जन्नत-ए-कश्मीर में सिनेमा का नया सूर्योदय: डल झील के किनारे सजेगा अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव

बर्फ से ढकी पीर पंजाल की वादियां, चिनार के सुनहरे पत्ते और डल झील की शांत लहरें एक बार फिर सिनेमाई जादू के सबसे बड़े गवाह बनने जा रही हैं। दशकों तक हिंदी और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के लिए सबसे पसंदीदा शूटिंग डेस्टिनेशन रही कश्मीर घाटी अब केवल फिल्मों की शूटिंग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैश्विक सिनेमा के दिग्गजों, निर्देशकों, पटकथा लेखकों और कलाकारों के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मिलन केंद्र के रूप में उभरने जा रही है। श्रीनगर स्थित प्रसिद्ध शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (SKICC) और डल झील के तटवर्ती परिसरों में पहले 'कश्मीर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल' (KIFF) का भव्य आयोजन होने जा रहा है। इस ऐतिहासिक महोत्सव का सबसे अभूतपूर्व और प्रेरक पहलू यह है कि इसके पहले ही संस्करण में दुनिया भर के 92 देशों से 500 से अधिक फीचर फिल्मों, शॉर्ट फिल्मों, एनिमेशन और डॉक्यूमेंट्रीज की आधिकारिक प्रविष्टियां (Entries) प्राप्त हुई हैं। यूरोप, लैटिन अमेरिका, मध्य पूर्व, अफ्रीका और एशिया के तमाम देशों से फिल्मकारों ने अपनी कलाकृतियां श्रीनगर के इस मंच पर प्रदर्शित करने के लिए भेजी हैं। यह आयोजन इस बात का स्पष्ट और अकाट्य प्रमाण है कि कश्मीर अब अशांति और बंदिशों के साए से पूरी तरह बाहर निकलकर कला, रचनात्मकता, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और वैश्विक संस्कृति के एक जीवंत केंद्र के रूप में अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान पुनः स्थापित कर चुका है।

60 और 70 के दशक का वो क्लासिक दौर: शम्मी कपूर की 'कश्मीर की कली' से यश चोपड़ा के रोमांस तक

कश्मीर और भारतीय सिनेमा का संबंध केवल कैमरे और लेंस का नहीं, बल्कि आत्मा और सौंदर्य का गहरा रिश्ता रहा है। 1960 और 70 के दशक में कोई भी बड़ी हिंदी फिल्म कश्मीर के नजारों के बिना अधूरी मानी जाती थी। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर की सदाबहार फिल्म 'कश्मीर की कली' में डल झील के शिकारे पर फिल्माया गया गीत 'तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया' हो, या फिर 'जब जब फूल खिले', 'आरजू', 'जंगली' और 'कभी कभी' जैसी कालजयी फिल्में—इन सभी ने कश्मीर के हुस्न को दुनिया भर के सिनेमाई पर्दे पर अमर कर दिया। महान फिल्म निर्माता यश चोपड़ा के लिए तो कश्मीर उनका दूसरा घर बन चुका था, जिन्होंने 'सिलसिला' से लेकर अपनी अंतिम फिल्म 'जब तक है जान' तक घाटी की खूबसूरती को अपने रूमानी कैनवास पर उतारा।

हालांकि, 1990 के दशक में शुरू हुए आतंकवाद और हिंसा के दौर ने इस सिनेमाई रिश्ते को बेरहमी से तोड़ दिया। सिनेमा हॉल बंद हो गए, कैमरों की जगह बंदूकों की आवाज ने ले ली और फिल्म यूनिट्स ने स्विट्जरलैंड और यूरोप की वादियों का रुख कर लिया। लेकिन अब, तीन दशकों के लंबे इंतजार और नए सिनेमाई इकोसिस्टम के बाद, डल झील के किनारे फिर से 'कैमरा, रोलिंग, एक्शन और कट' की गूंज सुनाई देने जा रही है। यह इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल उस टूटी हुई कड़ी को वैश्विक स्तर पर जोड़ने का सबसे बड़ा ऐतिहासिक कदम साबित होने जा रहा है।

92 देशों की फिल्मों की स्क्रीनिंग और मास्टरक्लास: विश्व सिनेमा और स्थानीय प्रतिभाओं का महासंगम

श्रीनगर में आयोजित होने वाले इस बहुप्रतीक्षित फिल्म फेस्टिवल का खाका बेहद व्यापक और बहुआयामी तैयार किया गया है। फेस्टिवल की जूरी में कान (Cannes), बर्लिन और ऑस्कर से जुड़े ख्यातिप्राप्त अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक और दिग्गज भारतीय सिनेमाई हस्तियां शामिल हैं।

महोत्सव के दौरान मुख्य आकर्षण इस प्रकार रहेंगे:

  • वर्ल्ड सिनेमा पैनोरमा: फ्रांस, ईरान, दक्षिण कोरिया, स्पेन, जापान, मैक्सिको और नॉर्वे जैसे देशों की समीक्षकों द्वारा सराही गई कलात्मक फिल्मों का विशेष प्रदर्शन किया जाएगा।

  • फ्लोटिंग थिएटर का रोमांच: डल झील के भीतर शिकारों पर बैठे दर्शकों के लिए विशालकाय स्क्रीन लगाकर विश्व सिनेमा की चुनिंदा क्लासिक फिल्मों की ओपन-एयर स्क्रीनिंग की जाएगी, जो अपने आप में एक अनोखा और जादुई अनुभव होगा।

