मद्रास हाई कोर्ट सख्त क्या स्कूल सिर्फ पैसा कमाने की मशीन हैं? UKG की छात्रा की जान जाने पर जताई नाराजगी

News India Live, Digital Desk: मद्रास हाई कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था और स्कूलों की सुरक्षा पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है। यूकेजी (UKG) में पढ़ने वाली एक नन्हीं छात्रा की स्कूल परिसर में हुई दुखद मौत के मामले पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि स्कूल अब शिक्षा के मंदिर कम और ‘व्यापारिक केंद्र’ ज्यादा नजर आ रहे हैं। जस्टिस की इस टिप्पणी ने देशभर के निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली और बच्चों की सुरक्षा के दावों पर बड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।मासूम की जान की कीमत कुछ भी नहीं?मामला एक निजी स्कूल का है, जहां सुरक्षा में चूक के कारण यूकेजी की छात्रा की जान चली गई। इस घटना पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों के भरोसे छोड़ते हैं, लेकिन स्कूल प्रबंधन केवल मोटी फीस वसूलने में दिलचस्पी रखते हैं। अदालत ने साफ किया कि अगर स्कूल परिसर के भीतर किसी बच्चे के साथ अनहोनी होती है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन की होगी। इसे केवल एक ‘दुर्घटना’ कहकर टाला नहीं जा सकता।’शिक्षा का बाजारीकरण’ बना बच्चों के लिए खतरासुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि आजकल स्कूलों का ध्यान केवल बुनियादी ढांचे और विज्ञापनों पर है, जबकि सुरक्षा मानकों (Safety Norms) को दरकिनार किया जा रहा है। मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि शिक्षण संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। बच्चों की सुरक्षा के प्रति ऐसी लापरवाही कतई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कोर्ट ने सख्त लहजे में पूछा कि क्या मासूमों की सुरक्षा से समझौता करके ही ये स्कूल अपनी तिजोरियां भरना चाहते हैं?सुरक्षा ऑडिट और कड़े नियमों की जरूरतहाई कोर्ट ने सरकार और संबंधित विभागों को निर्देश दिया कि स्कूलों में सुरक्षा ऑडिट (Safety Audit) को अनिवार्य बनाया जाए। केवल कागजों पर नियम बना देने से मासूमों की जान नहीं बचेगी। अदालत ने मांग की कि हर स्कूल में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और प्रशिक्षित स्टाफ होना चाहिए, ताकि ऐसी दुखद घटनाओं को समय रहते रोका जा सके। इस मामले में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के भी संकेत दिए गए हैं।अभिभावकों में भारी आक्रोश, न्याय की गुहारइस दुखद घटना के बाद से ही अभिभावकों में डर और गुस्से का माहौल है। पीड़ित परिवार के लिए न्याय की मांग करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे से किसी की जान वापस नहीं आती, लेकिन भविष्य में किसी और मासूम के साथ ऐसा न हो, इसके लिए एक उदाहरण पेश करना जरूरी है। यह फैसला आने वाले समय में निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसने के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।



