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सीएसआईआर ने आईओआरए के साथ सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए : सीएसआईआर-सीआईएमएपी औषधीय वनस्पतियों पर समन्वय केंद्र चलाएंगे

नई दिल्लीः वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने केंद्रीय औषधीय और सुगंधित वनस्पति संस्थान, लखनऊ (सीएसआईआर-सीआईएमएपी) को समन्वय केंद्र बनाने के लिए हिंद महासागर तटीय क्षेत्रीय सहयोग संघ (आईओआरए) के विज्ञान और प्रौद्योगिकी अंतरण के लिए क्षेत्रीय केंद्र (आरसीएसटीटी) के साथ सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है। सहमति ज्ञापन पर सीएसआईआर-सीआईएमएपी के निदेशक प्रोफेसर अनिल कुमार त्रिपाठी और आईओआरए – आरसीएसटीटी के निदेशक डॉ. ए सेडपोउसन ने हस्ताक्षर किए। भारतीय शिष्टमंडल का नेतृत्व सीएसआईआर के महानिदेशक तथा डीएसआईआर के सचिव डॉ. गिरीश साहनी ने किया। शिष्टमंडल 31वें ख्वारिजमी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में शामिल हुआ जिसे इस्लामी गणराज्य ईरान के राष्ट्रपति महामहिम डॉ. हसन रुहानी ने संबोधित किया। सीएसआईआर-सीआईएमएपी में आईओआरए केंद्र महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों और उनके मूल्यवर्धित उत्पादों, संबंधित विशेषज्ञों और आईओआरए सदस्य देशों का डाटाबेस स्थापित करेगा और व्यापार, वाणिज्य तथा वैज्ञानिक आदान-प्रदान प्रोत्साहित करने के लिए बैठकों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करेगा।

आईओआरए 21 देशों का संगठन है और 7 संवाद साझेदारों ने सहयोग के लिए औषधीय वनस्पतियों सहित 6 क्षेत्रों की पहचान की है।

सहमति ज्ञापन हस्ताक्षर समारोह ईरानी इस्लामी गणराज्य के विदेश उप मंत्री महामहिम श्री मुर्तजा सरमदी के कार्यालय में आयोजित किया गया और इस अवसर पर आईओआर के महासचिव महामहिम डॉ. नोमवूयो नोकवे, सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. गिरीश साहनी उपस्थित थे। समारोह में भारतीय ईरान के उद्योग के लोगों ने भाग लिया।

इस अवसर पर सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ. गिरीश साहनी ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विभिन्न क्षेत्रों में सीएसआईआर की शक्तियों की चर्चा की और कहा कि सीएसआईआर ने लोगों की समस्याओं को हल करने में योगदान दिया है।

डॉ. नोकवे ने आशा व्यक्त की कि समन्वय केंद्र आईओआरए सदस्य देशों की जनता के कल्याण के लिए औषधीय वनस्पति से संबंधित पारंपरिक ज्ञान के क्षेत्र में सहयोग को प्रोत्साहित करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि केंद्र आईओआरए के दो महत्वपूर्ण देश भारत और ईरान को सहयोग बढ़ाने का अवसर प्रदान करेगा।

विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव (आईओआर) श्री संजय पांडा ने इस पहल के महत्व और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की भूमिका पर बल दिया।

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