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे। उन्होंने अपना यह वादा निभाया और सोना पहनना उनके लिए ‘लकी चार्म’ बन गया। चर्चा तो यहां तक थी कि बप्पी दा सोने के कप में चाय पीना पसंद करते थे और वे सोने को भगवान का आशीर्वाद मानते थे।

सदाबहार रहेगी ‘डिस्को किंग’ की विरासत

बप्पी लहरी ने भारतीय संगीत जगत को ‘आई एम ए डिस्को डांसर’, ‘याद आ रहा है’, ‘तम्मा तम्मा’ और ‘यार बिना चैन कहां रे’ जैसे अनगिनत सदाबहार गाने दिए। उनके संगीत ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों को प्रभावित किया। भले ही आज बप्पी दा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली धुनें, उनका ‘गोल्डन’ अंदाज और उनके चेहरे की वह मासूम मुस्कान हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में जिंदा रहेगी। भारतीय संगीत के इतिहास में बप्पी लहरी का नाम हमेशा सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा।

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