मशहूर सितार वादक भागीरथ भट्ट ने ‘बिग बॉस 20’ में हिस्सा लेने की अफवाहों पर क्या दिया है कड़ा स्पष्टीकरण

भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत और कला प्रेमियों के बीच अपने बेहतरीन ساز और उम्दा सितार वादन के लिए जाने जाने वाले प्रसिद्ध कलाकार भागीरथ भट्ट इन दिनों मीडिया और सोशल मीडिया की सुर्खियों में अचानक से छाए हुए हैं। हाल ही में टेलीविज़न के सबसे विवादित और लोकप्रिय रियलिटी शो ‘बिग बॉस 20’ के संभावित कंटेस्टेंट्स की एक लिस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही थी, जिसमें दावा किया जा रहा था कि इस बार शास्त्रीय संगीत की दुनिया से एक बड़ा नाम इस घर का हिस्सा बनने जा रहा है। इस वायरल लिस्ट और तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए खुद सितार वादक भागीरथ भट्ट ने आगे आकर इन सभी खबरों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनका इस शो से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। उन्होंने बड़े ही साफगोई अंदाज में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि वे इस प्रकार के किसी भी रियलिटी शो का हिस्सा बनने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं, क्योंकि उनकी पूरी दुनिया संगीत, रियाज और अपनी कला के प्रति समर्पण में ही सीमित है। इस तरह के सनसनीखेज दावों के अचानक सामने आने से न केवल उनके फैंस हैरान रह गए थे, बल्कि शास्त्रीय संगीत जगत से जुड़े लोगों ने भी इस खबर को बेबुनियाद बताया था।
जब भागीरथ भट्ट से यह पूछा गया कि क्या वे भविष्य में कभी इस तरह के कमर्शियल या कंट्रोवर्शियल शो का हिस्सा बनना पसंद करेंगे, तो उन्होंने दो टूक जवाब देते हुए कहा कि उनकी परवरिश, संस्कार और उनका संगीत उन्हें इस प्रकार के मंचों पर जाने की इजाजत बिल्कुल नहीं देते हैं। शास्त्रीय संगीत साधकों का जीवन अनुशासन, शांति, साधना और एकाग्रता के इर्द-गिर्द घूमता है, जबकि ‘बिग बॉस’ जैसे रियलिटी शो का पूरा प्रारूप ड्रामेबाजी, तीखी बहस, आपसी झगड़ों और 24 घंटे कैमरों की निगरानी में रहने वाली हाई-वोल्टेज कंट्रोवर्सी पर आधारित होता है। एक कलाकार के रूप में भागीरथ भट्ट का यह मानना है कि संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि एक साधना है, जिसे वे अपनी पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ाना चाहते हैं, न कि किसी टीआरपी बटोरने वाले शो में जाकर अपनी कला की गरिमा को दांव पर लगाना चाहते हैं। उनके इस स्पष्ट बयान के बाद संगीत प्रेमियों और उनके प्रशंसकों ने सोशल मीडिया पर उनकी जमकर तारीफ की है और कहा है कि सच्चे कलाकारों की जगह ऐसे रियलिटी शो में नहीं बल्कि मंचों और संगीत की महफिलों में होती है, जहाँ वे अपनी कला से लोगों के दिलों पर राज करते हैं।
टेलीविजन जगत के सबसे बड़े रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ के नए सीजन के शुरू होने से पहले हर साल इस तरह की दर्जनों फर्जी और अनुमानित लिस्ट सोशल मीडिया के गलियारों में तैरने लगती हैं, जिनमें तमाम सेलिब्रिटीज के नाम जोड़े जाते हैं। शो के मेकर्स और क्रिएटिव टीम की यह एक सोची-समझी रणनीति या पीआर पब्लिसिटी स्टंट का हिस्सा माना जाता है ताकि शो के ऑन-एयर होने से पहले ही जनता के बीच जबरदस्त हाइप और सस्पेंस बना रहे। इन सूचियों में कभी देश के जाने-माने संगीतकारों, कभी विवादित राजनेताओं, तो कभी सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर्स के नाम बिना उनकी सहमति के ही उछाल दिए जाते हैं ताकि दर्शक यह कयास लगाते रहें कि इस बार कौन-कौन घर के अंदर जाने वाला है। कई बार जब कोई प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित हस्ती जैसे कि भागीरथ भट्ट जैसे शास्त्रीय कलाकार इन अफवाहों की चपेट में आते हैं, तो वे तुरंत खंडन करके अपनी स्थिति साफ कर देते हैं, लेकिन तब तक वह खबर ट्रेंडिंग टॉपिक बन चुकी होती है। दर्शकों और मीडिया को भी यह समझना होगा कि जब तक किसी कलाकार या आधिकारिक चैनल की तरफ से पुख्ता मुहर न लगे, तब तक इस तरह की वायरल सूचियों पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इनमें से अधिकांश दावे केवल टीआरपी बटोरने का एक जरिया मात्र होते हैं।
आज के समय में जब डिजिटल मीडिया और फास्ट एंटरटेनमेंट का बोलबाला है, जहाँ लोग कुछ ही मिनटों के ड्रामे और विवादों को देखना ज्यादा पसंद करते हैं, ऐसे में शास्त्रीय संगीत जैसी पारंपरिक विधाएं अपनी एक अलग और पवित्र पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। ‘बिग बॉस’ जैसे शो समाज के उस हिस्से को दर्शाते हैं जहाँ मानवीय भावनाओं के सबसे आक्रामक और नाटकीय रूप कैमरे के सामने खुलकर सामने आते हैं, जो युवाओं को तात्कालिक रूप से बहुत आकर्षित करते हैं। इसके विपरीत, भागीरथ भट्ट जैसे कलाकार उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो धैर्य, संयम और आत्मिक शांति का संदेश देती है, और यही कारण है कि इन दोनों संस्कृतियों के बीच जमीन आसमान का फर्क साफ नजर आता है। जब एक शास्त्रीय कलाकार यह कहता है कि वह इस प्रकार के शो के लिए नहीं बना है, तो वह केवल अपने व्यक्तिगत नजरिए को नहीं रखता, बल्कि वह कला जगत की उस गरिमा और मर्यादा की भी वकालत करता है जिसे पैसो और टीआरपी की दौड़ में अक्सर भुला दिया जाता है। आने वाली पीढ़ी के लिए यह सोचना बेहद जरूरी है कि हम किस तरह के मनोरंजन को बढ़ावा दे रहे हैं और क्या हम अपनी महान सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखने में सफल हो पा रहे हैं या नहीं।