  • कश्मीरी युवाओं के लिए तकनीकी कार्यशालाएं: फेस्टिवल केवल मनोरंजन का साधन नहीं होगा, बल्कि घाटी के स्थानीय युवाओं और नवोदित फिल्मकारों के लिए पटकथा लेखन (Screenplay Writing), छायांकन (Cinematography), साउंड डिजाइनिंग और डिजिटल एडिटिंग पर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा 5 दिवसीय गहन मास्टरक्लास और कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी।

  • लोकल टैलेंट और कश्मीरी भाषा की फिल्में: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की क्षेत्रीय भाषाओं (कश्मीरी, डोगरी, गोजरी, लद्दाखी और पहाड़ी) में बनी शॉर्ट फिल्मों और वृत्तचित्रों के लिए एक विशेष प्रतिस्पर्धी खंड रखा गया है, ताकि स्थानीय कहानियों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों तक पहुंचाया जा सके।

जम्मू-कश्मीर की नई फिल्म नीति: सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और सब्सिडी का बड़ा असर

कश्मीर में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजन की जमीन पिछले कुछ वर्षों में लागू की गई सरकार की दूरदर्शी 'जम्मू-कश्मीर फिल्म नीति' (J&K Film Policy) से तैयार हुई है। प्रशासन द्वारा शुरू किए गए 'सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम' (Single Window Clearance) के तहत अब किसी भी भारतीय या अंतरराष्ट्रीय फिल्म निर्माता को घाटी में शूटिंग करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते। ऑनलाइन पोर्टल के जरिए महज 7 से 10 दिनों के भीतर सभी आवश्यक अनुमतियां, ड्रोन उड़ाने की मंजूरी और सुरक्षा क्लीयरेंस एक ही छत के नीचे मिल जाती है।

इसके अतिरिक्त, स्थानीय कलाकारों को रोजगार देने, कश्मीर की स्थानीय प्रतिभाओं को क्रू में शामिल करने और घाटी में शूटिंग के दिनों की संख्या के आधार पर फिल्म निर्माताओं को करोड़ों रुपये तक की आकर्षक वित्तीय सब्सिडी और टैक्स छूट दी जा रही है। इसी अनुकूल माहौल का नतीजा है कि हाल के महीनों में बॉलीवुड के शीर्ष निर्देशकों, साउथ इंडियन सिनेमा के दिग्गजों और वेब सीरीज मेकर्स ने पहलगाम, गुलमर्ग, सोनमर्ग, दूधपथरी और श्रीनगर के डाउनटाउन में दर्जनों बड़े प्रोजेक्ट्स की शूटिंग सफलतापूर्वक पूरी की है।

पर्यटन, रोजगार और सांस्कृतिक कूटनीति: कश्मीर के लिए क्यों मील का पत्थर है यह फेस्टिवल?

इस अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव का प्रभाव केवल सांस्कृतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह जम्मू-कश्मीर की संपूर्ण अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग के लिए एक बड़ा गेमचेंजर साबित होने वाला है। जब 92 देशों के प्रतिनिधि, निर्देशक और अंतरराष्ट्रीय मीडिया कर्मी श्रीनगर की धरती पर कदम रखेंगे, तो वे कश्मीर के बदले हुए शांतिपूर्ण, आधुनिक और सुरक्षित माहौल के प्रत्यक्ष गवाह बनेंगे।

  • टूरिज्म और आतिथ्य सत्कार को नई गति: विदेशी प्रतिनिधियों के आगमन से घाटी के होटल, हाउसबोट्स, शिकारा चालक, टैक्सी संचालक और हस्तशिल्प (पश्मीना, कालीन, अखरोट की लकड़ी की नक्काशी) से जुड़े स्थानीय दस्तकारों को भारी आर्थिक लाभ मिलेगा।

  • वैश्विक नैरेटिव में निर्णायक बदलाव: पश्चिमी देशों द्वारा कश्मीर को लेकर अतीत में जारी की जाने वाली भ्रामक 'ट्रैवल एडवाइजरीज' को निरस्त कराने में इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक आयोजन सबसे प्रभावी हथियार साबित होते हैं। जब दुनिया भर के फिल्मकार यहां से सुखद अनुभव लेकर लौटेंगे, तो वे अपने देशों में कश्मीर के सबसे बड़े ब्रांड एंबेसडर बनकर उभरेंगे।

  • स्थानीय रोजगार के नए अवसर: अंतरराष्ट्रीय फिल्म क्रू के साथ काम करने से स्थानीय प्रोडक्शन असिस्टेंट्स, लाइटमैन, ट्रांसपोर्टर्स और जूनियर कलाकारों के लिए स्थायी रोजगार के रास्ते खुलेंगे।

डल झील के पानी पर तैरते शिकारे, शिकारे पर जलते लैंप और सामने विशाल स्क्रीन पर गूंजता विश्व सिनेमा—यह दृश्य केवल एक फिल्म फेस्टिवल का नहीं, बल्कि शांति, समृद्धि और नए कश्मीर के उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जो अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ दुनिया का स्वागत करने के लिए दोनों हाथ फैलाए खड़ा है।

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