1 घंटे 44 मिनट की इस कल्ट क्लासिक फिल्म का वह ऐतिहासिक गाना, जिसे आज भी बप्पा के हर पंडाल में बजाना मानते हैं सबसे बड़ा शगुन

गणेश चतुर्थी का पावन पर्व आते ही चारों तरफ ढोल-नगाड़ों की गूंज और बप्पा के जयकारों से पूरा देश भक्ति के रंग में सराबोर हो जाता है, लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा आइकॉनिक और रोंगटे खड़े कर देने वाला गाना है जिसके बिना गणेशोत्सव की हर धूम अधूरी सी मानी जाती है। महज 1 घंटे 44 मिनट की एक छोटी और कल्ट क्लासिक फिल्म का यह चमत्कारी ट्रैक आज भी देश के कोने-कोने में गणेश चतुर्थी के अवसर पर हर बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक की पहली और इकलौती पसंद बना हुआ है। इस गाने की धुन में ऐसा सम्मोहन और आध्यात्मिक ऊर्जा छिपी है कि जब भी यह पंडालों या गलियों में बजता है, तो लोग खुद-ब-खुद झूमने पर मजबूर हो जाते हैं और पूरा माहौल उत्सवमय हो जाता है। संगीत प्रेमियों और सिने प्रेमियों की जुबान पर सालों बाद भी इस गाने का जादू इस कदर सिर चढ़कर बोल रहा है कि आधुनिकता के इस दौर में भी कोई दूसरा नया गाना इसकी लोकप्रियता को पीछे नहीं छोड़ पाया है।
इस ऐतिहासिक और सदाबहार गाने की सफलता के सबसे बड़े नायक प्रतिभाशाली संगीतकार और कलाकार श्रवण सुरेश रहे हैं, जिन्होंने अपनी अद्भुत रचनात्मकता और धुनों के जादू से इसे भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर कर दिया। जब इस फिल्म और इसके संगीत पर काम चल रहा था, तब शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि यह ट्रैक आने वाली पीढ़ियों के लिए गणेश उत्सव का पर्याय बन जाएगा, लेकिन श्रवण सुरेश की मेहनत और विजन ने इसे सच कर दिखाया। गाने के हर एक बीट, वाद्य यंत्रों के तालमेल और पारंपरिक लोक संगीत के बेहतरीन मिश्रण ने श्रोताओं के दिलों पर ऐसी गहरी छाप छोड़ी जो समय की धूल के साथ कभी धुंधली नहीं पड़ी। आज के दौर में जब हर हफ्ते नए गाने आते और गायब हो जाते हैं, तब इस महान संगीतकार द्वारा रची गई यह धुन इस बात का प्रमाण देती है कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं होती और वह हमेशा के लिए लोगों के दिलों में जीवित रहती है।
आज की जनरेशन भले ही नए रिमिक्स और आधुनिक डीजे ट्रैक्स पर थिरकना पसंद करती हो, लेकिन जब बात गणेश चतुर्थी के पारंपरिक और आध्यात्मिक उल्लास की आती है, तो हर कोई घूम-फिरकर इसी पुरानी और खास धुन की ओर खिंचा चला आता है। बप्पा के स्वागत से लेकर उनके विसर्जन तक, इस गाने की गूंज हर गली, नुक्कड़ और बड़े सार्वजनिक पंडालों में एक अलग ही समां बांध देती है, जो पुरानी यादों को ताजा करने के साथ-साथ एक नई ऊर्जा का संचार करती है। फिल्म की छोटी अवधि और इसकी कस्तूरी जैसी कहानी के बीच इस गाने का जुड़ना सोने पर सुहागा साबित हुआ था, जिसने सिनेमाघरों से लेकर गलियों तक तहलका मचा दिया था। आने वाले समय में भले ही तकनीक और संगीत के तौर-तरीके और अधिक बदल जाएं, लेकिन श्रवण सुरेश द्वारा अमर किया गया यह गणेश एंथम हमेशा के लिए भारत की सांस्कृतिक और उत्सवधर्मी पहचान का एक अनमोल हिस्सा बना रहेगा।



